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Jaun Elia: जॉन एलिया की पुण्यतिथि पर पढ़ें उनके ये शेर

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Updated: November 8, 2019, 1:04 PM IST
Jaun Elia: जॉन एलिया की पुण्यतिथि पर पढ़ें उनके ये शेर
पाकिस्तानी कवि जॉन एलिया के मशहूर शेर

जॉन एलिया (Jaun Elia) पुण्यतिथि: न एलिया उर्दू के मशहूर शायर थे. वो पाकिस्तान के रहने वाले थे. उर्दू के अलावा, अरबी भाषा, अंग्रेजी, पर्शियन, संस्कृत और हिब्रू भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ थी...

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  • Last Updated: November 8, 2019, 1:04 PM IST
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जॉन एलिया (Jaun Elia) पुण्यतिथि: आज मशहूर शायर जॉन एलिया (Jaun Elia) की पुण्यतिथि है. जॉन एलिया उर्दू के मशहूर शायर थे. वो पाकिस्तान के रहने वाले थे. उर्दू के अलावा, अरबी भाषा, अंग्रेजी, पर्शियन, संस्कृत और हिब्रू भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ थी. उनका वास्तविक नाम सैयद सिब्त ए असगर नकवी (Syed Sibt-e-Ashgar Naqvi) था. कविताकोश से हमने उनके कुछ शेर लिए हैं. आइए उनकी पुण्यतिथि पर पढ़ते हैं उनकी कुछ मशहूर शेर...

  1. उसके पहलू से लग के चलते हैं
    हम कहीं टालने से टलते हैं



मै उसी तरह तो बहलता हूँ
और सब जिस तरह बहलतें हैं
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वो है जान अब हर एक महफ़िल की
हम भी अब घर से कम निकलते हैं

क्या तकल्लुफ्फ़ करें ये कहने में
जो भी खुश है हम उससे जलते हैं
अजब था उसकी दिलज़ारी का अन्दाज़
वो बरसों बाद जब मुझ से मिला है
भला मैं पूछता उससे तो कैसे
मताए-जां तुम्हारा नाम क्या है?

साल-हा-साल और एक लम्हा
कोई भी तो न इनमें बल आया
खुद ही एक दर पे मैंने दस्तक दी
खुद ही लड़का सा मैं निकल आया

दौर-ए-वाबस्तगी गुज़ार के मैं
अहद-ए-वाबस्तगी को भूल गया
यानी तुम वो हो, वाकई, हद है
मैं तो सचमुच सभी को भूल गया

रिश्ता-ए-दिल तेरे ज़माने में
रस्म ही क्या निबाहनी होती
मुस्कुराए हम उससे मिलते वक्त
रो न पड़ते अगर खुशी होती

दिल में जिनका निशान भी न रहा
क्यूं न चेहरों पे अब वो रंग खिलें
अब तो खाली है रूह, जज़्बों से
अब भी क्या हम तपाक से न मिलें

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शर्म, दहशत, झिझक, परेशानी
नाज़ से काम क्यों नहीं लेतीं
आप, वो, जी, मगर ये सब क्या है
तुम मेरा नाम क्यों नहीं लेतीं

2. रूह प्यासी कहाँ से आती है
ये उदासी कहाँ से आती है

दिल है शब दो का तो ऐ उम्मीद
तू निदासी कहाँ से आती है

शौक में ऐशे वत्ल के हन्गाम
नाशिफासी कहाँ से आती है

एक ज़िन्दान-ए-बेदिली और शाम
ये सबासी कहाँ से आती है

तू है पहलू में फिर तेरी खुशबू
होके बासी कहाँ से आती है

3. गँवाई किस की तमन्ना में ज़िंदगी मैं ने
वो कौन है जिसे देखा नहीं कभी मैं ने

तेरा ख़याल तो है पर तेरा वजूद नहीं
तेरे लिए तो ये महफ़िल सजाई थी मैं ने

तेरे अदम को गवारा न था वजूद मेरा
सो अपनी बेख़-कनी में कमी न की मैं ने

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हैं मेरी ज़ात से मंसूब सद-फ़साना-ए-इश्क़
और एक सतर भी अब तक नहीं लिखी मैं ने

ख़ुद अपने इश्वा ओ अंदाज़ का शहीद हूँ मैं
ख़ुद अपनी ज़ात से बरती है बे-रुख़ी मैं ने

मेरे हरीफ़ मेरी यक्का-ताज़ियों पे निसार
तमाम उम्र हलीफ़ों से जंग की मैं ने

ख़राश-ए-नग़मा से सीना छिला हुआ है मेरा
फ़ुग़ाँ के तर्क न की नग़मा-परवरी मैं ने

दवा से फ़ाएदा मक़सूद था ही कब के फ़क़त
दवा के शौक़ में सेहत तबाह की मैं ने

ज़बाना-ज़न था जिगर-सोज़ तिश्नगी का अज़ाब
सो जौफ़-ए-सीना में दोज़ख उंड़ेल ली मैं ने

सुरूर-ए-मय पे भी ग़ालिब रहा शूऊर मेरा
के हर रिआयत-ए-ग़म ज़हन में रखी मैं ने

ग़म-ए-शुऊर कोई दम तो मुझ को मोहलत दे
तमाम उम्र जलाया है अपना जी मैं ने

इलाज ये है के मजबूर कर दिया जाऊँ
वगर्ना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैं ने

रहा मैं शाहिद-ए-तन्हा नशीन-ए-मसनद-ए-ग़म
और अपने कर्ब-ए-अना से ग़रज़ रखी मैं ने

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First published: November 8, 2019, 1:04 PM IST
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