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डिमेंशिया का अब समय रहते ही पता चल जाएगा, इलाज में मिलेगी मदद - रिसर्च

अब एक सिंपल से ब्लड टेस्ट की मदद से डिमेंशिया होने के 2 से 5 साल पहले ही इसका पता चल जाएगा. (प्रतीकात्मक फोटो- shutterstock)

अब एक सिंपल से ब्लड टेस्ट की मदद से डिमेंशिया होने के 2 से 5 साल पहले ही इसका पता चल जाएगा. (प्रतीकात्मक फोटो- shutterstock)

Early detection of Dementia by blood Test : साइंस मैगजीन ईएमबीओ मालिक्यूलर मेडिसिन (EMBO Molecular Medicine) में छपे स्टडी के डेटा के अनुसार, डिमेंशिया के इलाज के लिए माइक्रोआरएनए का इस्तेमाल हो सकता है.

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    Early detection of Dementia by blood Test : डिमेंशिया (Dementia) के इलाज को लेकर साइंटिस्टों को बड़ी कामयाबी मिली है. वैज्ञानिकों ने एक ऐसे अणु (molecule) का पता लगाया है, जिससे समय रहते ही डिमेंशिया होने के खतरे का अनुमान लग जाएगा. दैनिक जागरण में छपी न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक, अब एक सिंपल से ब्लड टेस्ट की मदद से इस अणु की पहचान हो सकेगी और इससे डिमेंशिया होने के 2 से 5 साल पहले ही पता चल जाएगा. बता दें कि डिमेंशिया को साधारण भाषा में भूलने की बीमारी कहते हैं, हालांकि ये बीमारी का नाम नहीं है, बल्कि एक बड़े लक्षणों के ग्रुप का नाम है. इसके भूलने के अलावा जो लक्षण होते हैं, वो इस तरह से है. नई बातें याद करने में दिक्कत होना, लॉजिक को समझ न पाना, लोगों से मिलने-जुलने में झिझक, इमोशंस को संभालने में दिक्कत, पर्सनैलिटी चेंज आदि. ये सभी लक्षण ब्रेन लॉस के कारण होते हैं, जिससे लाइफ में हर कदम दिक्कतों को सामना करना पड़ता है.

    जर्मनी की डीजेडएनई (DZNE) और यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर गोटिनजेन (University Medical Center Göttingen) के रिसर्चर्स ने एक बायोमार्कर ( Biomarkers) की खोज की है. इसे माइक्रोआरएनए (microRNA) के लेवल पर मापा जाता है.

    क्या है माइक्रोआरएनए प्रोटीन
    यह माइक्रोआरएनए प्रोटीन के प्रॉडक्शन को इफेक्ट करता है. इसीलिए ये प्रत्येक जीवित प्रणाली (living system) के मेटाबॉलिज्म (metabolism) की प्रमुख प्रक्रिया है. एक तकनीक के तौर पर इसका उपयोग व्यवहारिक नहीं है. इसलिए साइंटिस्टों का मकसद एक सरल, सस्ता ब्लड टेस्ट तैयार करना है, जो कि कोविड-19 के टेस्ट के जैसा ही होगा. और डिमेंशिया के खतरे को देखते हुए इसका इस्तेमाल नियमित मेडिकल जांच में किया जा सकेगा.

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    साइंस मैग्न ईएमबीओ मालिक्यूलर मेडिसिन (EMBO Molecular Medicine) में छपे स्टडी के डाटा के अनुसार, डिमेंशिया के इलाज के लिए माइक्रोआरएनए का इस्तेमाल हो सकता है. चूंकि इस बीमारी की पहचान होने में ही बहुत देर हो जाती है. इसलिए ऐसे टेस्ट की जरूरत है, जो डिमेंशिया की पुष्टि होने से बहुत पहले ही इसके होने की आशंका से आगाह कर दे. रिसर्चर्स का कहना है कि यह रिसर्च ऐसे एक नए टेस्ट के लिए रास्ता खोल देगी.

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    स्टडी में क्या निकला
    चूहों पर की गई इस रिसर्च के आंकड़ों की जांच में पता चला कि माइक्रोआरएनए के लेवल और मेंटल हेल्थ का आपस में संबंध है. ब्लड टेस्ट में इसका लेवल जितना ही कम होगा, उसकी पहचानने की शक्ति उतनी ही दुरुस्त होगी. युवाओं और बुजुर्गो दोनों में ही इसके लक्षण अचानक उभरते हैं. उनकी पहचानने की शक्ति क्षीण होने लगती है. मनुष्यों में इस अणु के ब्लड में अधिक होने पर मेमोरी लॉस होने लगता है. इसका असर अगले दो से पांच सालों में नजर आता है.

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