PG Story: 20 घंटे से गई थी लाइट, पड़ोसियों ने छतों पर जमाई थी महफिल

पीजी की वो शाम, घर में चल रहे किसी फंक्शन जैसी थी. सब पड़ोसी एक दूसरे को छतों से छतों पर ही खाना शेयर कर रहे थे. तब तक मुझे नौकरी करते, पीजी में रहते एक साल बीत गया था.

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Updated: October 13, 2018, 1:10 PM IST
PG Story: 20 घंटे से गई थी लाइट, पड़ोसियों ने छतों पर जमाई थी महफिल
प्रतीकात्मक तस्वीर
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Updated: October 13, 2018, 1:10 PM IST
लखनऊ से ग्रेजुएशन के तुरंत बाद दिल्ली में प्लेसमेंट हो गई थी. फाइनल ईयर के एग्जाम्स के तीन दिन बाद ही दिल्ली आना था. पहली बार घर से निकली थी. घर से मम्मी-पापा कार से छोड़ने आए थे. लगभग 600 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद पहले दिन तो आकर सो गए थे.

पहले पीजी में ही सब फाइनल हो गया था. मम्मी-पापा सामान सैटल कराने के बाद घर लौट गए थे. सब सही था. मेरी सभी से बातचीत होने लगी थी. बॉन्डिंग बनने में वक्त लगा. मैं नोएडा में जॉब कर रही थी, पीजी भी थोड़ी ही दूर था. पीजी में सब ठीक था, सिवाय इस चीज के कि वहां लाइट बहुत जाती थी. पूरी गली में लगभग सभी के यहां इन्वर्टस हैं. उस दिन सुबह की लाइट गई अगले दिन दोपहर में आई थी.

उस रोज पूरी रात जागे. मैगी बनाकर खाई. लग रहा था, पूरी गली में जश्न सा हो रहा था. सभी अपनी-अपनी छतों पर थे. रोजाना दिख जाने वाले चेहरे जाने-पहचाने से लग रहे थे. उस दिन मैं घूमकर वापस आई थी, पैर में चोट लग गई थी. रूममेट्स मुझे मुझे छत तक लेकर गए. उस पूरी रात सभी ने अपने-अपने मोबाइल में गाने चला कर खूब रंग जमाए थे. रात भर महफिल जमी रही.

पीजी की वो शाम, घर में चल रहे किसी फंक्शन जैसी थी. सब पड़ोसी एक दूसरे को छतों से छतों पर ही खाना शेयर कर रहे थे. तब तक मुझे नौकरी करते, पीजी में रहते एक साल बीत गया था. अब अहसास होता है कि एक वक्त के बाद पीजी वाले रूममेट सिर्फ कमरा शेयर करने वाले साथी नहीं रह जाते. परिवार बन जाते हैं. वो ध्यान भी रखते हैं. दुलार भी करते हैं और नाराज़ भी हो जाते हैं. वो पीजी. पीजी की तरह नहीं है. एक फ्लोर है जिस पर 3 कमरे हैं और 7 लड़कियां रहती हैं. तीनों कमरों में अटैच वॉशरूम है. पहली मंजिल पर मकान मालकिन का परिवार रहता है. दूसरे पर हम. खाना जो मकानमालिक खुद खाते हैं, वहीं हमें देते हैं.

आज आपने News18 हिन्दी की सीरीज़ 'पीजी स्‍टोरी' की 115वीं कहानी पढ़ी. 

(सीरीज PG Story में पीजी में रहने वाली उन लड़कियों और लड़कों के तजुर्बों को सिलसिलेवार साझा किया जा रहा है, जो अपने घर, गांव, कस्‍बे और छोटे शहर से निकलकर महानगरों में पढ़ने, अपना जीवन बनाने आए. हममें से ज़्यादातर साथी अपने शहर से दूर, कभी न कभी पीजी में रहे या रह रहे हैं. मुमकिन है, इन कहानियों में आपको अपनी जिंदगी की भी झलक मिले. आपके पास भी कोई कहानी है तो हमें इस पते पर ईमेल करें- ask.life@nw18.com. आपकी कहानी को इस सीरीज में जगह देंगे.)

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