#PGStory: 'डेट पर गई दोस्त को देर रात पीजी वापस लाने के लिए बुलाई एम्बुलेंस'

ये कहानी 29 साल की वंदना की है. वह 19 साल की उम्र में बीटेक करने के लिए दिल्‍ली से जयपुर गईं. उन सालों में वे रोई, हंसी और जिंदगी को खूब जिया

Farha Fatima | News18Hindi
Updated: June 27, 2018, 9:45 AM IST
#PGStory: 'डेट पर गई दोस्त को देर रात पीजी वापस लाने के लिए बुलाई एम्बुलेंस'
कहानी, पीजी वाली दोस्ती की
Farha Fatima | News18Hindi
Updated: June 27, 2018, 9:45 AM IST
News18 हिन्दी की नई सीरीज़ 'पीजी स्‍टोरीज़' की ये पांचवी कहानी है. इस सीरीज में पीजी में रहने वाली उन लड़कियों और लड़कों के तजुर्बों को सिलसिलेवार साझा किया जा रहा है, जो अपने घर, गांव, कस्‍बे और छोटे शहर से निकलकर महानगरों में पढ़ने, अपना जीवन बनाने आए. हममें से ज़्यादातर साथी अपने शहर से दूर, कभी न कभी पीजी में रहे या रह रहे हैं. मुमकिन है, इन कहानियों में आपको अपनी जिंदगी की भी झलक मिले. आपके पास भी कोई कहानी है तो हमें इस पते पर ईमेल करें- ask.life@nw18.com. आपकी कहानी को इस सीरीज में जगह देंगे.

(ये कहानी 29 साल की वंदना की है. वे 19 साल की उम्र में बीटेक करने के लिए दिल्‍ली से जयपुर गईं. उन सालों में वे रोई, हंसी और जिंदगी को खूब जिया. पढ़ाई के बाद एच.सी.एल में नौकरी की. लगभग साढ़े चार साल की नौकरी के बाद असोसिएट की पोस्ट से इस्तिफा देकर फिलहाल बेटे की परवरिश कर रही हैं.)

12वीं तक दिल्ली में पढ़ाई करने के बाद इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी में बीटेक करने 2007 में जयपुर गई. एडमिशन का प्रोसेस ऑनलाइन पूरा हो गया था. सेशन शुरू होने पर डॉयरेक्ट कॉलेज के लिए निकले. मम्मी-पापा कार से छोड़ने गए. रास्ते भर कार की खिड़की पर मुंह रखे बैठी रही. नए शहर में पढ़ाई और दोस्तों संग रातों में घूमने के बारे में सोचकर ही मन ख़ुशी से झूम रहा था. इंजीनियरिंग कॉलेज, जयपुर सिटी से 36 किलोमीटर दूर फागी गांव में था. रहने का बंदोबस्त भी वहीं हुई. पीजी की फॉर्मेलिटी पूरी की. पर जैसे ही उनकी गाड़ी गेट से बाहर जाने के लिए मुड़ी. कलेजे में धक्का सा लगा. दोस्तों संग रतजगो के ख्वाब हवा हो गए. एक क्षण के लिए लगा कलेजा फट पड़ेगा.

दिल्ली से आई बिंदास लड़की को न जाने उस लम्हे में क्या हुआ. गाड़ी जितनी दूर तक दिखी, मैं दरवाज़े को पकड़े उसे देखती रही. आंसूओं पर क़ाबू नहीं था. उससे पहले 18 सालों में कभी मां से एक शब के लिए मैं अलग न रही. नानी के घर भी सिर्फ तब जाती थी, जब मां वहां होती. उन्हें दिल्ली लौटे तीन दिन हो चुके थे और मैं कमरे में पड़ी लगातार रो रही थी. खुद को उस बच्चे की तरह पाती जो घर का रास्ता भटक किसी और के आसरे में है.

रूममेट मेस से बीच-बीच में खाने को ला देती तो मैं खा लेती. इन तीन दिनों में रोते रोते कब आंख लग जाती, मालूम नहीं चला. सोकर उठती तो रोना आता. तीसरा दिन भी बीतने का था, शाम हो गई थी. एक लड़की आई. अपना ताआर्रुफ कराया. पता चला वो सीनियर है.

आंसुओं से भीगे गालों पर उसके हाथों का स्पर्श पाकर लगा सहारा मिल गया. वो थी तो अंजान पर मैं उसके सामने नन्हें बच्चे की तरह सुबक सुबक कर रोई.



उसने समझाया, यही सच है. तुम्हे लड़ना है. ज़िंदगी के हर पड़ाव का शुरुआती वक्त बहुत खास होता है. इस दौरान जो छवी बनती है, फिर उसी को संंवारते हैं. बुरी बने तो सुधारते हैं. अच्छी हो तो और अच्छा बनाते हैं. देश की राजधानी से पढ़कर आई लड़की सिर्फ रोती रहती है. ऐसा करके तुम अपनी रूम मेट का विश्वास खो दोगी, क्योंकि ये सब उसके लिए भी नया है.

उनके वे शब्द मेरे भीतर उतर गए. मां से दूर होने के दर्द को मैंने अपना लिया था. कमरे में पड़े, तीन दिन तक रोनी वाली ये लड़की 6 महीने बाद कॉलेज की प्रेजीडेंट बनी.

वक्त की पाबंदी
मैं भी वक्त की पाबंद हो गई. हर काम वक्त पर करती. 7 बजे उठना. 8 बजे नाश्ता. एक घंटे में वॉशरूम की लाइन में लगना. 8 वॉशरूम थे और 28 लड़कियां. सभी के पास सुबह का एक ही घंटा होता. एक तो खाने की भागदौड़ ऊपर से बेमन के स्वाद का खाना. पसंद हो न हो, खाना वही है. यहां कोई नाज़ नखरे उठाने वाला न था. धीरे धीरे उन परिस्थितीयों में भी ढलती गई.

दब्बू स्टूडेंट से प्रेज़ीडेंट बनने की वजह रैगिंग से झिझक दूर होना रही. वहां रैगिंग फिल्मों जैसी डरावनी नहीं, बहुत इंटरएक्टिव थी.

8 बजे मेस टाइम था. 7 बजे उठकर सारे सीनियर्स के दरवाज़े को खटखटा कर उन्हें गुड मॉर्निंग कहना होता. उठने के बाद, सोने से पहले सीनियर्स को विश जरूर करना होता था. रैगिंग ड्यूरेशन 32 दिन तक चला. इस दौरान बेमेल तीन रंग के कपड़े पहने. सलवार, कमीज़ और दुपट्टा तीनों अलग. दुपट्टा वी शेप में पहनना होता था. पैरों में बाथरूम चप्पल. बालों में तेल. दो चोटी बनी हुईं. दोनों में अलग रंगों की रबड़. वही फ्रेशर्स की पहचान थी. पूरे 32 दिन वही हुलिया रहा.

सीनियर्स को 90 डिग्री सैल्यूट करते थे. फीमेल को मिस बॉस. मेल को मिस्टर बॉस कहकर बुलाते. सभी नए थे. कोई किसी को नहीं जानता था लेकिन एक दूसरे से बे-झिझक कपड़े एक्सचेंज किए. इन 32 दिनों में सब एक-दूसरे से खुल गए थे.

रैगिंग का दौर खत्म हुआ. उसके बाद का एक महीना फेस्टिव सीजन सा लगा. हम नए कपड़े पहन सजधज कर कॉलेज जाते. सब अपना बेस्ट दिखाते. स्टाइल में चलते थे. कॉलेज में रमते गए. वक्त के साथ बंक भी मारना सीखे. पर रात को घूमने का सपना पूरा न हुआ.



पीजी में वापस आने का वक्त रात के 9 बजे था, जिससे पहले वॉर्डन अटेंडेंस रोज़ लेती. 9 बजे के बाद सिर्फ कॉलेज के ही मेडिकल हॉस्पिटल, जो कि लगभग 20-25 मिनट की दूरी पर था. वहां जा सकते थे, शुरुआती छह महीने बीत गए थे. एक शाम एक दोस्त डेट पर गई. 9 बज से पहले वो लौट नहीं पाई. अब हम क्या करते. सब परेशान. उसे वापस आना था. एंट्री मिलेगी नहीं.

ऐसे में शुरू हुई उसे वापस लाने की प्लानिंग. एक लड़की को बीमार होने का ढोंग करना पड़ा. वॉर्डन से कहा, बहुत बीमार है. हॉस्पिटल ले जाना होगा. एम्बुलेंस बुलाई. उसने मरीज़ के अलावा सिर्फ एक और लड़की को बैठने की इजाजत दी.

रास्ते में एम्बुलेंस वाले भैया को मसका लगा पूरी कहानी बताई. पर उसने कहा, हॉस्पिटल तो जाना पड़ेगा. क्योंकि एम्बुलेंस की रिपोर्ट वहां दिखानी पड़ती है. उस अस्पताल का अजीब नियम था, हर बीमारी में ड्रिप लगाते. सही-सलामत लड़की ने बीमार होने को नाटक तो किया पर ड्रिप लगवाने को तैयार नहीं थी.

डॉक्टर को भी पागल बनाने में कामयाब रहे. ड्रिप से एलर्जी बता ओरल मेडिसिन देने के लिए कहा. जैसे-तैसे वहां से निकले. लौटते हुए डेट पर गई दोस्त को गाड़ी में बिठाया.

वॉर्डन ने पकड़ लिया. उसे अच्छी तरह याद था, उसने सिर्फ दो लड़कियों को भेजा था. वापस तीन आईं. उसे समझाया कि वो भूल गई, उसने तीन को जाने दिया था. इसे चक्कर आ गया था, खड़ी नहीं हो पा रही थी.

इतनी देर में कुछ दोस्तों ने अटेंडेंस रजिस्टर चुरा कर उसकी प्रेज़ेंट लगा दी थी. डेट से लौटी दोस्त की कमरे में आने पर सबने जमकर धुनाई की.

कॉलेज लाइफ घर से दूर नए शहर में बीते तो वहां पीजी/हॉस्टल की यादें परिवार संग रहकर कॉलेज जाने वाले बच्चों से बिल्कुल जुदा होती हैं.

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