#PGStory: '3 दोस्त डेढ़ दिन से पी रहे थे, अचानक से एक बोला- इसकी बॉडी का क्या करेंगे'

ये कहानी 27 साल के प्रणव की है. वे 19 साल की उम्र में जयपुर से दिल्‍ली अपने सपनों के साथ आए. इन आठ सालों में उन्‍होंने जिंदगी और दिल्ली शहर को जिया. वह पेशे से इंजीनियर हैं...

Farha Fatima | News18Hindi
Updated: June 27, 2018, 9:47 AM IST
#PGStory: '3 दोस्त डेढ़ दिन से पी रहे थे, अचानक से एक बोला- इसकी बॉडी का क्या करेंगे'
कहानी, पीजी की यारियों वाली
Farha Fatima | News18Hindi
Updated: June 27, 2018, 9:47 AM IST
(News18 हिन्दी की नई सीरीज़ 'पीजी स्‍टोरीज़' की ये चौथी कहानी है. इस सीरीज में पीजी में रहने वाली उन लड़कियों और लड़कों के तजुर्बों को सिलसिलेवार साझा किया जा रहा है, जो अपने घर, गांव, कस्‍बे और छोटे शहर से निकलकर महानगरों में पढ़ने, अपना जीवन बनाने आए. हममें से ज़्यादातर साथी अपने शहर से दूर, कभी न कभी पीजी में रहे या रह रहे हैं. मुमकिन है, इन कहानियों में आपको अपनी जिंदगी की भी झलक मिले. आपके पास भी कोई कहानी है तो हमें इस पते पर ईमेल करें- ask.life@nw18.com. आपकी कहानी को इस सीरीज में जगह देंगे.)

ये कहानी 27 साल के प्रणव (नाम बदला हुआ) की है. वे 19 साल की उम्र में जयपुर से दिल्‍ली अपने सपनों के साथ आए. इन आठ सालों में उन्‍होंने जिंदगी और दिल्ली शहर को जिया. वह पेशे से इंजीनियर हैं.)

राजस्थान और पाक बार्डर पर मौजूद शहर 'गंगानगर' में बचपन बीता, 8वीं तक स्कूलिंग वहीं हुई. 9वीं क्लास में था जब माता-पिता जयपुर आए. पिता के ज्यादातर दोस्त पायलट रहे. बचपन से ही उनसे पायलट बनने के बारे में इतना सुना कि आज इसकी तैयारी करने वालों की काउंसलिंग कर सकता हूं. वे अकसर कहते पायलेट बनने के लिए खास मेहनत नहीं करनी पड़ती. 12वीं में साइंस लेकर 60 % नंबर लाओ, थोड़े पैसे खर्च करो और बन जाओ पायलेट.

उनकी बातों से मैं आकर्षित हुआ. खुद को पायलेट बना देखने की कल्पना करता. आकर्षण इतना ज्यादा था कि तैश में आकर 11वीं क्लास में साइंस स्ट्रीम ली. केमिस्ट्री सिर के ऊपर से गई. उसके सब सवाल चकौर डिब्बे से लगते. खैर, 11वीं में फेल हुआ और पायलेट बनने का सपना चकना चूर.

फेल होकर समझ आया, इतिहास पढ़कर भी कुछ बन सकता हूं. जयपुर के केंद्रीय विद्यालय में 11, 12वीं में टॉपर रहा. इसी बीच 6 महीने के लिए परिवार के साथ दिल्ली आया, यहां दिल्ली यूनिवर्सिटी से रूबरू हुआ और यहीं पढ़ने का फैसला लिया.

जयपुर से दिल्ली का पहला सफर, अकेले
सेंट स्टीफन कॉलेज में दाखिले के लिए जयपुर से अकेले आया. दिल्ली में पापा के कलीग के घर रुकना था. जयपुर की बस से धौला कुआं उतरा, ऑटो लेकर लक्ष्मी नगर गया. पहली दफा दिल्ली के लोकल ट्रांस्पोर्ट में सफर करने को जाना. जहां का पता था, वहां सुबह के 7 बजे पहुंचा. नाश्ते में चाय मिली. कप खाली हुआ ही था कि तुरंत आवाज़ आई, खाना खा लो. मैं शॉक्ड. मन ही मन सोचने लगा, सुबह-सुबह खाना कौन खाता है?

नाश्ते में ही चाय के साथ भर पेट खाना, अजीब था
उस घर में आठ लोग थे और नौंवा मैं. एक थाली में आलू बींस की सब्जी, चावल, दाल, रोटी. एक-दूसरे में मिली जा रही थी. थाली में कटोरी, चम्मच, काटा कुछ नहीं था.

पहली बार नॉर्थ कैंपस गया. डीन ऑफिस जाकर रजिस्ट्रेशन फॉर्म भरा. मैं उन्हीं लड़कों में से था, जो रजिस्ट्रेशन फार्म में वीमन कॉलेज का नाम भी भरते हैं. रामजस में हिस्ट्री में ऑनर्स दाखिला लिया. और फिर जयपुर से बोरिया-बिस्तर बांधकर जुलाई में कॉलेज शुरू होने पर ही दिल्ली आया.



दिल्ली का पहला पीजी
यूनिवर्सिटी में पापा के जूनियर्स के साथ ठहरा, वे तब तक भी यहीं पढ़ रहे थे. कोई मुझसे 5, कोई 10 साल बड़ा था. हरियाणा के ज़मीदार परिवारों के इन लड़कों ने स्पोर्ट्स कोटा से दाखिला लिया हुआ था. वे लोग सुबह 4 बजे डीयू से सीपी तक दौड़ने जाते. उनमें से ज्यादातर डबल एमए कर चुके थे. वे आठ थे, और मैं उनमें सबसे छोटा. इससे पहले मैंने एक घर में, एक-साथ इतने अंडरवियर सूखते नहीं देखे थे.

वे उस 'भाई' जैसे थे जिनका यूनिवर्सिटी पर लगभग एक दशक से गढ़ बना था. उनके नाम का कॉलेज में रौब था.

उनके घर में, मैं 'सत्ते पे सत्ता' वाली सफाईपसंद हेमा मालिनी था. कमरे का किराया पापा ने दिया, खर्च के लिए 2 हज़ार अलग से. 2010 में महीने का खर्च 2 हजार में आराम से होता. पूरा घर साफ किया. कमरे में गद्दा बिछाया. सर्दी में हाथ सेकने वाले उनके हीटर के चौगुर्द ईंदे रखकर उसे रसोई का चूल्हा बना उसपर खाना बनाना शुरू किया.



चाय के लिए बाज़ार से 10 रुपये की चीनी-पत्ती ली. मैं दो ही महीने में उनसे परेशान हो गया. उनका कोई शेड्यूल नहीं था. न पढ़ते, न कुछ बनने की जद्दोजहद. पैसा उनके पास ख़ूब था. वे मौज काट में थे. मैं स्कूल से निकला नया बच्चा था. जिसे पढ़ना था.

उन भैया लोगों के लिए मैं सामान की तरह था, जिसे कभी भी किसी भी कमरे में उठाकर रख देते. या घर से बाहर रहने का फरमान अचानक मिलता.

कॉलेज में 4 यार बने. हमने साथ रहना चुना. ये वक्त दिल्ली में 2010 में हुए कॉमन वेल्थ गेम्स का था.
मैंने नया कमरा ढूंढ़ना शुरू किया, नहीं मिला. क्योंकि यूनिवर्सीटी के सभी कॉलेजों के हॉस्टल कॉमनवेल्थ गेस्ट को दिए थे और हॉस्टल वाले बच्चे भी वहां से बाहर थे. 2 महीने बाद उन्हें वापस हॉस्टल मिले.

घर 6-7 हज़ार से कम में नहीं मिल रहा था. बहुत मशक्कत के बाद एक कमरा मिला, जिसका किराया 4 हज़ार रुपए था. दो दोस्तों ने दो-दो हज़ार किराया बांटा.

किराये वाला, पहला कमरा नायाब था
वो पहला कमरा दिल्ली यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैंपस के नज़दीक बसे कमला नगर के मशहूर चाइनीज़ रेस्ट्रो थापा की गली में था, उस कमरे में रेस्ट्रो का एक्ज़ोस्ट था. गर्मी बहुत थी वहां, पर उसे मैंने अपने अंदाज़ में सजाया. एक कोने में जयपुर से लाया गद्दा बिछाया, जिसकी हालत तब तक पस्त हो चुकी थी. एक कोने में किताबों का रैक, एक में ईंटों पर रखा चूल्हा और उसके चौगुर्द जमाई रसोई. एक कोने में कुर्सी जो ड्रॉइंग रूम का काम करती. वॉशरूम कमरे से बिलकुल बाहर सड़क पे था. लेकिन साफ और हमारा पर्सनल.



मुझे हर चीज करीने से लगी पसंद थी. दोस्त मुझसे एकदम उलट, निहायती गंदा. न कपड़े धोता, न नहाता, न बर्तन धोता, एक ही शावर जेल था उसके पास. जिससे बाल, मुंह, शरीर सब धोता.

खर्च ख़त्म होने पर रेस्ट्रो से फ्री खाना मांगते
जब महीने के पैसे खत्म हो जाते तो रेस्ट्रो वाले थापा को पुकारते. वो हमें फ्री में चाऊमीन और मोमोज़ दे देता. उस कमरे में लगभग 4 महीने रहे. मैं महीने के खर्च 2 हजार में से हर दिन 30 रुपये सेविंग करता था.

घर वालों की कमी खलने जैसा कुछ नहीं हुआ. क्योंकि जितनी देर में मेरे दिल्ली के ही दूसरे कोने में बसे दोस्त अपने घर पहुंचते थे, उतनी देर में मैं जयपुर पहुंच जाया करता था.

आर्थिक तंगी लोगों के लिए परेशानी होगी. मैं हर स्थिती को ज़िंदगी का हिस्सा मानता. जब दोस्त सिगरेट पीते मैं दस रुपये बैग की अलग जेब में रख लेता. उन पैसों को एक गुल्लक में जमा करता. 30-40 रुपए आज के वक्त में भले कुछ न हो. पर उस समय महीने के आखिर में 1000-1500 रुपए इकट्टठे होना बड़ी बात थी.

यूनिवर्सिटी में 3 साल पैदल सड़के नापी
यूनिवर्सिटी में पूरे 3 साल मैंने पैदल सड़के नापी. कई दिन खाना खाने के पैसे नहीं भी होते. मेट्रो कार्ड में मौजूद 100 रुपए को कैश करवाते, जिसमें से 10 रुपए काटकर 90 मिलते. डीयू से जीटीबी नगर मेट्रो स्टेशन पैदल जाते. वहां 90 रुपए की 2 थाली मिलती, पेटभर कर खाते. और अगले दिन की फिक्र से बे-फिक्र होकर सोते.

नए फ्लैट के गंजेड़ी दोस्त
थापा का कमरा खाली किया. नए फ्लैट का नाम पिंक फ्लैट रखा. इसका किराया 9 हजार था. इस घर में हम कुल जमा 3 दोस्त थे. वे दोनो दिन-रात गांजा फूंकते. उनके कमरे में धुआं, धुआं रहता. काम वाली बाई मुझसे कहती, 'भय्या मैं उस कमरे में झाड़ू-पोछा लगाने जाती है मुझे कुछ होने लग जाती है'. 'वे लोग कुछ गोल गोल बनाती है. फिर चिलम की तरह फूंकती है'.



डेढ़ दिन तक शराब पी
इस घर में पहली दफा शराब पी. 190 रुपए की शराब की बोतल लाए 'रोमनो'. अब दोस्त उस शराब का नाम सुनकर कहते हैं, ज़हर पीता था क्या.

एक दोपहर हम तीनों ने पीना शुरू किया, जो उस दिन, उस रात, अगला पूरा दिन और अगली रात के तीन बजे तक पी. पीते-पीते हमारे शरीर सुन्न हो पड़ गए थे. अगली सुबह ही हम में से एक की मां आने वाली थी. अचानक एक दोस्त बोला, बोतल तोड़ता हूं. मैंने उसके हाथ से छीनी. वो फिर बोला, यार हम इसकी बॉडी का क्या करेंगे. मेरी हवाईयां उड़ गईं और मैं हकबकाते हुए, क्या ? बोल क्या रहे हो तुम ?

वो कह रहा था, हम उसकी बॉडी का क्या करेंगे. सबकुछ मेरी समझ से बाहर था. मैं अपनी जगह से उठा. बाथरूम के पास लेटे दोस्त की नाक के पास हाथ रखा. उसका पेट दबाकर देखा. कहा, सांस तो आ रही है. पेट भी नरम है. उसके मुंह पर वोडका डाली. वह होश में आया और फिर हम तीनों वहीं सो गए. अगले दिन उठे, घर संभाला. फोन चार्ज किया. ये सब बातें, उस फोन में हुई रिकॉर्डिंग से मालूम चलीं.

इतने सालों बाद भी जब हम तीन यार मिलते हैं, तो उस किस्से को याद कर खूब हंसते हैं.

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