भंडारे में ‘नो प्लास्टिक मुहिम’ और याद आई गांव की पंगत

क्या जाने अनजाने हमने प्लास्टिक की समस्या को इतना बड़ा बना दिया कि इस पर पीएम को उस पर अपील करनी पड़ जाए

News18Hindi
Updated: September 13, 2019, 3:37 PM IST
भंडारे में ‘नो प्लास्टिक मुहिम’ और याद आई गांव की पंगत
क्या जाने अनजाने हमने प्लास्टिक की समस्या को इतना बड़ा बना दिया कि इस पर पीएम को उस पर अपील करनी पड़ जाए
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Updated: September 13, 2019, 3:37 PM IST
(राकेश कुमार मालवीय)

हो सकता है यह प्रधानमंत्रीजी की ‘नो-प्लास्टिक’ मुहिम का ही असर हो कि सोसायटी में तय किया गया कि गणेशोत्सव के भंडारे में पत्ते वाली पत्तल में ही प्रसाद परोसा जाएगा. मंच से यह घोषणा भी बार—बार होती रही कि पर्यावरण की बेहतरी के लिए प्लास्टिक का इस्तेमाल कम हो, इसके लिए प्लास्टिक वाले गिलास नहीं बांटे जाएंगे, लोग अपने लिए पानी की बॉटल घरों से लेकर आएं. समाज में ऐसी पहल सराहनीय मानी जानी चाहिए.

पता चला कि भंडारा तय योजना के हिसाब से पत्तों की पत्तल पर नहीं हो सका. मजबूरी में कागज से बनी प्लेट्स में ही प्रसाद दिया गया. आधे लोगों ने पानी की बॉटल घरों से लाए, मजबूरी में तुरत—फुरत गिलास मंगवाकर भी बांटने पड़े. क्लब हाउस में जमीन पर बैठे बड़े लोगों में इस बात पर भी चर्चा हुई कि आजकल की पीढ़ी को पंगत में परोसने का शउर नहीं. परोसने के कुछ कायदे होते हैं, एक—एक जन से पूछ—पूछ कर ध्यान रखा जाता है कि कोई अतृप्त न रह जाए, सब्जी दोने से बाहर न जाए. जब तक सभी लोग न जीम लें तब तक उठा भी न जाए.

पर दोष इस पीढ़ी को भला क्यों दे ? कईयों के लिए तो यह ऐसा रोमांचक अनुभव है जो संभवत: उनके जीवन में पहली बार ही घट रहा है. यह प्रहसन उन बीते दिनों को सामने ले आया जब पंगतों में हम पानी पीने के लिए लोटा या गिलास अनिवार्य रूप से ले जाया करते थे. वह किसी पर्यावरण बचाने की योजना का हिस्सा नहीं था. इसके लिए कोई पंच या प्रधान को अपील भी नहीं करनी पड़ती थी. यह पत्तलें उन्हीं नाई दादा के घर मिल जाया करती थीं जो हमें पंगत के लिए बुलाने आते थे.

वक्त पिछले कुछ सालों में देखते ही देखते कितना बदल गया है, अब गांवों में भी वह चीजें नहीं बची, और शहरों में खोजने से भी नहीं मिल रहीं. अब सवाल यह है कि  हमने कितना और कैसा विकास किया ? हम पहले ही बहुत मामलों में बेहतर थे, या विकास के नाम पर बाद में बेहतर हुए ! क्या अभी का भी जो विकास है वह बेहतर समाज बना रहा है या एक मजबूत समाज जहां पर्यावरण, धर्म संस्कृति और लोकजीवन का एक मजबूत तानाबाना था उसे विकास की अंधी चाल ने तोड़ दिया है ? क्या हमारी अर्थव्यवस्था भी एक समतामूलक समाज की ओर जा रही है. विकास की इस अंधी चाल पर जरा हमें ठहरकर दो पल सोचना होगा.

हमने प्लास्टिक के उत्पादन के मानकों को इतना शिथिल करके क्यों रखा है

हमें सोचना होगा कि क्या हमने जाने—अनजाने प्लास्टिक की समस्या को वास्तव में इतना बड़ा बना दिया है कि देश के प्रधानमंत्री को उस पर अपील करनी पड़ रही है. देश ये कैसे स्वीकार कर लेता है कि पालीथीन केवल गाय ही नहीं उन तमाम निरीह जानवरों के पेट का निवाला बन जाए और उनकी जान पर ही बन आए. सवाल यह भी है कि यदि हम प्लास्टिक, तंबाकू, शराब जैसी वस्तुओं को समाज के लिए बुरा मान रहे हैं तो उनके उत्पादन के मानकों को हमने इतना शिथिल करके क्यों रखा है. मोटर व्हीकल एक्ट को सख्त बनाना जैसे कदम हो सकते हैं,पर उतनी ही कड़ाई से इन मानकों का पालन क्यों नहीं किया जाता है. ऐसे तमाम सवाल हैं जिनपर हमें सोचने की जरूरत है.
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बहुत सारी समस्याएं ऐसी हैं जिन्हें केवल डंडे की दम पर ठीक नहीं किया जा सकता. उसमें लोगों की सहभागिता भी उतनी ही जरूरी होती है. 1933 में जब पॉलीथिन का अविष्कार हुआ होगा तब यह सोचा भी नहीं गया होगा कि प्लास्टिक आगे चलकर जीवजगत और पर्यावरण की इतनी बड़ी समस्या बन जाएगी कि दुनिया में हर मिनट दस लाख से भी ज्यादा प्लास्टिक बैग्स का इस्तेमाल किया जाने लगेगा. मसला केवल बैग्स भर का नहीं है. दूसरे रूपों में प्लास्टिक कचरा भी बीते समय में मनुष्य की ओर से इजाद समस्या है.

मसला यह है कि वह सामाजिक राजनैतिक चेतना समाज में कब और किस स्तर पर आती है ? हमसे छोटे बांग्लादेश को हमसे कहीं पहले यह बात समझ में आ गई थी, उन्होंने दुनिया मे सबसे पहले पतले प्लास्टिक बैग्स पर प्रतिबंध लगा दिया था. अब हमारी बारी है कि अपने पर्यावरण को बचाने के लिए पहल करें, आगे आएं, विकल्पों को खोजें, उन्हें सस्ता और लोकजीवन में फैशन नहीं बल्कि सहज व्यवहार का बनाएं, और ऐसे उत्पादों पर सख्ती से प्रतिबंध लगाएं सही मायनों में तभी पर्यावरण सुरक्षित रह सकता है.

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First published: September 13, 2019, 3:37 PM IST
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