#PGStory: 'जब 5 दोस्त नशे में खाली जेब दिल्ली से उत्तराखंड के लिए निकल गए'

ये कहानी 29 साल के अमृत की है. वे साल 2005 में सहारानपुर से दिल्‍ली अपने सपनों के साथ आए. इन तेरह सालों में उन्‍होंने जिंदगी और दिल्ली शहर को खूब जिया...

Farha Fatima | News18Hindi
Updated: June 27, 2018, 9:48 AM IST
#PGStory: 'जब 5 दोस्त नशे में खाली जेब दिल्ली से उत्तराखंड के लिए निकल गए'
ये कहानी 29 साल के अमृत की है. वे साल 2005 में सहारानपुर से दिल्‍ली अपने सपनों के साथ आए. इन तेरह सालों में उन्‍होंने जिंदगी और दिल्ली शहर को खूब जिया...
Farha Fatima | News18Hindi
Updated: June 27, 2018, 9:48 AM IST
(News18 हिन्दी की नई सीरीज़ 'पीजी स्‍टोरीज़' की ये तीसरी कहानी है. इस सीरीज में पीजी में रहने वाली उन लड़कियों और लड़कों के तजुर्बों को सिलसिलेवार साझा किया जा रहा है, जो अपने घर, गांव, कस्‍बे और छोटे शहर से निकलकर महानगरों में पढ़ने, अपना जीवन बनाने आए. हममें से ज़्यादातर साथी अपने शहर से दूर, कभी न कभी पीजी में रहे या रह रहे हैं. मुमकिन है, इन कहानियों में आपको अपनी जिंदगी की भी झलक मिले. आपके पास भी कोई कहानी है तो हमें इस पते पर ईमेल करें- ask.life@nw18.com. आपकी कहानी को इस सीरीज में जगह देंगे.)

ये कहानी 29 साल के अमृत की है. वे साल 2005 में सहारानपुर से दिल्‍ली अपने सपनों के साथ आए. इन तेरह सालों में उन्‍होंने जिंदगी और दिल्ली शहर को खूब जिया. इन सालों में कभी लापरवाह बने तो कभी जिम्‍मेदार. आज वे इंजीनियरिंग सेक्टर से जुड़े हैं)

2005 में नोएडा स्थित एक इंजीनियरिंग इंस्टिट्यूट में दाखिला लिया. सहारानपुर से दिल्ली आकर शुरुआती तीन दिन मामा के घर रहा. पर कहते हैं न, दूर के ढोल सुहावने. जल्द से जल्द इंस्टिट्यूट के आसपास ठौर की तलाश शुरू की. पसंद का कमरा बजट से बाहर था और जो बजट में था, वो न देखने लायक, न सुनने लायक. दुनिया भर के नखरे करने वाला बच्चा घर से दूर जाते ही बड़ा हो जाता है. दाल-आटे का भाव मालूम चलता है. कम पैसों में कमरा ढूंढने की वजह कोई न थी पर मैं घर से सीमित जेब खर्च लेना चाहता था.

आनन-फानन में कमरा मिला, नोएडा के सेक्टर 22 में. वो जगह ठेठ गांव थी. किराया था एक हजार रुपए महीना, उसे भी बांटने के लिए मैंने रूम पार्टनर ढूंढा लिया था. मैं सुविधा संपन्न परिवार में पला-बड़ा बच्चा था, बेहद सफाई पसंद. हालांकि खुद कभी झाडू को हाथ भी नहीं लगाया था. पर जाने कैसे दिल्‍ली आकर सब करना सीख गया. मुझमें इतना हुनर है, यह भी यहीं पता चला.

घर से दूर किसी कमरे में रहने का ये पहला तजुर्बा था. कमरे का दरवाज़ा जिस गलियारे से होकर गुज़रता, वहां गोबर के उपलों का स्टॉक रखा रहता. मैं उस कमरे और वहां के हालातों का आदी हो चुका था. क़रीब 10 दिन बाद मां आईं, मैं बे-झिझक उन्हें कमरे की ओर लेकर चल दिया. मज़े की बात थी, सेक्टर 22 के ठीक सामने सेक्टर 12 था. ये दोनों सेक्टर एक-दूसरे के बिलकुल उलट थे, देखने में लगता शहर-गांव आमने-सामने बसे हैं.

मां और मैं ऑटो से मेन रोड पर उतरे. मां बनावट से शहरी दिख रहे सेक्टर की ओर चल दीं. मैंने टोका, उधर नहीं. वे ग़ौर से दूसरी तरफ़ देखने लगीं. ज्यों-ज्यों कमरे की ओर बढ़े, उन्होंने मुंह ढाप लिया. कमरे की स्थिति देख वे बिलख पड़ी. मेरे सिर पर हाथ फेरकर पूछने लगीं, तू यहां क्यों रह रहा है? कोई कमी है क्या तुझे? और अगली ही सुबह सामान बंधवाकर मुझे उस कमरे से लेकर चल दीं.

हम सारा दिन दूसरा (जो दिखने में शहर था) सेक्टर घूमे. रात होने तक फ्लैट मिल गया. मां साथ थीं तो कमरा मिलने में आसानी हुई. हम लड़कों का संघर्ष लड़कियों से बिल्कुल अलग होता है. हमें बग़ैर जाने ही लोग शक भरी निगाहों से देखते हैं. खैर, कमरा मिल गया और दो दिन में जम भी गया. साथ में दो रूममेट थे. मां तो कमरा दिलाकर चली गईं, लेकिन मुझे वो बहुत महंगा लगता था. सो मैंने तीन और रूममेट्स ढूंढे. अब हम पांच लड़के फ्लैटमेट्स थे.



मैं सफाई पसंद था और वे चारों लड़के पानी पीने की बोतल तक नहीं धोते थे. यही वो वक्त था, जब मैंने इस बात से इत्तेफाक रखना शुरू कर दिया कि 'लड़के गंदे रहते हैं'. मैं उन्हें गंदगी करने पर टोकता तो वे मुझे कहते 'क्या औरतों की तरह' बर्ताव करता है. ये भी विडंबना ही है कि हमारी 95 फीसदी आबादी घर की सफाई को औरतों का काम माने बैठी है. एक शाम इमरजेंसी में मैंने आटा गूंथ दिया तो हर दिन बर्तन, झाड़ू-पोछे के साथ आटा गूंथना भी मेरे हिस्से में दर्ज हो गया. सफाई का सारा दारोमदार तो पहले से था ही. इसी तरह एक साल बीत गया.

दिल्ली आने के एक साल बाद 2006 में पहली बार मैंने बीयर पी. मार्च के दिन थे. एक दोस्त की बर्थ डे पार्टी थी. चंदा इकट्ठा किया, 45 रु की बीयर आई. हममें से एक दोस्त सबसे भावुक था. उसे चढ़ गई. वो छत पर चढ़ा. वहां पानी की टंकी सीमेंट की थी, जिसमें से भर जाने पर पानी बहता रहता था. वो उस टंकी के नीचे बिना कपड़ों के नाचने लगा. किसी तरह समझा-बुझाकर उसे उतारा गया. यहां डर पिटने का नहीं, सोसाइटी वालों के देख लेने पर घर खाली कराने का था.

उसी दिन नशे की हालत में घूमने का भी प्‍लान बन गया. तय हुआ कि हेमकुंड साहिब (गुरुद्वारा, उत्तराखंड) चला जाए. एक दोस्त बाहर गया और थोड़ी देर में वापस आकर बोला, “चलो.” मैंने कहा, “कहां.” वो ऑटो ले आया था, हेमकुंड साहिब घूमने जाने के लिए. मैंने कहा, नहीं जाऊंगा, पैसे नहीं हैं. पर उन्होंने पापा की कसम दिला दी. कोई पैकिंग नहीं की, बस चल दिए मुंह उठाकर. ऑटो से कश्मीरी गेट आईएसबीटी गए और वहां से ऋषिकेश की बस ली.



मेरठ के करीब पहुंचकर नशा उतरा तो अहसास हुआ कि नहीं आना चाहिए था. बस से ऋषिकेश पहुंचे. आगे जाने के लिए रास्ता पूछा तो पता चला उन दिनों हेमकुंड साहिब बंद था. घर से निकले थे, कहीं तो जाना ही था. रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड की दूसरी जगह) चलने का फैसला किया. ऋषिकेश से सबसे सस्ती बस ली. रास्ते में जो भी कम पैसों में मिला खाते चले गए.

हम पांच थे, पहुंचकर होटल ढूंढा 300 रुपए का. आप अंदाज लगा लीजिए कि कमरा कैसा होगा. जोशीमठ जाने का जुगाड़ किया. पहाड़ों पर डाक ले जाने वाली बस ढूंढी. उसने क़रीब 100 किलोमीटर के लिए महज़ 25 रुपए सवारी का टिकट दिया. हम जोशीमठ घूमते रहे. आगे जोशीमठ से ऊपर विंटर स्पोर्ट्स के लिए फेमस औली जाना था.

औली का रास्ता जोशीमठ से (सड़क से) 18 किलोमीटर है. बस का किराया 500 रुपए सवारी था. हमारे पास कुल जमा रुपए ही 500 थे. हम जंगल के रास्ते, पहाड़-पहाड़ से पैदल गए. लगे हाथ ट्रैकिंग भी कर ली. लगभग 3 घंटे में औली पहुंचे. स्नोफॉल हो रहा था, देखकर ऐसा सुकून मिला कि सारी थकान छूमंतर हो गई. 5-6 घंटे रुककर वापस आ गए.

उस रात जब लौटे तो किसी की भी जेब में एक पाई न थी. सभी स्टूडेंट थे इसीलिए बैंक अकाउंट सभी का था. सबने अपना-अपना अकाउंट खंगाला. किसी को 200, किसी को 400 रुपए मिले. वहां से 150 रुपए सवारी के हिसाब से टैक्सी ली, हरिद्वार आए और अब जेब के साथ-साथ अकाउंट भी खाली था. हम पांचों के पास सिर्फ 100 रुपए बचे थे. परेशान थे कि दिल्ली कैसे जाएं?

बहुत देर सोचा. सस्ता वाहन ढूंढा पर कुछ नहीं मिला. पुलिस की मदद ली. 100 रुपए उसे देते हुए कहा, बस मेरठ तक पहुंचा दो. उसने स्लिपर क्लास अरेंज करवाई और 100 रुपए भी लौटा दिए. हम 5 दोस्तों में से एक दोस्त का घर मेरठ में ही था. रात भर वहीं रुके, खाना खाया.



मेरठ वाला दोस्त अपने घर ही रुक गया. अब दिल्ली लौटने के लिए हम पांच में से चार बचे थे. सुबह निकलना था. दोस्त ने अपने घर से 500 रुपए लेकर हमें दिए, उन्ही पैसों से हम दिल्ली आए.

दिल्‍ली में कई साल इसी तरह पीजी में गुजरे. कभी हम लापरवाह हुए तो कभी जिम्‍मेदार. ठोंकरें खाईं, मुहब्‍बत पाई. कुछ दोस्‍त मिले, कुछ दुश्‍मन. लेकिन इस तरह जीते हुए हमने जिंदगी के वो सबक सीखे, जो घर के सुरक्षित वातावरण में कभी न सीख पाते. मैं आज जो भी हूं, उसमें उन सालों के अनुभवों का बड़ा योगदान है. मैं जब दिल्‍ली आया था तो लापरवाह लड़का था. अब एक जिम्‍मेदार इंसान हूं.

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