लाइव टीवी

ख़ुद अपनी ज़िन्दगी से वहशत-सी हो गई है, पढ़ें जोश मलीहाबादी की शायरी

News18Hindi
Updated: May 21, 2020, 7:27 AM IST
ख़ुद अपनी ज़िन्दगी से वहशत-सी हो गई है, पढ़ें जोश मलीहाबादी की शायरी
जोश मलीहाबादी की शायरी

जोश मलीहाबादी की शायरी (Josh Malihabadi Shayari) : इबादत करते हैं जो लोग जन्नत की तमन्ना मे, इबादत तो नहीं है इक तरह की वो तिजारत है...

  • Share this:
जोश मलीहाबादी की शायरी (Josh Malihabadi Shayari) : जोश मलीहाबादी उर्दू के मशहूर शायर थे. उनकी पैदाइश भारत में थी. लेकिन भारत पाकिस्तान बंटवारे के बाद जोश मलीहाबादी और उनका परिवार पाकिस्तान चला गया. जोश मलीहाबादी तखल्लुस जोश के नाम से कविताएं लिखते थे. 'यादों की बारात' उनकी आत्मकथा है. आज हम आपके लिए कविताकोश के सभार से जोश मलीहाबादी की कुछ शायरियां लेकर आए हैं...

तू अगर सैर को निकले तो उजाला हो जाए...
तू अगर सैर को निकले तो उजाला हो जाए .
सुरमई शाल का डाले हुए माथे पे सिरा,



बाल खोले हुए सन्दल का लगाए टीका,
यूँ जो हँसती हुई तू सुब्ह को आ जाए ज़रा,


बाग़-ए-कश्मीर के फूलों को अचम्भा हो जाए,
तू अगर सैर को निकले तो उजाला हो जाए .

ले के अँगड़ाई जो तू घाट पे बदले पहलू,
चलता-फिरता नज़र आ जाए नदी पर जादू,
झुक के मुँह अपना जो गँगा में ज़रा देख ले तू,
निथरे पानी का मज़ा और भी मीठा हो जाए,
तू अगर सैर को निकले तो उजाला हो जाए .

सुब्ह के रँग ने बख़्शा है वो मुखड़ा तुझको,
शाम की छाँव ने सौंपा है वो जोड़ा तुझको,
कि कभी पास से देखे जो हिमाला तुझको,
इस तिरे क़द की क़सम और भी ऊँचा हो जाए,
तू अगर सैर को निकले तो उजाला हो जाए .

ख़ुद अपनी ज़िन्दगी से वहशत-सी हो गई है ...
ख़ुद अपनी ज़िन्दगी से वहशत-सी हो गई है
तारी कुछ ऐसी दिल पे इबरत-सी हो गई है

ज़ौक़े-तरब से दिल को होने लगी है वहशत
कुछ ऐसी ग़म की जानिब रग़बत-सी हो गई है

सीने पे मेरे जब से रक्खा है हाथ तूने
कुछ और दर्द-ए-दिल में शिद्दत-सी हो गई है

मुमकिन नहीं के मिलकर रसमन ही मुस्कुरा दो
तुमको तो जैसे हमसे नफ़रत-सी हो गई

अब तो है कुछ दिनों से यूँ दिल बुझा-बुझा सा
दोनों जहाँ से गोया फ़ुरसत-सी हो गई

वो अब कहाँ हैं लेकिन ऐ हमनशीं यहाँ तो
मुड़-मुड़ के देखने की आदत-सी हो गई है

ऐ "जोश" रफ़्ता-रफ़्ता शायद हमारे दिल से
ज़ौक़-ए-फ़सुर्दगी को उल्फ़त-सी हो गई है.

इबादत करते हैं जो लोग जन्नत की तमन्ना में....

इबादत करते हैं जो लोग जन्नत की तमन्ना में
इबादत तो नहीं है इक तरह की वो तिजारत है

जो डर के नार-ए-दोज़ख़ से ख़ुदा का नाम लेते हैं
इबादत क्या वो ख़ाली बुज़दिलाना एक ख़िदमत है

मगर जब शुक्र-ए-ने'मत में जबीं झुकती है बन्दे की
वो सच्ची बन्दगी है इक शरीफ़ाना इत'अत है

कुचल दे हसरतों को बेनियाज़-ए-मुद्दा हो जा
ख़ुदी को झाड़ दे दामन से मर्द-ए-बाख़ुदा[5] हो जा

उठा लेती हैं लहरें तहनशीं होता है जब कोई
उभरना है तो ग़र्क़-ए-बह्र-ए-फ़ना हो जा.

 
First published: May 21, 2020, 7:26 AM IST
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
corona virus btn
corona virus btn
Loading