#PGStory: लड़कियां मैचिंग ब्रा पहनकर डेट पर दौड़ी जा रही थीं

अभी थोड़ी देर पहले अपनी जिस गरीबी और लाचारी पर मैं शर्मिंदा थी, फातिमा को देखकर वो जाती रही. मुझे अपना शहर याद आया, अपना घर, अपना सच और अपने वो सारे सपने, जिन्‍हें लेकर मैं इस महानगर में आई थी. जीवन में कुछ बनने, अपने पैरों पर खड़े होने. मुंह पोतकर डेट पर जाने के लिए नहीं

Manisha Pandey
Updated: July 26, 2018, 6:06 PM IST
#PGStory: लड़कियां मैचिंग ब्रा पहनकर डेट पर दौड़ी जा रही थीं
प्रतीकात्मक तस्वीर
Manisha Pandey
Updated: July 26, 2018, 6:06 PM IST
(News18 हिन्दी की सीरीज़ 'पीजी स्‍टोरी' की ये 36वीं कहानी है. इस सीरीज़ में पीजी में रहने वाली उन लड़कियों और लड़कों के तजुर्बों को सिलसिलेवार साझा किया जा रहा है, जो अपने घर, गांव, कस्‍बे और छोटे शहर से निकलकर महानगरों में पढ़ने, अपना जीवन बनाने आए. हममें से ज़्यादातर साथी अपने शहर से दूर, कभी न कभी पीजी में रहे या रह रहे हैं. मुमकिन है, इन कहानियों में आपको अपनी जिंदगी की भी झलक मिले. आपके पास भी कोई कहानी है तो हमें इस पते पर ईमेल करें- ask.life@nw18.com. आपकी कहानी को इस सीरीज में जगह देंगे.

इस सीरीज में आज पढ़िए गोरखपुर के एक मामूली परिवार से मुंबई पढ़ने गई एक लड़की की कहानी, जो मुंबई की चमक-दमक में कुछ देर के लिए अपनी जमीन खो बैठी.)

ये कहानी 18 साल पुरानी है. 2018 में शायद इसमें ऐसी कुछ चौंकाने वाली बात न लगे, लेकिन 2001 में ये मेरी जिंदगी का एक चौंकाने वाला अनुभव जरूर था.

साल 2001 में मुंबई यूनिवर्सिटी में एडमिशन हुआ. हॉस्‍टल नहीं मिला तो पीजी की खोज शुरू हुई. मुंबई में कहां पीजी हुआ करते हैं. लोगों के घर ही मुर्गी के दड़बों जैसे होते हैं. मैं उत्‍तर प्रदेश के शहर गोरखपुर के किसी संपन्‍न परिवार से नहीं थी, लेकिन फिर भी हमारे घर के सामने बड़ा सा दालान, 20 बाई 20 के कमरे और बड़ी सी छत थी. मुंबई में करोड़पति भी इतने बड़े घर में नहीं रहते. मुझे नहीं पता था कि सिर पर एक अदद छत के लिए समंदर वाले इस खूबसूरत शहर में इतनी जूतियां रगड़नी पड़ेंगी. लेकिन जिंदगी मेहरबान हुई और 62 साल की गुजराती सिंधी आंटी के घर में चल रहे एक पीजी में शरण मिल गई. कलीना का वो इलाका अभी भी ऊंची इमारतों का जंगल नहीं बना था. पुरानी डिजाइन के घर और उनमें पांच-पांच कमरे अभी भी शहर के पुराने बाशिंदों के लिए सपना नहीं हुए थे.

ऐसे ही एक दो मंजिला 7 कमरों वाले पुरानी शैली के बने घर में उर्मिला कलवानी आंटी अपना पीजी चलाती थीं. 62 साल की आंटी विधवा थीं, बच्‍चे विदेश जाकर बस गए थे. इतना बड़ा घर काटता था. वो तो भला हो मुंबई यूनिवर्सिटी के उस कैंपस का, जो उनके घर से एक किलोमीटर की दूरी पर ही खुला था. दूर शहर से मुंबई पढ़ने आने वाली लड़कियों के लिए उन्‍होंने घर में ही एक पीजी खोल लिया. आय का जरिया भी हो गया और घर में रौनक भी आ गई.



7 कमरों वाले उस पीजी में कुल 21 लड़कियां रहती थीं. तीन टॉयलेट-बाथरूम थे. सुबह-सुबह थोड़ी हाय-तौबा होती थी, लेकिन गुजारा चल जाता था.

तरह-तरह की लड़कियां थीं उस पीजी में. गुजराती, मराठी, साउथ इंडियन और बंगाली. उत्‍तर प्रदेश से मैं अकेली थी. कभी आंटी की किट-किट तो कभी उनके प्‍यार के बीच दिन गुजर रहे थे. तभी वो दिन आ पहुंचा, जो मेरी जिंदगी में पहली बार ही आया था.

सुबह साढ़े सात के आसपास सोकर उठी तो लगा मानो पीजी में कोई तूफान आ गया हो. चारों ओर हड़कंप मचा हुआ था. कोई लड़की बाल्‍टी लेकर भाग रही थी, तो कोई तौलिया लपेटे बदहवास बाथरूम के सामने लाइन में खड़ी थी. एक लाइन से बने कमरों के दो कोनों पर बाथरूम हुआ करते थे. एक कोने में और दूसरा पूरा कॉरीडोर पारकर दूसरे कोने में. एक तरफ के बाथरूम में जगह न मिलने पर लड़कियां कॉरीडोर में दौड़ लगा रही थीं और दूसरी ओर वाले बाथरूम की तरफ भाग रही थीं. वहां भी मायूसी ही हाथ लगने की हालत में और बेचैन हुई जा रही थीं.

दौड़भाग का कुछ ऐसा ही दृश्‍य बाकी के दिनों में भी नमूदार हो ही जाया करता था, लेकिन मसाइल इतना संगीन आज से पहले कभी न हुआ था. मैं आश्‍चर्य से भरी, लड़कियों को दौड़ लगाते देख रही थी. आश्‍चर्य तब और भी भारी हो गया, जब याद आया कि आज तो संडे है. यानी आज यूनिवर्सिटी भी नहीं जाना. फिर ऐसी कौन सी आफत आन पड़ी है कि ये सारी लड़कियां जल्‍दी से जल्‍दी नहा लेने के लिए उतावली हुई जा रही हैं.

हालांकि बदहवासी का ये आलम सिर्फ नहा लेने पर खत्‍म हो गया हो, ऐसा नहीं था. नहाने के बाद शुरू हुआ तैयार होने का सिलसिला. एक से एक बेशकीमती लिबासों में लड़कियां खुद को लपेटने लगीं. सबने बड़े सुंदर-सुंदर कपड़े पहने थे. वो गोअन क्रिश्चियन पामेला की नीली स्‍कर्ट आज कहर ढा रही थी. माला मलवानी ने जो कत्‍थई रंग का टॉप पहना था, वो कंधों से खुला हुआ था. सबीहा बेग का बुर्का आज नदारद था और वो धानी रंग का कुर्ता पहने फटाफट शलवार में नाड़ा डालने में मुब्तिला थीं. लड़कियां अपने सबसे सुंदर कपड़े पहन रही थीं, श्रृंगार कर रही थी. कोई किसी से काजल उधार मांग रही थी तो कोई लिप्‍सटिक. कोई मैचिंग ईयर रिंग की तलाश में एक-दूसरे का दरवाजा खटखटा रही थी तो कोई सैंडल हाथों में लेकर दौड़ी जा रही थी. रेबेका का इंपोर्टेड मेकअप-किट एक कमरे से दूसरे कमरे में दौड़ रहा था. जो लड़कियां कल तक एक-दूसरे की शक्‍ल भी देखना पसंद नहीं करती थीं, आज दोस्‍त हो गई थीं और एक दूसरे के साथ अपनी मैचिंग ज्‍वेलरी शेयर कर रही थीं.



श्रृंगार के सभी पक्षों का इतनी बारीकी से ख्‍याल रखा जा रहा था कि ब्रा तक अगर मैचिंग न हो तो उसकी शामत आई समझो.

मैं मूक दर्शक बनी इस सारे तमाशे को देख रही थी, कहीं मदद में साझेदार भी हुई. पलंग के नीचे जो काली पुरानी ब्रा डेजरे से गुस्‍से में फेंकी थी, उसे मैंने ही गर्दन घुसाकर बाहर निकाला, रेबेका की मेकअप किट भी मैं ही उसके कमरे से मांगकर लाई. लेकिन अब तक मुझे इस सवाल का जवाब नहीं मिला था कि इस कयामत की वजह क्‍या है.

खैर, यह भी ज्‍यादा देर तक रहस्‍य न रह सका.

हुआ ये था कि उस दिन 14 फरवरी थी यानी वेलेंटाइन डे. ये सारी लड़कियां अपने प्रेमियों के साथ डेट पर जाने की खुशी में सुबह से बावली हुई फिर रही थीं. मैंने उस दिन पहली बार वेलेंटाइन डे का नाम सुना था. गोरखपुर के हमारे स्‍कूल और कॉलेज में वेलेंटाइन डे नहीं मनाया जाता था. मनाना तो छोड़ो, वहां तो ब्‍वॉयफ्रेंड बनाने की भी इजाजत नहीं थी. लड़की की लड़के से दोस्‍ती होती भी तो कोई ऐसे खुलेआम डेट पर नहीं जाता था. छिप-छिपकर मिलते थे. यहां तो सब खुल्‍ला खेल. लड़कियां न सिर्फ डेट पर जा रही थीं, बल्कि ढोल पीटकर जा रही थीं.

11 बजते-बजते पीजी लगभग खाली हो गया. मुझे लगा, मैं ही दुनिया की इकलौती अभागी लड़की हूं, जिसे कोई प्‍यार नहीं करता. बाकी दिनों में कभी इतनी शिद्दत से ब्‍वायफ्रेंड की कमी महसूस नहीं हुई थी. इतनी सारी लड़कियों को इस कदर प्‍यार में डूबते-उतराते देख उस दिन मुझे अपना जीवन अकारथ लगा.



मैं यूं ही उदासी में कॉरीडोर में टहल रही थी कि तभी मेरी नजर आखिर वाले कमरे के दरवाजे पर पड़ी. दरवाजा हल्‍का-सा खुला था. मैंने खोला तो देखा अंदर कोई था. बाहर से सिर्फ उसकी पीठ दिख रही थी. फातिमा शेख अपनी किताब पर झुकी हुई थी. चारों ओर किताबों का ढेर. इतनी शांत और तल्‍लीन. उसे देखकर लग ही नहीं रहा था कि अभी थोड़ी देर पहले पीजी में तो तूफान आकर गुजरा है, उसे उसकी तनिक भी भनक हो. ये तो ऐसा ही था कि डीजे के शोर में कोई बैठकर टैगोर की कविताएं पढ़े.

दरवाजे की आवाज से फातिमा का ध्‍यान टूटा. उसने मुड़कर मुझे देखा, मुस्‍कुराई और वापस अपनी किताब में डूब गई.

उसका कमरा सबसे सादा था, उसके कपड़े सबसे फीके. लेकिन उसकी आंखों में चमक थी. एक वही थी, जो अपने मामूली निम्‍न मध्‍यवर्गीय परिवार का सच और पिता के सपने को इस चमकीले शहर में आकर भूली नहीं थी. उसने एक भी बार इन लाल परियों के जैसा होने की कोशिश नहीं की थी.

अभी थोड़ी देर पहले अपनी जिस गरीबी और लाचारी पर मैं शर्मिंदा थी, फातिमा को देखकर वो जाती रही. मुझे अपना शहर याद आया, अपना घर, अपना सच और अपने वो सारे सपने, जिन्‍हें लेकर मैं इस महानगर में आई थी. जीवन में कुछ बनने, अपने पैरों पर खड़े होने. मुंह पोतकर डेट पर जाने के लिए नहीं.

मैंने फातिमा के कमरे का दरवाजा बंद किया और अपने कमरे के स‍िम्‍त मुड़ गई. आज रात बीतने से पहले मुझे प्रोजेक्‍ट पूरा करना था.

पढ़ें, इस सीरीज बाकी कहानियां-
#PGStory: 'गाड़ी रुकी, शीशा नीचे हुआ और मुझसे पूछा- मैडम, आर यू इंटरेस्टेड टू कम विद मी?'
#PGStory: 'वो चाकू लेकर दौड़ी और मुझसे बोली, सामान के साथ मेरा पति भी चुरा लिया'
#PGStory: 'जब 5 दोस्त नशे में खाली जेब दिल्ली से उत्तराखंड के लिए निकल गए'
#PGStory: '3 दोस्त डेढ़ दिन से पी रहे थे,अचानक हम में से एक बोला- इसकी बॉडी का क्या करेंगे'
#PGStory: मैंने उसके पूरे खानदान के सामने कहा, रात को गमले में पेशाब करना बंद कर दो
#PGStory: 'डेट पर गई दोस्त को देर रात पीजी वापस लाने के लिए बुलाई एम्बुलेंस'

इस सीरीज की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे लिखे  PG Story पर क्लिक करें.
पूरी ख़बर पढ़ें
अगली ख़बर