#PGStory: 'गर्लफ्रेंड और मैं कमरे में थे, पापा पहुंच गए सरप्राइज देने'

15 साल बीतने को हैं, पंकज के पिता की तरह उस लड़की ने हमें आज भी माफ नहीं किया.

Farha Fatima | News18Hindi
Updated: June 27, 2018, 9:51 AM IST
#PGStory: 'गर्लफ्रेंड और मैं कमरे में थे, पापा पहुंच गए सरप्राइज देने'
क़िस्सा, पीजी वाली लव स्टोरीज में से
Farha Fatima | News18Hindi
Updated: June 27, 2018, 9:51 AM IST
(News18 हिन्दी की नई सीरीज़ 'पीजी स्‍टोरीज़' की ये  सातवीं कहानी है. इस सीरीज में पीजी में रहने वाली उन लड़कियों और लड़कों के तजुर्बों को सिलसिलेवार साझा किया जा रहा है, जो अपने घर, गांव, कस्‍बे और छोटे शहर से निकलकर महानगरों में पढ़ने, अपना जीवन बनाने आए. हममें से ज़्यादातर साथी अपने शहर से दूर, कभी न कभी पीजी में रहे या रह रहे हैं. मुमकिन है, इन कहानियों में आपको अपनी जिंदगी की भी झलक मिले. आपके पास भी कोई कहानी है तो हमें इस पते पर ईमेल करें- ask.life@nw18.com. आपकी कहानी को इस सीरीज में जगह देंगे.

ये  कहानी 32 साल के दीपक (नाम बदला हुआ) की है. वे दिल्‍ली से हैं और अपने ही शहर में घर से दूर 3 सालों तक पीजी में रहे. इस दौरान उन्हें मिले तजुर्बे में से पेश है एक क़िस्सा. दीपक पेशे से प्रोफेसर हैं.)

एम.ए. पूरा कर लिया था. साल 2003 में रिसर्च कर रहे थे. घर से दूर और यूनिवर्सिटी के नज़दीक रहने का इंतज़ाम दिल्ली के मुनिरका की तंग गलियों के एक पीजी में हुआ. वहां हम लड़कों के पीजी में मालकिन आंटी से आंख बचाकर महिला मित्रों की एंट्री करवाना आम बात थी.

मुनिरका की तंग गली के पीजी में तीसरे माले पर एक लंबी लॉबी. लॉबी के दोनों तरफ 3-3 चौकोर कमरे. हर कमरे में एक किचन और बाथरूम था. एक कमरे में दो लड़के रहते. कुल मिलाकर हर 'डिब्बा' (कमरा) वन बीएचके सा था.



इन डिब्बों में रहने वाले कुछ ही लड़कों की महिला मित्र थीं और उनका रौब भी. मैं भी उनमें से एक था. महिला मित्र वाले लड़कों को सम्मान और ईर्ष्या की नज़रों से देखा जाता. सम्मान इसलिए क्योंकि उनकी मित्रों के आने पर कमरे में पकने वाले लजीज व्यजनों से पड़ोसी सिंगल लड़कों का भी भला होता. हमारे माले पर सिर्फ मेरी और पंकज की महिला मित्र थी.

मेरे कमरे में मैं और वरुण रहते थे. जब उसकी गर्लफ्रेंड आती मैं बाहर जाता और मेरी आती तो वो जाता. ये तय था कि इस बीच मकान मालकिन की आंखो में धूल झोंकने के लिए रूम पर बाहर से ताला लगेगा. ताला लगाने की तकनीक नायाब थी. बाहर से ताला लगा हुआ मालूम पड़ता पर लेकिन अंदर से खोला जा सकता था. ताला टेकनॉलोजी मकान मालिक के अलावा कोई और ऊपर आए तो उसके लिए गेट खोलने या झूठ बोलने से बचने के लिए थी.
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वो सर्दियों की दोपहर थी. मैं और मेरी मित्र पीजी का सबसे प्रिय व्यंजन मैगी पका रहे थे. दरवाज़े पर दस्तक हुई.



नियमों के अनुसार इस समय किसी दोस्त का आना निषेध था, जिसका श्रद्धा से पालन होता था. साफ था दस्तक अजनबी ने की थी. पर ये अजनबी था कौन, जिसे ताला भी नहीं दिखा. खिड़की से झांका तो पिताजी दरवाज़े पर थे.

तब पहली दफा होश फाख्ता का मतलब समझा था. मकान मालकिन को समझा सकते हैं, पिताजी को कैसे समझाएं कि तालाबंद कमरे में लड़की के साथ क्या कर रहे थे ? पिताजी गर्मी से परेशान थे और अंदर महिला मित्र घबराहट से. पुत्र और प्रेमी एक साथ परेशान थे, कोई रास्ता नहीं था.

मेरा रूममेट देवदूत की तरह कमरे के बाहर प्रकट हुआ. वो समझ गया माजरा क्या है. "अंकल नमस्ते, आप यहां, अरे अंकित तो आज एक्सट्रा क्लास के लिए बाहर गया है. मुझे पता होता आप आने वाले हैं तो मैं घर ही रहता. वो चाभी भी साथ ले गया. आप मेरे साथ आइए नीचे कॉमन हॉल में बैठते हैं."

रूममेट, पापा को ले गया. हम कमरे से निकले. लड़की को नीचे नहीं ले जा सकते थे. उसे सामने वाले डिब्बे में शिफ्ट किया. साथी के कमरे की चाभी एक-दूसरे के पास होना, पीजी में आम था.

लड़की सामने वाले रूम में. पापा नीचे. मैं सेफ़. मैंने मैगी का कटोरा महिला मित्र को दिया. महिला की मौजूदगी के सारे सबूत मिटा कर पिताजी को लेने नीचे गया. सीढ़ियों के पास मौजूद पिछले दरवाजे से बाहर निकला और फिर मेन गेट से वापसी करते हुए, "अरे पापा, आप यहां, आपने बताया नहीं. फोन कर देते. मैं क्लास में था."

रूममेट ने मेरी तरफ रोमांचित नज़रो से देखा, आंखो ही आंखो में इशारा हुआ कि सब ठिकाने पर है. पापा को ऊपर ले जाया जा सकता है. रूममेट, मैं और पापा सीढ़ियों से उपर चढ़े. कमरे में पहुंचे. हम दोनों दोस्तों ने राहत की सांस ली ही थी, अचानक चिल्लाने की आवाज़ आई. उसी कमरे से, जिसमें लड़की थी. पर ये आवाज़ ना लड़की की थी और न उस कमरे में रहने वाले लड़के की.

तो चीखा कौन ?

देखा तो नज़ारा वीभत्स था. उस कमरे में रहने वाले लड़के, यानि पंकज के पापा वहां खड़े थे.

वो बेटे से मिलने केरल से आए थे. आईएस की तैयारी कर रहे बेटे के लिए P3 वाला कंप्यूटर लाए थे. उसके कमरे में एक लड़की को पाकर उन्हें समझ आया देश सही दिशा में नहीं जा रहा. उनका बेटा देश के युवा की तरह भटक चुका है. वे चिल्ला रहे थे, वो सकपका रहा था. लड़की गुस्से से भरी थी. मैं घबरा रहा था और मेरे पिताजी इस लम्हे में गर्वित थे, उनका लड़का बिगड़ा नहीं, छुट्टी वाले दिन भी एक्सट्रा क्लास जाता है.



उस लड़के ने अपने पिता के सामने सैकड़ों दलीलें दी. समझाया वो लड़की को नहीं जानता, उसे चोरी और सीनाजोरी की कहावतों के साथ चुप करवा दिया गया. लड़की लगातार बोलने की कोशिश में थी. दोस्त के आग बबूला पापा ने उसे बोलने न दिया. श्राप देते हुए बोले, ये लड़की मेरे घर की बहू नहीं बन सकती. मैंने राहत की सांस ली.

मेरे पिताजी गर्व से प्रफुल्लित होकर बोले, आजकाल का युवा दिशाहीन हो रहा है. बेटा तुम ऐसा कभी मत करना, चलो अब यहां से. आज्ञाकारी बन मैं वहां से चल दिया. महिला मित्र ने हमें हिकारत से देखा.

15 साल बीतने को हैं, पंकज के पिता की तरह उस लड़की ने हमें आज भी माफ नहीं किया.

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