#PGStory: 'वो चाकू लेकर दौड़ी और मुझसे बोली, सामान के साथ मेरा पति भी चुरा लिया'

ये कहानी 28 साल की मौलश्री की है. वे साल 2015 में पुणे से दिल्‍ली अपने सपनों के साथ आईं. इन तीन सालों में उन्‍होंने जिंदगी और दिल्ली शहर को जीते हुए 5 नौकरियां और 5 घर बदले.

Farha Fatima | News18Hindi
Updated: August 30, 2018, 3:03 PM IST
#PGStory: 'वो चाकू लेकर दौड़ी और मुझसे बोली, सामान के साथ मेरा पति भी चुरा लिया'
(image: symbolic)
Farha Fatima | News18Hindi
Updated: August 30, 2018, 3:03 PM IST
(News18 हिन्दी की नई सीरीज़ 'पीजी स्‍टोरीज' की ये दूसरी कहानी है. इस सीरीज में पीजी में रहने वाली उन लड़कियों और लड़कों के तजुर्बों को सिलसिलेवार साझा किया जा रहा है, जो अपने घर, गांव, कस्‍बे और छोटे शहर से निकलकर महानगरों में पढ़ने, अपना जीवन बनाने आए. हममें से ज़्यादातर साथी अपने शहर से दूर, कभी न कभी पीजी में रहे या रह रहे हैं. मुमकिन है, इन कहानियों में आपको अपनी जिंदगी की भी झलक मिले. आपके पास भी कोई कहानी है तो हमें इस पते पर ईमेल करें- ask.life@nw18.com. आपकी कहानी को इस सीरीज में जगह देंगे.)

ये कहानी 28 साल की मौलश्री की है. वे साल 2015 में पुणे से दिल्‍ली अपने सपनों के साथ आईं. इन तीन सालों में उन्‍होंने जिंदगी और दिल्ली शहर को जीते हुए 5 नौकरियां और 5 घर बदले. आज वह एक मीडिया कंपनी में काम करती हैं.)

नौकरी पाने की कोशिश में पुणे में एक साल बीत गया था. देश की आधी आबादी की तरह संभावनाएं दिल्ली में नजर आईं. दिल्ली आने का फैसला 3 दिन के भीतर लिया. एक ही बैग था, उठाया और दिल्ली चली आई. दिल्ली ने हर पल ऐसे-ऐसे अनुभव दिए कि उनके बारे में सोचूं तो पसीने से भीग जाती हूं.

दिल्ली पहुंचकर ठौर-ठिकाने की खोज शुरू हुई. साउथ से नॉर्थ, उत्तम नगर से मालवीय नगर, पूरा दिल्ली छान मारा, धक्‍के खाए, ठुकराए गए. आखिरकार नोएडा में जाकर सिर पर छत नसीब हुई. नहीं जानती थी कि सिर पर एक छत के लिए इस बेरहम शहर में इतने धक्‍के खाने पड़ेंगे. यहां कुछ भी आसान नहीं था. घर ढूंढने में इतनी दिक्कतें आईं कि उस 5 मंजिला घर के सामने दोस्त के साथ खड़ी मैं अपने फैसले पर सवाल करने लगी. क्यों आई यहां, सही किया या गलत, आगे क्या होगा, पैसे कहां से आएंगे. ऐसे सैकड़ों सवाल ज़हन पर भारी थे और मेरा दिल बैठा जा रहा था.

पहला पीजी
आखिरकार उस पीजी में मुझे एक कमरा मिल गया, वही पांच मंजिला मकान. पीजी वाली आंटी के परिवार से मिलकर कुछ ठीक लगा. वो परिवार बंटवारे के बाद पाकिस्तान से भारत आया था. परिवार में दंपती के साथ दादी भी थीं.

नोएडा वाले पीजी की रूममेट
मेरे पहुंचने के एक दिन बाद वह आई. 4 बड़े-बड़े बैग्स चौथी मंजिल पर वो अकेले चढ़ा रही थी. मैंने मदद के लिए पूछा, उसने चेहरे पर एक लंबी सी मुस्कान के साथ इनकार कर दिया. वेषभूषा और शरीर के डील-डौल से उम्र लगभग 35 के आसपास लग रही थी. चार बैग अकेले उठाने वाली वो लड़की शादीशुदा थी, नाम था पूजा.



मेरे कुछ पूछने से पहले ही उसने अपने बारे में बताना शुरू कर दिया. शादी से पहले वो इसी पीजी में रहती थी, पीजी वाली आंटी बचपन में उसे स्कूल में पढ़ा चुकी हैं, उनके परिवार के साथ उसके पारिवारिक रिश्ते हैं, 3 साल पहले उसकी शादी हुई, कुछ दिनों पहले तक वो अपने पति के साथ द्वारका में रहती थी, अब पति विदेश चला गया है तो वो यहां रहने आ गई, उसके ससुराल वाले ऐसे हैं, घरवाले वैसे हैं, सास डायन तो ननद चुड़ैल... ब्‍ला...ब्‍ला... ब्‍ला... दस मिनट के अंदर वो अपनी पूरी जन्‍मकुंडली मेरे सामने खोलकर बैठ गई थी.

एक रोज़, मैं तैयार हो रही थी. उसने कहा, मैं उसे दीदी बुलाऊं क्योंकि उसे मुझमें अपनी छोटी बहन की छवि दिखती है. उसने मेरे कपड़ों से मैचिंग की बालियां दीं. मुझे अच्छी दोस्ती और रूममेटशिप की शुरुआत लगी.

वो पूरे दिन घर पर रहती, नौकरी नहीं करती थी. मैंने थिएटर जॉइन किया, सुबह से शाम वहीं बीतता. शाम को घर लौटती तो कई बार खाना भी बना मिलता. फिर वो धीरे-धीरे अपनी बेतरह निजी ज़िंदगी भी मुझसे साझा करने लगी.

एक रोज़ उसने बताया शादी के इतने सालों में वो कभी अपने पति के साथ अंतरंग नहीं हुई. पति के करीब आते ही वो घबराकर बेहोश हो जाती. उसकी बातों से समझ में आया कि पति भी उससे चिढ़ा रहता था. उम्र में बड़ा था और उसका एक्स्‍ट्रा मैरिटल अफेयर भी था.



उसके व्यवहार में अजीब से बदलाव हुए
कभी वो जरूरत से ज्यादा मीठी होती तो कभी चम्मच, प्लेट के लिए भी लड़ती. उसकी छोटी बहन हमारे पीजी के क़रीब वाले पीजी में ही रहती थी. मैंने पूछा, दोनों बहनें साथ क्यों नहीं रहतीं. उस पीजी में जगह नहीं है और वो आंटी की वजह से ये पीजी छोड़ना नहीं चाहती. बहुत बार कहती उसकी बहन बहुत स्मार्ट है. मुझे अकसर कहती, मैं उसे कद-काठी और लुक में उसकी बहन जैसी लगती हूं. पर अकसर मेरे साथ ये होता कि उसके चेहरे के हाव-भाव बदल जाते, उसकी आंखों में जलन और गुस्सा दिखाई देता. मैंने इसे बहनों के बीच कम्पटीशन समझा. फिर अचानक एक दिन वो पीजी से चली गई. उसकी तबीयत यकायक खराब हो गई थी. उसे ट्यूमर निकला था. मैंने कॉल किया, उसने उठाया नहीं.

तब तक थिएटर के साथ-साथ मैं नौकरी भी करने लगी थी. मेरा वक्‍त तो पंख लगाकर उड़ रहा था. नौकरी के चलते घर में रहने या आने-जाने का मेरा टाइम भी बदलता रहता था. एक रोज़ वो वापस आयी तो मैंने उसका हाल जानना चाहा. मेरे लाख पूछने पर भी उसने कोई जवाब नहीं दिया. अब वह हर किसी से बात करती थी, सिवाय मेरे.

डरावनी थी वो रात
एक रात मेरी नींद खुली तो वो मेरे बेड के पास खड़ी मुझे घूर रही थी. मैं डर गई. मैंने घबराकर उसके वहां खड़े होने की वजह पूछी. वह कुछ नहीं बोली. मुस्कुराकर बेड पर लेट गई. उस रात मुझे नींद नहीं आयी.

अगले दिन मैंने पीजी मालकिन से शिकायत की, रात का पूरा किस्सा बताया. जवाब में मुझे वो सुनने को मिला, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी. वो हर रोज मेरी शिकायत करने उनके पास जाती थी. ज्यादा देर नहाने, गंदी गैस छोड़ने, उसकी प्लेट में खाना खा लेने की शिकायत. पीजी आंटी ने ऐसी- ऐसी बातें बताईं, जिसका हकीकत से कोई वास्‍ता नहीं था.

मालकिन को उससे सहानूभुति थी. उसने कहा, बिन मां की बच्ची है. संवेदनशील है. शिकायत करने के अगले ही दिन मेरा सामान कभी कूड़ेदान में, कभी जमीन पर पड़ा मिलता. नहाने गयी तो उसने बाहर से कुंडी बंद कर दी. ये सब इतनी जल्दी हो रहा था कि रुककर कुछ समझ पाने का भी वक्‍त नहीं था.

उसने भी नौकरी जॉइन की. एक दोपहर मुझे क्लाइंट से मिलने जाना था. मैं सुबह 9 बजे उठकर टीवी देख रही थी. गैस पर भिंडी की सब्जी चढ़ाई थी. घर में सिर्फ मैं और वो ही थे. वो दनदनाते हुए आई, फ्रिज खोला और चिल्लाने लगी. मैंने उसका दूध का पैकेट चुराया है.

मैंने इत्मीनान से समझाया, दीदी आप फुल क्रीम वाला दूध लाती हैं और मैं डबल टोन्‍ड. फ्रिज में उसका वाला दूध का पैकेट ही रखा था. चोरी का कोई सवाल नहीं था. गुस्से में उसने दूध का पैकेट खोला, पूरा दूध जमीन पर गिर गया. वो जोर-जोर से चीखने लगी, 'तुम्हारे जैसी घटिया लड़की नहीं देखी मैंने, मेरी अलमारी से काजू बादाम चुराती हो, मेरा सामान चुराती हो और इतना ही नहीं, मेरा पति भी चुरा लिया.'



और फिर उसने मेरी सब्जी की कढ़ाई उठाकर जमीन पर पटक दी. मैं रुआंसी हो गयी. दौड़कर आंटी को बुलाया, अंकल भी साथ आए. सब्जी जमीन पर फैली थी. अंकल-आंटी को देखकर उसने फिर चीखना शुरू कर दिया.

'-तुम्हारे जैसी छोटे शहरों की लड़कियों को मैं खूब जानती हूं.
-नौकरी के नाम पर शहर में क्या-क्या करती हो, पैसा कमाने के लिए.
-मुझे ट्यूमर हुआ था तो तुम मेरा मज़ाक उड़ाती थी.
-भगवान करे तुमको ट्यूमर हो जाए, तुम्हारी बहन को ट्यूमर हो जाए, तुम्हारे पूरे खानदान को ट्यूमर हो जाए.'

वो बके जा रही थी. आंटी-अंकल ने उसे पकड़ने की कोशिश की. न जाने उस पर क्या सवार था. चाकू लेकर मेरे पीछे दौड़ी. चिल्लाती रही, 'जो अपनी बहन को धोखा दे सकती है, वो किसी की क्या सगी होगी. तुमने मेरा घर उजाड़ा है, देख लेना तुम्हारा घर कभी बस नहीं पाएगा.'

उसकी बे-मतलब बातें समझ से परे थीं. उसका गुस्सा और पागलपन बहुत डरावना था. मैं दरवाजा बंद कर कमरे में बैठी रही. अंकल-आंटी ने उसे समझाकर ऑफिस भेजा. उसके जाते ही आंटी ने मुझे बुलाकर कहा, 'बेटा, माफ करना, लेकिन अब तुम दोनों को ही घर खाली करना पड़ेगा.' मैं खुद वहां नहीं रहना चाहती थी. ऑफिस से छुट्टी ली, दो घंटे में नया पीजी ढूंढा और शाम 4 बजे तक वहां शिफ्ट हो गई.

वो लड़की अब तक मेरे लिए एक रहस्‍य ही थी. आखिरकार उसके इस विचित्र व्‍यवहार की वजह क्‍या थी? उसको हुआ क्‍या था? उसने क्‍यों कहा कि मैंने उसका पति चुराया है, जबकि मैं तो उसे जानती तक नहीं.

यह रहस्‍य कुछ समय बाद जाकर खुला. नए पीजी में एक लड़की मिली, जो पूजा को जानती थी. उसने जो बताया, उसी ने इस रहस्‍य से पर्दा उठाया.

उसके विचित्र व्‍यवहार की वजह 
पूजा का पति कहीं विदेश नहीं गया था. वो यहीं इंडिया में था और मयूर विहार में रहता था. पूजा उसके साथ रहने की जिद करती, लेकिन वो उसे अपने साथ रखना नहीं चाहता था. और पूजा के पति का अफेयर किसी और से नहीं, बल्कि उसी की छोटी बहन से चल रहा था.

अब कहानी साफ हो चुकी थी. मुझे याद आया, मुझमें वो अपनी छोटी बहन की छवि देखती थी. मुझे उसके लिए दुख हुआ. उससे हमदर्दी भी हुई, लेकिन आखिर मैं कर ही क्‍या सकती थी. मेरी अपनी जिंदगी के सौ झमेले थे. उसे मदद की जरूरत थी, लेकिन सच तो यही था कि मैं उसकी कोई मदद नहीं कर सकती थी.
मुझे पता नहीं आज वो कहां है, उसकी जिंदगी का क्‍या हुआ. बस दुआ करती हूं कि उसने अपने सम्‍मान, अपने स्‍वाभिमान की राह पा ली हो.

पढ़ें, इस सीरीज की पहली कहानी-
#PGStory: 'गाड़ी रुकी, शीशा नीचे हुआ और मुझसे पूछा- मैडम, आर यू इंटरेस्टेड टू कम विद मी?'

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