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नर हो, न निराश करो मन को, पढ़ें मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं

मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं

मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं

मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं (Maithili Sharan Gupt Poems) :दोनों ओर प्रेम पलता है, सखि, पतंग भी जलता है हा! दीपक भी जलता ...अधिक पढ़ें

    मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं (Maithili Sharan Gupt Poems) : मैथिलीशरण गुप्त ने हिंदी साहित्य जगत में खड़ी बोली की शुरुआत की. राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मैथिलि शरण गुप्त को राष्ट्रकवि की संज्ञा दी. मैथिलीशरण गुप्त ने मानव जीवन के कई पक्षों जैसे प्रेम, मन की दशा, पश्चाताप पर कविताएं लिखी हैं. कुछ लोग उन्हें प्यार से 'दद्दा' कहकर बुलाते थे. मैथिलीशरण गुप्त ने 'साकेत' में रानी कैकेयी के पश्चाताप का सजीव वर्णन किया है. उन्होंने लिखा- कैकेयी भरी सभा में कहती है कि- हा, क्या कर सकती थी मरी मंथरा दासी, मेरा मन ही रह न सका निज विश्वासी. मैथिलीशरण गुप्त जी को पद्मभूषण सम्मान से भी नवाजा गया. मैथिलीशरण गुप्त जी की प्रमुख कृतियां हैं- साकेत, यशोधरा, जयद्रथ वध, पंचवटी, अर्जन-विसर्जन, काबा-करबला. आज हम आपके लिए कविता कोश के सभार से लाए हैं मैथिलीशरण गुप्त जी की कुछ कविताएं...

    जीवन की ही जय हो...

    मृषा मृत्यु का भय है
    जीवन की ही जय है .

    जीव की जड़ जमा रहा है
    नित नव वैभव कमा रहा है
    यह आत्मा अक्षय है
    जीवन की ही जय है.

    नया जन्म ही जग पाता है
    मरण मूढ़-सा रह जाता है
    एक बीज सौ उपजाता है
    सृष्टा बड़ा सदय है
    जीवन की ही जय है.

    जीवन पर सौ बार मरूँ मैं
    क्या इस धन को गाड़ धरूँ मैं
    यदि न उचित उपयोग करूँ मैं
    तो फिर महाप्रलय है
    जीवन की ही जय है.

    नर हो, न निराश करो मन को...

    नर हो, न निराश करो मन को

    कुछ काम करो, कुछ काम करो
    जग में रह कर कुछ नाम करो
    यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
    समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
    कुछ तो उपयुक्त करो तन को
    नर हो, न निराश करो मन को.

    दोनों ओर प्रेम पलता है...

    दोनों ओर प्रेम पलता है.
    सखि, पतंग भी जलता है हा! दीपक भी जलता है!

    सीस हिलाकर दीपक कहता--
    ’बन्धु वृथा ही तू क्यों दहता?’
    पर पतंग पड़ कर ही रहता
    कितनी विह्वलता है!
    दोनों ओर प्रेम पलता है.
    बचकर हाय! पतंग मरे क्या?
    प्रणय छोड़ कर प्राण धरे क्या?
    जले नही तो मरा करे क्या?
    क्या यह असफलता है!
    दोनों ओर प्रेम पलता है.
    कहता है पतंग मन मारे--
    ’तुम महान, मैं लघु, पर प्यारे,
    क्या न मरण भी हाथ हमारे?
    शरण किसे छलता है?’
    दोनों ओर प्रेम पलता है.
    दीपक के जलने में आली,
    फिर भी है जीवन की लाली.
    किन्तु पतंग-भाग्य-लिपि काली,
    किसका वश चलता है?
    दोनों ओर प्रेम पलता है.
    जगती वणिग्वृत्ति है रखती,
    उसे चाहती जिससे चखती;
    काम नहीं, परिणाम निरखती.
    मुझको ही खलता है.
    दोनों ओर प्रेम पलता है.

    निरख सखी ये खंजन आए...

    निरख सखी ये खंजन आए
    फेरे उन मेरे रंजन ने नयन इधर मन भाए
    फैला उनके तन का आतप मन से सर सरसाए
    घूमे वे इस ओर वहाँ ये हंस यहाँ उड़ छाए
    करके ध्यान आज इस जन का निश्चय वे मुसकाए
    फूल उठे हैं कमल अधर से यह बन्धूक सुहाए
    स्वागत स्वागत शरद भाग्य से मैंने दर्शन पाए
    नभ ने मोती वारे लो ये अश्रु अर्घ्य भर लाए.

    चारु चंद्र की चंचल किरणें...

    चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
    स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में.
    पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
    मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

    पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
    जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर-वीर निर्भीकमना,
    जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?
    भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥

    किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,
    राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये.
    बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
    जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!

    मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है,
    तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है.
    वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी,
    विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥

    कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;
    आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता.
    बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी,
    मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई-

    क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;
    है स्वच्छन्द-सुमंद गंध वह, निरानंद है कौन दिशा?
    बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
    पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप!

    है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर,
    रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर.
    और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है,
    शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है.

    सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,
    अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है!
    अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
    पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥

    तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात,
    वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात.
    अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की.
    किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की!

    और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे,
    व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे.
    कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक;
    पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक!

    Tags: Book, Corona Days, Lifestyle

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