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जायफल को लेकर तीन देशों में हुआ था 'खूनी संघर्ष', इस मसाले से जुड़े दिलचस्प किस्से जानकर हो जाएंगे हैरान

जायफल का उपयोग कई बीमारियों में फायदेमंद होता है.

जायफल का उपयोग कई बीमारियों में फायदेमंद होता है.

जायफल भारतीय मसालों का अभिन्न अंग बन चुका है. गुणों से भरपूर इस मसाले को लेकर कई दिलचस्प किस्से प्रचलित हैं. कई बीमारियों में जायफल का प्रयोग किया जाता है. इसका उपयोग धार्मिक कार्यों में भी होता है. आइए जानते हैं इससे जुड़ी कुछ रोचक बातें...

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जायफल को मसालों की श्रेणी में गिना जाता है. लेकिन यह बहु-उपयोगी भी है. इसे एक ‘भड़काऊ’ औषधि भी माना जाता है जो शरीर के इम्यूनिटी सिस्टम को बढ़ाता है. विशेष बात यह है कि जायफल का पूजा-पाठ में भी खूब प्रयोग किया जाता है तो तंत्र-मंत्र में भी इसे महत्वपूर्ण माना जाता है. दुनिया का एक यह एक ऐसा मसाला है, जिसको पाने के लिए खूनी युद्ध हुआ था.

एक ही पेड़ से जायफल व जावित्री

दुनिया के अन्य मसालों की तरह भी जायफल की उत्पत्ति हजारों वर्ष पूर्व हो गई थी और कभी यह सबसे मूल्यवान मसालों में से एक माना जाता था. जायफल के पेड़ की विशेषता यह है कि इससे दो मसाले मिलते हैं. एक तो गुठली के रूप में जायफल और दूसरे उसके ऊपर लगा जालीदार छिलका, जिसे जावित्री (मसाला) कहा जाता है. दोनों की गुणों में बेजोड़ तो है ही, खुशबू में भी तन-मन मोह लेते हैं. पुराने समय में इसका इत्र भी खूब बनाया जाता था. विशेष बात यह है कि आज जायफल का प्रयोग मीठे व नमकीन दोनों प्रकार के व्यंजन में किया जाता है.

इंडो-बर्मा में जायफल की उत्पत्ति मानी जाती है

यह तो सर्वविदित है कि जो भी वस्तु जितनी पुरानी होगी, उसकी उत्पत्ति को लेकर प्राय: भ्रम ही रहेगा. यह तो कन्फर्म है कि जायफल हजारों साल पुराना मसाला है. लेकिन सटीक उत्पत्ति स्थल को लेकर अभी भी कयास है. वैसे ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी (अमेरिका) के वनस्पति विज्ञान व प्लांट पेथोलॉजी विभाग की प्रोफेसर सुषमा नैथानी ने अपनी हिंदी में लिखी पुस्तक ‘अन्न कहां से आता है’ में फसलों के उत्पत्ति केंद्र की जानकारी देते हुए बताया है कि पुराने समय में जायफल का केंद्र इंडो-बर्मा उपकेंद्र रहा है. जिनमें कंबोडिया, लाओ पीडीआर, म्यांमार, थाईलैंड, वियतनाम के सभी गैर-समुद्री हिस्से, साथ ही दक्षिणी चीन के हिस्से शामिल माने जाते हैं.

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पुराने समय में जायफल का केंद्र इंडो-बर्मा उपकेंद्र रहा है.

वैसे रिसर्च इस बात की ओर भी इशारा करती हैं कि यह मसाला इंडोनेशिया के मोलुकास द्वीप (Moluccas) जिसे बांडा भी कहा जाता है से निकला है.

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2 हजार साल से हो रहा है इसका उपयोग

माना यह भी जा रहा है कि करीब 2000 वर्ष से दुनिया में इसका प्रयोग हो रहा है. पहली शताब्दी के दौरान रोमन साम्राज्य में जन्मे लेखक व वनस्पति विशेषज्ञ प्लिनी द एल्डर (Pliny The Elder)
ने जायफल की जानकारी दी है. उनकी पुस्तक नेचुरल हिस्ट्री (Natural History) के बॉटनी अध्याय में उन्होंने इसके पेड़ की जानकारी देते हुए बताया कि इसमें दो अलग-अलग स्वाद वाले दो काष्ठफल (जायफल व जावित्री) होते हैं. लेकिन इसका चलन मध्यकाल में बहुत बढ़ा और अब भारत के अलावा मलेशिया, पापुआ न्यू गिनी, श्रीलंका और कैरेबियाई द्वीप, अमेरिका, जापान आदि में यह खूब उगता है और प्रयोग में लाया जाता है.

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मध्ययुग में जब ब्रिटेन में प्लेग की बीमारी फैली थी, तब जायफल की औषधि से इसका बचाव किया गया था.

इस मसाले को लेकर हुआ खूनी युद्ध

जायफल को ‘कब्जाने’ और व्यापार में मोटी कमाई के चलते 16वीं शताब्दी में एक बड़ा युद्ध भी लड़ा गया था. पुर्तगालियों को पता चला कि इंडोनेशिया का पूरा बांडा द्वीप जायफल के पेड़ों से आच्छादित है तो वहां के लोकल लोगों का संहार कर वे जायफल को इकट्ठा कर उसे दूसरे देशों में बेचने लगे. इसकी भनक डचों को लगी, तो उन्होंने पुर्तगालियों से खूनी युद्ध कर इस द्वीप को अपने अधीन कर लिया. बाद में बांडा को लेकर अंग्रेजों ने डच सेना और कारोबारियों को मारकर अंत में इस द्वीप पर अपना झंडा फहरा दिया. जायफल को लेकर यह क्षेत्र करीब डेढ़ सौ साल तक युद्ध का मैदान बना रहा है.

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रहस्य से भरे हुए हैं इसके गुण

जायफल के गुण ‘रहस्य से भरे’ भी रहे हैं. भारत में मसाले के अलावा पूजा कार्यों व हवन आदि में जायफल को उच्च स्थान हासिल है. ऐसी मान्यता है कि जायफल को शिवलिंग पर चढ़ाने से मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं. जायफल का इस्तेमाल कुछ देशों में तंत्र विद्या व घरेलू टोटकों में भी किया जाता है. इसे भड़काऊ (inflammatory) मसाला भी माना जाता है. इसका ज्यादा सेवन मतिभ्रम कर देता है. पुराने समय में इसका उपयोग मादक पेय बनाने के लिए भी होता था. सम्राट हेनरी VI ने अपने राज्याभिषेक से पहले रोम की सड़कों पर जायफल फैलाकर एक मधुर महक वाला वातावरण बनाया. मध्ययुग में जब ब्रिटेन में प्लेग की बीमारी फैली थी, तब जायफल की औषधि से इसका बचाव किया गया था. आज जायफल मीठे और नमकीन दोनों तरह के व्यंजनों में रस घोलता नजर आता है.

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पुराने समय में जायफल का उपयोग मादक पेय बनाने के लिए भी होता था.

नींद न आने पर भी कारगर

जायफल में सूक्ष्मजीवरोधी (Antimicrobial), प्रतिरोधात्मक क्षमता (Antioxidants) और सूजनरोधी (Anti Inflammatory) जैसे प्रभाव पाए जाते हैं. यह कई पोषक तत्वों से भरपूर है. वैद्याचार्यों और आहार विशेषज्ञों का कहना है कि इसके तेल से शिशु की मालिश की जाए तो वह स्वस्थ तो रहेगा ही उसकी हड्डियां भी मजबूत होगी. जायफल कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करने में मदद कर सकता है. अगर एक कप गर्म दूध में आधा चम्मच शहद और पिसी हुई इलायची के साथ दो चुटकी जायफल पाउडर को डालकर पिया जाए तो इन्युनिटी क्षमता बढ़ जाती है.
जिन लोगों को अनिद्रा की समस्या है, वे रात को सोने से पहले इसके पाउडर की छोटी खुराक ले लें तो नींद बेहतर आने लगेगी. यह ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल में रखता है. इसमें पाए जाने वाले अनोखे तत्व शरीर में होने वाली पुरानी सूजन और गठिया से राहत दिलाने में मदद करते हैं.

जायफल की तासीर है गर्म

स्किन व गठिया से जुड़ी आयुर्वेदिक दवाओं में जायफल का उपयोग किया जाता है. लेकिन इसका जरा भी अधिक सेवन परेशानियां पैदा कर सकता है. चूंकि इसकी तासीर गर्म होती है, इसलिए इसका ज्यादा सेवन आंख में जलन, सिरदर्द, चक्कर, त्वचा में लाल चकत्ते, मुंह सूखना आदि की समस्या पैदा कर सकता है. जिन लोगों को एलर्जी की शिकायत है, उन्हें इसके सेवन से बचना चाहिए.

Tags: Food, Lifestyle

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