#PGStory: फाइनल का रिजल्ट आया, मैं फेल था और गांव में पिताजी गुजर गए थे

#PGStory: फाइनल का रिजल्ट आया, मैं फेल था और गांव में पिताजी गुजर गए थे
प्रतीकात्मक तस्वीर

कहानी, छोटे शहर से पढ़ने आए उस लड़के की जिसका पूरा साल, शहर को, रंग को, जिंदगी को जानने में बीत गया

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(News18 हिन्दी की सीरीज़ 'पीजी स्‍टोरी' की ये 30वीं कहानी है. इस सीरीज में पीजी में रहने वाली उन लड़कियों और लड़कों के तजुर्बों को सिलसिलेवार साझा किया जा रहा है, जो अपने घर, गांव, कस्‍बे और छोटे शहर से निकलकर महानगरों में पढ़ने, अपना जीवन बनाने आए. हममें से ज़्यादातर साथी अपने शहर से दूर, कभी न कभी पीजी में रहे या रह रहे हैं. मुमकिन है, इन कहानियों में आपको अपनी जिंदगी की भी झलक मिले. आपके पास भी कोई कहानी है तो हमें इस पते पर ईमेल करें- ask.life@nw18.com. आपकी कहानी को इस सीरीज में जगह देंगे.

ये कहानी 47 साल के अभिषेक की है. वे 18 साल की उम्र में जौनपुर से इलाहबाद पढ़ाई करने गए.  परिवरा में बेहद गरीबी थी, मां-पिता ने अपनी कुल जमापूंजी से घर से दूर भेज दिया था. वहां जाकर जिंदगी के नए-नए रंग देखे. पेश है उन्हीं का किस्सा.)

18वें जन्मदिन और ब्याह का जश्न साथ साथ मना. ब्याह के चौथे ही दिन जौनपुर से इलाहबाद आना था. परिवार को लगा लड़का कहीं भटके न, इसलिए ब्याह करवा कर पढ़ाई करने भेजना 'सेफ' है. कहने को तो दोनों जगहें (जौनपुर और इलाहबाद) उत्तरप्रदेश में ही थी लेकिन हमारी आर्थिक स्थिती दूसरे राज्य में पढ़ने जाने की इजाजत न देती थी. वो साल 1988 था. चिट्ठियों का लेन देन होता था. फोन पर बात करने की हैसियत नहीं थी.



घर में सबकी थाली में नपी-तुली सब्जी के साथ गिनकर रोटियां दी जातीं. तीनों वक्त का खाना लगभग एक-सा होता. जिसे हम छप्पनभोग के चाव से खाते थे. मां-बाबूजी ने खाल खींच कर जोड़ी पाई-पाई से दाखिला इलाहबाद यूनिवर्सिटी में कराया. रहने का इंतजाम भी यूनिवर्सिटी के करीब हुआ. तब 'पेइंग गेस्ट' टर्म का मतलब भी नहीं मालूम था. कमरे में हमारे अलावा तीन और लड़के थे. सभी की आर्थिक स्थिती लगभग एक सी थी.


इलाहबाद आकर तमाम उथल-पुथल के बाद सबसे पहला काम जो किया, वो था भरपेट खाना. यहां हम खुद ही बनाने वाले थे. खाना तीनों वक्त छक कर खाते. पत्नी पढ़ी लिखी तो न थी पर अक्षर ज्ञान था. उन्होंने अपनी पढ़ाई का मापदंड चिट्ठी लिखना सीखने तक तय कर लिया था. डेढ़ महीने बाद उनका पहला ख़त आया था. टूटे-फूटे शब्द प्रेम और लज्जा से लबालब थे. उसके अरमान थे, अच्छे से पढ़िएगा, खाने पीने का खयाल रखना, जल्दी से नौकरी लग जाएगी तो हम भी शहर आएंगे. आपके साथ रहेंगे.

इलाहबाद यूनिवर्सिटी का माहौल जौनपुर की तुलना में बेहद मॉडर्न था. यहां लड़कियां साथ बैठतीं. साथ  हंसती, साथ खाना खाती, साथ पढ़ती. चुटकुले सुनाती, गाना गाती. चौड़ी सड़कें, बड़ी इमारतें, गाड़ियां थीं, लड़कियां हाथ मिला रही हैं, हंस रही हैं. बातें कर रही हैं.

जौनपुर में किसी लड़की से बात कर लेने भर से हाय तौबा मच जाती. इलाहबाद की दुनिया उसके जौनपुर से बिलकुल अलग है.



पैसे की तंगी तो थी ही 4 महीने बीत गए. गांव नहीं जा पाया. हर महीने पत्नी का प्रेम भरा खत पाकर मिलन को जी चाहता. यूनिवर्सिटी में पढ़ते हुए एक लड़की अच्छी लगने लगती है. लेकिन पत्नी को खत के जवाब में दोगुना दुलार भेजता. पर इस लड़की की ओर भी खिंचा चला जा रहा है.

उस मॉडर्न लड़की के लिए वह सिर्फ गांव का सीधा-सादा लड़का, क्लासमेट है. बखूबी जानती है वह उन सब से पिछड़ा है, समझती है उसका संघर्ष उनसे ज्यादा है. मदद करती है. क्लास में जो समझ नहीं पाया, वो समझा देना, नोट्स का लेन-देन उसके लिए महज मदद है. पर लड़के का आकर्षण बढ़ता जा रहा है. उसे इंप्रेस करने की जद्दोजहद, लड़की के पीछे भागने, उसका ध्यान अपनी ओर खींचने में वक्त जा रहा है. पढ़ाई से ध्यान हट रहा है.

बीच बीच में चिंताओं से भरी बाबूजी की चिट्ठी आ रही है. वे मन लगाकर पढ़ाई करने की अरजी लगा रहे हैं, घर की चिट्ठी में परेशानियों के अंबार के साथ पत्नी का खत प्रेम से भरा रहता है. लेकिन अब पत्नी की चिट्ठी उसे विचलित कर देती है.



वह शहर को वैसे ही जान रहा है, जैसे 2 बरस का बच्चा गाड़ी की खिड़की से अचरज से दुनिया देखता है. शहरी लड़की का आकर्षण बढ़ने की वजह ये भी है उसने पत्नी को अब तक सिर्फ चिट्ठियों से जाना है. उसे लगाता है ये शहरी लड़की वो है जिससे गले मिल सकता है. साथ चाट खा सकता है. हंस सकता है. उसे नहीं मालूम ये सब उसकी पत्नी भी कर सकती है. पत्नी का चेहरा पहली दफा शादी की रात डिबिया की रौशनी में देखा था, और चौथे दिन इलाहबाद आने तक इंटिमेट नहीं हुआ था.

एक शाम यूनिवर्सिटी के लड़कों के साथ बीयर पीते हुए पत्नी का जिक्र करता है. बातों बातों में बताता है, पत्नी के पास बैठने का भी उसे कोई तजुर्बा नहीं. वे पैसों का जुगाड़ कर उसे मीरगंज भजते हैं, जो कि वहां का रेड लाइट एरिया है. वो वहां से लौट आता है. शहर के सब रंगों को जानने, उनसे गुजरते हुए एक साल बीत गया. पूरा साल, शहर को, रंग को, जिंदगी को जानने में बीता. रिजल्ट आया, वो फेल.



रिजल्ट के लेटर के दिन यूनिवर्सिटी के फोन पर गांव से पहला फोन आया, पिताजी का देहांत हो गया. पांवों तले से जमीन खिसक गई, समझ आया इस एक साल में मैं कितना गैर-जिम्मेदार था. पूरे साल जिंदगी को लापरवाही से बिताया.

खैर... उसके बाद पास हुआ. आज स्टाफ सिलेक्शन कमीशन में सरकारी नौकर हूं. रायबरेली में नौकरी है. उम्र के लगभग दो पड़ाव बीतने को हैं, मालूम नहीं खुद को उस वक्त के लिए कैसे जज करूं. तब मैं गलत था या सिर्फ जी रहा था. नौकरी के बाद उस मॉडर्न लड़की ने भी शादी की. फिलहाल मुंबई में सेटल है. नौकरी करती है. पिछले साल ही फेसबुक पर देखा था. रिक्वेस्ट भेजी, फिर से दोस्त बने. अब हम कभी कभी बात करते हैं. पत्नी मेरे साथ शहर में है. दो बच्चे हैं, दादी और चाचा से खूब प्यार करते हैं.

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