Nida Fazli Birth Anniversary: 'निदा' फ़ाज़ली की ज़िंदगी के अनसुने पहलू उनकी पत्‍नी मालती जोशी की ज़बानी

निदा' फ़ाज़ली की जिंदगी के अनसुने पहलू...
निदा' फ़ाज़ली की जिंदगी के अनसुने पहलू...

Nida Fazli Birth Anniversary:'निदा' फ़ाज़ली (Nida Fazli) किसी तार्रुफ़ के मोहताज नहीं हैं. वह मशहूर शायर (Shayar) और गीतकार रहे हैं. उनकी ग़ज़लें (Ghazal) उनकी शख़्सियत का आईना हैं, जो आज भी उनके होने का एहसास कराती हैं.

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  • Last Updated: October 12, 2020, 12:34 PM IST
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Nida Fazli Birth Anniversary: मुक़तदा हसन फ़ाज़ली यानी 'निदा' फ़ाज़ली (Muqtada Hasan Nida Fazli) साहब किसी तार्रुफ़ के मोहताज नहीं हैं. वह मशहूर शायर (Shayar) और गीतकार रहे हैं. उनकी ग़ज़लें (Ghazal) उनकी शख़्सियत का आईना हैं, जो आज भी उनके होने का एहसास कराती हैं. आज (12 October) उनका जन्‍मदिन (Birth Anniversary) है. इस मौके पर निदा साहब की ज़िंदगी के कुछ अहम पहलू साझा किए उनकी पत्‍नी और गायिका मालती जोशी फ़ाज़ली (Malti Joshi Fazli) ने. उन्‍होंने 'निदा' साहब के साथ ज़िंदगी का लंबा सफ़र तय किया है और उनकी ज़िंदगी के हर पहलू से वाकिफ़ हैं. निदा' साहब की जिंदगी के अहम और अनसुने पहलुओं पर चंद बातें, यादें पेश हैं उन्‍हीं की ज़बानी...

ग़ज़ल के बहाने मुहब्‍बत का इज़हार
'निदा' साहब अलग ही शख़्सियत के इंसान थे. मुहब्‍बत भी की तो इज़हार करने में लंबा समय लिया. इस बारे में मालती जोशी बताती हैं, जब शादी का प्रस्‍ताव उन्‍होंने दिया था, तो वह भी ग़ज़ल के बहाने. वह ज्‍यादा बात नहीं करते थे. जो भी उनका मूड होता था वह शायरी में ही बयां करते थे. चाहे दुख हो, खुशी या मुहब्‍बत का कोई जज्‍बा हो वह शायरी में ही अपने जज्‍बात लिखने के आदी थे. उन्‍होंने कभी शादी के बारे में तो कुछ नहीं कहा मुझसे. मगर एक ग़ज़ल लिख कर ज़रूर मेरे हाथ में थमा दी थी. ग़ज़ल ऐसी लिखी कि पूरी बात उसमें समा गई थी. 'मुमकिन है सफर हो आसां अब साथ भी चल कर देखें, कुछ तुम भी बदल कर देखो, कुछ हम भी बदल कर देखें' और उनकी इसी ग़ज़ल को देख कर मेरी समझ में आ गया कि वह क्‍या चाहते हैं.

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अलग होकर भी एक थे हम


'निदा' साहब अक्‍सर जब उनका मूड बनता था, तो चिकन और मटन बनाया करते थे और बहुत अच्‍छा बनाया करते थे. जैसा कि उनके दोस्‍त कहते थे. क्‍योंकि मैं शाकाहारी खाना पसंद करती हूं, इसलिए इसमें मेरा साथ तो उन्‍हें नहीं मिलता था, मगर वह अक्‍सर अपने दोस्‍तों को बुला कर जरूर दावतें किया करते थे. हालांकि उन्‍होने कभी मुझसे कहा भी नहीं कि मैं साथ में खाऊं या बनाऊं. मैं अपना अलग वेजिटेरियन खाना बना लेती थी. इस तरह कुछ आदतों में अलग होकर भी हम दोनों एक ही थे.

बग़ावत करके की शादी
उनका कलाम 'दिल में न हो जुर्रत तो मुहब्‍बत नहीं मिलती, खैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती'. उनकी यह ग़ज़ल एक तरह से बग़ावत के तौर पर ही लिखी गई है. उनकी फैमिली के लोग हमारी शादी के बिल्‍कुल खिलाफ थे. ऐसे हालात में इस शादी के लिए निदा साहब को अपने परिवार से बग़ावत करनी पड़ी थी.

तुलसी, मीरा थे पसंद
निदा साहब मीरा, तुलसी को बहुत पसंद करते थे. तो कुछ अहम शायर भी उनको बेहद पसंद थे. इनमें मीर, गालिब और दाग देहलवी ख़ास हैं. एक तरह से कहें तो शायरी का हुनर उनको पिता से विरासत में मिला था. बाकी दूसरे शायरों के कलाम को पढ़ कर उन्‍होंने अपने कलाम के सरमाये को बढ़ाया.

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वह आज भी हैं आस-पास
उनकी ग़ज़लों के जरिये उनकी यादों के जरिये आज भी उनको बहुत क़रीब महसूस करती हूं. बाकी उनके सभी दोस्‍त मेरे बहुत करीब हैं. मैं उनसे अपनी बातें, यादें शेयर करती हूं. ऐसे में उनके जाने का एहसास, अकेलापन महसूस नहीं होता. हमारी बेटी तहरीर का भी पूरा साथ मुझे मिलता है.
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