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जेंडर न्यूट्रल पैरेंटिंग: बच्चे की परवरिश के दौरान न करें लड़के-लड़की में फर्क, ध्यान रखें ये बातें

बच्चे को जेंडर के आधार पर कलर स्पेसिफिक या टॉय स्पेसिफिक न बनाएं.

बच्चे को जेंडर के आधार पर कलर स्पेसिफिक या टॉय स्पेसिफिक न बनाएं.

जेंडर न्यूट्रल पैरेंटिंग आज भी चुनौतीपूर्ण है. पैरेंट्स बच्चों के बीच भेदभाव नहीं करना चाहते हैं, लेकिन सालों से बनी आद ...अधिक पढ़ें

बच्चे किसी भी तरह की सीमित सोच में न बंधे, यह लगभग हर पैरेंट्स की चाहत होती है. लड़का हो या लड़की वो हर काम करने और ज़िंदगी में हर चुनौती को स्वीकारने के लिए तैयार रहे, इसे ही जेंडर इक्वलिटी माना जाता है. जेंडर न्यूट्रल पैरेंटिंग के लिए आपको हर दिन थोड़ा-थोड़ा कदम बढ़ाने की ज़रूरत है.

बच्चे को जेंडर के आधार पर कलर स्पेसिफिक या टॉय स्पेसिफिक न बनाएं. अनजाने में ही सही माता-पिता, घरवाले और रिश्तेदार बच्चे के जेंडर के हिसाब से गिफ्ट्स देते हैं. ये छोटी-छोटी चीज़ें हैं, जो बच्चे के दिमाग में लड़का या लड़की होने का भ्रम भरते हैं. ज़रूरी है कि इन घर के बड़े इन आदतों पर ध्यान दें और इसे बदलें.

बिटिया के लिए डॉल और बेटे को कार

पैरेंट्स होने के के नाते बच्चे के लिए आपसे बेहतर कोई नहीं सोच सकता है. यह बात सच है, लेकिन कभी भी किसी भी खिलौने को इस आधार पर न खरीदें, जिसपर जेंडर से जुड़ा ठप्पा लगा हुआ है. जैसे किचन सेट बेटी के लिए और बाइक बेटे के लिए. ऐसे ही बेटी के लिए डॉल और टेडी लाना, जबकि बेटे के लिए कार या सुपरहीरो से जुड़े टॉय. बेटा हो या बेटी, उसे हर तरह के खिलौने दें जिससे उनके मन में लड़का या लड़की होने जैसे ख्याल न आए.

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जेंडर स्पेसिफिक रंगों से बचें

लड़कियों के लिए पिंक और लड़कों के लिए ब्लू कलर होता है, इस भ्रम से पहले आप निकलें और फिर बच्चे को निकालें. कई पैरेंट्स बच्चे के रूम  इंटीरियर डेकोरोशन भी जेंडर स्पेसिफिक होकर करते हैं. लड़के के कमरे में ब्लू कलर और सुपरहीरोज़ के पोस्टर्स होते हैं, जबकि लड़कियों के रूम को  पिंक और बार्बी के थीम से डेकोरेट किया जाता है. जेंडर न्यूट्रल पैरेंटिंग की शुरुआत इन कदमों के साथ करें.

लड़कियां रोती हैं, लड़के नहीं!

कई पैरेंट्स अपने रोते हुए बच्चे को यह कहकर चुप कराने की कोशिश करते हैं कि लड़के रोया नहीं करते या तुम लड़कियों की तरह क्यों रो रहे हो. ऐसा कहकर दरअसल आप बच्चे के मन में यह बैठा देते हैं कि लड़कों को रोना नहीं चाहिए. वहीं लड़कियों में यह भावना विकसित होने लगती हैं कि लड़कियां रोती हैं और इसमें कोई बुराई नहीं है.

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जेंडर और खेल का नहीं है कनेक्शन

अगर लड़कियां कोई रफ-टफ गेम जैसे क्रिकेट, कबड्डी या फुटबॉल जैसे गेम खेलना चाहती हैं, तो कई बार पैरेंट्स उसे कह देते हैं कि लड़कियों वाले खेल खेलो. वहीं अगर लड़के घर-घर या लड़कियों के साथ खेलने में रूचि दिखाते हैं, तो परिवार उन्हें लड़कों वाले खेल खेलने की नसीहत देता है. अगर आप खुद को इस सोच से बाहर निकाल पाते हैं, तो यकीनन आप जेंडर न्यूट्रल पैरेंटिंग कर पाएंगे.

किचन किसी एक जेंडर के लिए नहीं बना

लड़के जब रसोई में आते हैं, तो उन्हें यह पूछकर किचन से बाहर कर दिया जाता है कि यहां तुम्हारा क्या काम है. लड़के बड़े होते-होते इस बात को मान लेते हैं कि किचन में उसका कोई काम नहीं है. वहीं जब घर खर्चों से जुड़ी बातें  होती है, तो ज्यादातर घरों कि महिलाएं उस चर्चा का हिस्सा नहीं होती है, जिस वजह से घर की बच्ची भी खुद को ऐसे चर्चों से दूर मानने लगती है.

Tags: Lifestyle, Parenting tips

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