PG Story: मेरी रूममेट को महीने में एक बार चढ़ती थी ये सनक, मज़ेदार है वजह

दिल्‍ली में पढ़ाई पूरी करने के बाद पुणे पहुंची थी. यहां रहने के दौरान अलग- अलग तजुर्बे मिले.

News18Hindi
Updated: November 9, 2018, 4:55 PM IST
PG Story: मेरी रूममेट को महीने में एक बार चढ़ती थी ये सनक, मज़ेदार है वजह
पीजी स्‍टोरी
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Updated: November 9, 2018, 4:55 PM IST
ये कहानी अंकिता ओझा की है. अंकिता पुणे में रहती हैं. वे यहां एक मल्‍टीनेशनल कंपनी में जॉब करती हैं. इस दौरान उन्‍होंने जो कुछ भी महसूस किया वो साझा कर रही हैं.

मैं बिहार से ताल्‍लुक रखती हूं. यहीं से मेरी पढ़ाई- लिखाई पूरी हुई है. दिल्‍ली में बायोटेक्‍नोलाजी से पढ़ाई पूरी की थी. पुणे में जॉब लगी थी. मैंने ऑफिस के पास ही पीजी ले लिया था. यहां मुझे दो लड़कियों के साथ रूम शेयर करना था. मेरा दिल्‍ली में फ्लैट में रहने का अनुभव मिला- जुला रहा था. इसलिए दिल में ज्‍यादा बैचेनी तो नहीं थी लेकिन फिर भी नई जगह के लिए मन में हमेशा ऊहापोह की स्‍थिति तो रहती है. पता नहीं क्‍या होगा? कहीं ऐसा न हो कि इस ऑफिस में दिल ही न लगे? पीजी ठीक होगा या नहीं. रूममेट की वजह से कहीं कोई समस्‍या न हो.

खुदा का शुक्र था ऑफिस ठीक था. ऑफिस के लोग भी कूल थे लेकिन कहते हैं न जिंदगी में सब कुछ अच्‍छा हो जाए. ऐसा होता कहां हैं! अभी तो जिंदगी में बहुत कुछ होना बाकी था. शायद इसीलिए तो ऑफिस से घर आने का दिल नहीं करता था. दरअसल मेरी रूममेट प्रियंका शर्मा और रूबी थी. दोनों ही यूपी से थीं. दोनों के दिलों में ये बैठा था कि बिहार वाले ऐसे होते हैं. वैसे होते हैं. उन्‍होंने बिहार वालों के खिलाफ अलग ही फीलिंग सेट कर रखी थी, जो उनकी बातों में और हाव- भाव में साफ दिखती थी.

खैर मैं सोचती थी कि धीरे-धीरे ये सोच बदल जाएगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं. कह सकते हैं कि बात-बात में मतभेद होना शुरू हो चुका था. मैं चाहकर भी कुछ कर नहीं पा रही थी. वो कुछ समझना नहीं चाह रहीं थीं. मैं समझा भी नहीं  पा रही थीं. ये कहना मुश्‍किल हो रहा था. कभी-कभी हालात ये बनते थे कि बातचीत तक बंद हो जाती थी.

इसकी अपनी वजहें हैं. दरअसल पीजी में रहना किसी युद्ध से कम नहीं है. यहां के अपने नियम-कायदे होते हैं. वाशरूम मिलने से लेकर खाने तक हर चीज में बकायदा एक लंबी कतार में खड़ा होना होता है. कुछ- कुछ पीजी में साफ-सफाई खुद करनी पड़ती है. मेरे पीजी में भी ऐसा ही था. हमें अपना रूम साफ करना होता था. इसके लिए बकायदा हमने हफ्ते में दो- दो दिन बांट लिए थे. मैं और रूबी तो अपने दिन के हिसाब से काम कर लिया करते थे.

लेकिन प्रियंका ऐसा नहीं करती थीं. उसे महीने में उसे एक अजब सनक चढ़ती थी. 'सनक' शब्‍द का मैं इस्‍तेमाल इसलिए कर रही हूं, क्‍योंकि हफ्तों तक तो रूम में झाड़ू क्‍या कोई फटका तक नहीं मारती थी लेकिन  महीने में एक दिन उसे न जाने क्‍या हो जाता था. पूरे रूम को जंग के मैदान में तब्‍दील कर देती थी. किसी का भी सामान कहीं भी फैला देती थी. पूरे रूम में भूचाल ला देती थी. पीजी में इस तरह की बातें होना आम बात हैं. मगर कभी-कभी स्‍थितियां इतनी खराब हो जाती हैं कि झेलना मुश्‍किल हो जाता था. खैर मुझे लगा कि जब बात हाथ से ज्‍यादा फिसल रही है तो मैंने एक बार उसे समझाने की कोशिश की. शुक्र इस बात का जब मैंने उसे समझाया तो वो मान गई. उसने अपनी गलती को माना और कहा कि वो आगे से सफाई करते वक्बत दूसरों के सामान का ध्यान रखेगी.

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