#PGStory: मैंने उसके पूरे खानदान के सामने कहा, रात को गमले में पेशाब करना बंद कर दो

नए घर में सामान ले गए. कमरे में लगी सीएफएल और दीवार घड़ी यहीं छूट गई. रिक्शा लेकर वापस आए तो उतनी देर में वो सामान भी गायब था. अंकल से मांगा तो वे चुप्पी साधे थे.

Farha Fatima | News18Hindi
Updated: June 25, 2018, 10:43 AM IST
#PGStory: मैंने उसके पूरे खानदान के सामने कहा, रात को गमले में पेशाब करना बंद कर दो
किस्सा, मकान मालिक का
Farha Fatima | News18Hindi
Updated: June 25, 2018, 10:43 AM IST
(News18 हिन्दी की नई सीरीज़ 'पीजी स्‍टोरीज़' की ये  छठी कहानी है. इस सीरीज में पीजी में रहने वाली उन लड़कियों और लड़कों के तजुर्बों को सिलसिलेवार साझा किया जा रहा है, जो अपने घर, गांव, कस्‍बे और छोटे शहर से निकलकर महानगरों में पढ़ने, अपना जीवन बनाने आए. हममें से ज़्यादातर साथी अपने शहर से दूर, कभी न कभी पीजी में रहे या रह रहे हैं. मुमकिन है, इन कहानियों में आपको अपनी जिंदगी की भी झलक मिले. आपके पास भी कोई कहानी है तो हमें इस पते पर ईमेल करें- ask.life@nw18.com. आपकी कहानी को इस सीरीज में जगह देंगे.

ये  कहानी 27 साल के प्रणव (नाम बदला हुआ) की है. वे 19 साल की उम्र में जयपुर से दिल्‍ली अपने सपनों के साथ आए. इन आठ सालों में उन्‍होंने जिंदगी और दिल्ली शहर को जिया. वह पेशे से इंजीनियर हैं.)

जयपुर से दिल्ली आए, दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ते हुए 1 साल हो चुका था. फ्लैट में एक साल तीन दोस्तों के साथ रहकर तंग आकर अच्छा खासा फ्लैट छोड़ नया कमरा ढूंढ लिया था. कमरा हंसराज कॉलेज के सामने मौजूद चॉल नुमा फ्लैट में लिया. किराया 3500 रुपए महीना था.

चॉल में एक आंगन के चारों ओर कमरे थे. मेरे कमरे के बायीं तरफ़ मकान मालिक का कमरा, दायीं तरफ के कमरे में एक और लड़का रहता. तीनों कमरों की एक ही बालकनी थी. कमरे के बाहर, सड़क पर पानी की टंकी लगी थी. वॉशरूम के लिए टंकी में डिब्बा डालकर पानी निकालना पड़ता.

वक्त बीतता रहा, धीरे धीरे वही पुराने रूममेट्स भी आने लगे. और फिर हम तीनों साथ रहने लगे. बेड पर पहले मैं अकेला सोता. फिर दो. और दो से तीन.



अभी तक हमने जितने घर बदले थे, सभी में जाते ही पार्टी करते थे और नियम के मुताबिक, पार्टी इस एक कमरे के घर में भी हुई. ज़मीन पर गद्दे लगे और उस रात एक कमरे में हम 13 लोग सोए.
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नायाब मकान मालिक
90 साल का पुरुष. लंबाई में लगभग 6 फुट. भारी शरीर और रंग काला. धीरे-धीरे चलता. कुर्ता पजामा पहनता. मैंने इंदिरा के साथ चाय पी है, सोनिया को चाय पिलाई. कांग्रेसी नेताओं के साथ उठ-बैठ के किस्से दिनभर गाता. हर बात में रोना-धोना. उस दिन 2 रुपए रह गए थे. दिए नहीं. एक कटोरी चीनी ली थी. वापस दे दो. पानी की बोतल नहीं लौटाई.

एक दफा हमने उससे ठंडा पानी मांगा. तो उसने हमें रूह-अफ़जा की खाली बोतल में भरा ठंडा पानी दिया. हम उसकी बोतल लौटाना भूल गए. काफी दिन बाद बोतल मांगने आया. हमने कई घंटे बोतल ढूंढी. नहीं मिली. फिर याद आया, कबाड़ी वाले को बेच दी थी. पर वो अपनी रूह-अफ़जा की बोतल के लिए अड़ा रहा.



उसकी बोतल लौटाने के लिए हमेन नई रूह-अफ़जा की बोतल ली. शरबत को दूसरी बोतल में पलट  उसकी खाली बोतल लौटाई. फिर भी उसने कई दिनों तक बोतल से खुशबू आने की शिकायत की.

वो बालकनी में लगे गेंदे, तुलसे के पौधों में पेशाब करता
सुबह उठकर बालकनी में आते ही पेशाब की बदबू आती. अनदेखा किया. सड़क की बदबू समझा. गर्मियों की एक रात 3 बजे लाइट चली गई. मैं उठकर बाहर आया. नज़ारा देखकर होश उड़ गए. ए.पी. शर्मा, हमारा मकान मालिक बालकनी के लगे गेंदे, तुलसे के पौधों में पेशाब कर रहा था. मैंने दोस्तों को बताया. फिर हमने कई रातों को चेक किया, वो रोज़ ऐसा करता.

एक हफ्ते तक झेला. फिर उससे बात की. मैंने डायरेक्ट कहा, आप जो रात में बालकनी में सू-सू करते हैं. उससे बहुत खराब बदबू आती है. उसने बुरा नहीं माना. जवाब दिया, बदबू तो आती है लेकिन सहन करना पड़ेगा. क्योंकि रात केअंधेरे में घर के बाहर सड़क पर बने वॉशरूम में जाते हुए डर लगता है. घर के बाहर लगा बल्ब उसने बिजली का बिल बढ़ने की वजह से हटा रखा था. उसके जवाब में चेतावनी थी, हम ठहरे किराएदार. कुछ कर भी नहीं सकते थे.

कुछ हल नज़र नहीं आया. अंधेरे में डरता है तो सू सू यहीं करेगा और हमें झेलना ही पड़ेगा. 90 साल के आदमी से आप और कहोगे भी क्या. घर ढूंढना शुरू किया. नया घर मिला. पर तय नहीं हो पाया कब बदलें.

एक शनिवार की शाम अंकल हमारे कमरे में आए और बोले- कल उनके बच्चे और बेटी के ससुराल वाले आएंगे. इसलिए हमें समय से घर आने, दोस्तों को न बुलाने की हिदायत दी. साथ ही कहा, काम में मदद चाहिए होगी, घर ही रहना. अगले दिन छुट्टी थी, हम मदद के लिए राज़ी हो गए.



अगली सुबह हुई. फिर वही असहनीय बदबू. लगा पानी सिर से ऊपर जा रहा है कुछ तो करना पड़ेगा. मैं बिना कुछ सोचे समझे अपने कमरे से निकला. उनके कमरे की तरफ गया. उनके कमरे गेट खुला था. वहां ठहाकों की आवाज़ गूंज रही थी. बेटी के ससुराल वालों समेत पूरा खानदान कमरे में बैठा बतिया रहा था.

मैं- अंकल आप से बात करनी है. बाहर आएं.
अंकल- बताओ, यहीं बताओ.
मैं- नहीं, आप बाहर आएं.
अंकल का बेटा- अरे, बता दो. यहीं बता दो. सब अपने ही हैं.
(वे सब शान्त मेरे बोलने के इंतज़ार में...)
मैं- अंकल, आप रोज़ रात को बालकनी में जो सूसू करते हो. वो आपको बंद करना पड़ेगा.
(कमरे में शांती..., मैं अपने कमरे की तरफ़ लौट गया)

पीछे से अंकल आए और बोले, सामान उठाओ और दफा हो जाए यहां से.

हम जाने की ताक में पहले से ही थे. नया घर ढूंढ ही चुके थे. सामना पैक किया. एक महीने का नोटिस देने से भी बच गए. भले हुआ कुछ नहीं पर सबके सामने उसकी राज की बात कहकर बड़ा अच्छा लगा. मैंने आंटी को चाबी दी. उनसे कहा, सुबह को चाय में तुलसी मत डाला करो.

आंटी- क्यों.
मैं- क्योंकि अंकल उसके पेड़ में रोज़ रात को सूसू करते हैं.
आंटी- शांत.

नए घर में सामान ले जाने लगे. कमरे में लगी सीएफएल और दीवार घड़ी वहीं छूट गई. रिक्शा लेकर वापस आए तो उतनी देर में वो सामान भी गायब था. अंकल से मांगा तो वे चुप्पी साधे थे.

दिल्ली शहर के उस मकामालिक को हम आज भी भुलाए नहीं भूलते...

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