'ऋतिक की तरह मेरी आंखें भी भूरी हैं, मैं बस अंग्रेज़ी नहीं बोल पाता'

साढ़े नौ साल का ऋतिक रोशन आलू-प्याज के ढेर के बीच स्थिर बैठे हुए भी थिरकता नजर आता है. 8 महीने पहले बिहार के छपरा से महानगर आया. वजह अच्छी पढ़ाई नहीं, बल्कि ये रही कि बड़ा होता लड़का घर का कमाऊ सदस्य हो सकता है. ऋतिक

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: April 24, 2018, 11:45 AM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: April 24, 2018, 11:45 AM IST
मुझे डांस करना बहुत अच्छा लगता है. घर पर नाचता हूं तो भाई-बहन मजाक उड़ाते हैं कि मैं लड़कियों की तरह ठुमके लगाता हूं. मुझे गुस्सा नहीं आता. उल्टे मैं ठुमके लगाते-लगाते उन्हें गिरा देता हूं. बड़ा होकर हीरो बनूंगा और पर्दे पर खूब ठुमके लगाउंगा. तब मेरे भाई-बहन मुझे दीदे फाड़कर बस देखते रह जाएंगे.

साढ़े नौ साल का ऋतिक रोशन आलू-प्याज के ढेर के बीच स्थिर बैठे हुए भी थिरकता नजर आता है. 8 महीने पहले बिहार के छपरा से महानगर आया. वजह अच्छी पढ़ाई नहीं, बल्कि ये रही कि बड़ा होता लड़का घर का कमाऊ सदस्य हो सकता है. ऋतिक इस उम्मीद पर खरा भी उतर रहा है, लेकिन अपने सपनों को न खोने की कीमत पर. पढ़ें, ऋतिक की कहानी, उन्हीं के शब्दों में.

पहली बार रेलगाड़ी में बैठा था, वो भी दिल्ली आने के लिए. हम चारों भाई-बहन बहुत खुश थे लेकिन थोड़ी-थोड़ी देर में हमारी लड़ाई हो रही थी. छोटी बहन ने मुझे नोंच दिया, क्योंकि वो खिड़की से पास से नहीं उठना चाहती थी. बाबू (पापा) ने कहा कि मैं बड़ा हूं इसलिए मैं जहां हूं, वहीं रहूं. ये बात मुझे कभी अच्छी नहीं लगी.

बड़ा हूं तो क्या मेरा मन खिड़की से देखने को नहीं चाह सकता! मुझे भी भागते घर, पेड़ छोटे भाई-बहनों जितने ही अच्छे लगते हैं.

पहले हम सब भाई-बहन मां के साथ गांव में रहा करते थे. वहीं के स्कूल में पढ़ा करते. इस साल बापू ने कहा कि हमें दिल्ली चलना चाहिए ताकि ऊपर के कामों में हाथ भी बंट जाए और बापू को भी घर में पका खाना मिल सके. मां और हम सब बच्चे बहुत खुश थे. आने से पहले मैं गांवभर में बोलता फिरा कि मैं अभी दिल्ली जा रहा हूं, बाद में ऐसे ही बॉम्बे (मुंबई) चला जाऊंगा.

जन्म के बाद मेरा ऐसा कोई नाम नहीं था, सब मुझे बाबू, लल्ला बुलाते. घरवाले कहते हैं कि मैं बहुत छोटे से ही ऋतिक रौशन के गाने पर हाथ-पैर हिलाकर नाचने की कोशिश करता, तभी से मेरा नाम ऋतिक रख दिया. मुझे ऋतिक बहुत पसंद है. उसी की तरह मेरी आंखें भी भूरी-भूरी हैं और मैं भी उसी की तरह तेजी से नाच लेता हूं. बस अंग्रेजी नहीं बोल पाता.

दिल्ली आकर मैंने सोचा था कि यहां सब लोग अंग्रेजी बोलते होंगे लेकिन मेरे स्कूल के बच्चे भी मेरी तरह गरीब घर से हैं और उतनी अंग्रेजी नहीं बोल पाते.

यहां आया तब मैं पहले हिंदी भी नहीं बोल पाता था, दोस्तों से भोजपुरी में बात करता. आठ महीनों में हिंदी बोलना सीख पाया, अब अंग्रेजी बोलना सीखने में पता नहीं कितना वक्त लगे!

हर दिन कहीं न कहीं सब्जी बाजार लगता है और मैं अपने पापा के साथ ठेला लेकर आता हूं. पहले मुझे आलू-प्याज़ बेचना उतना अच्छा नहीं लगता था लेकिन बाबू जर्बदस्ती ले आते थे. जैसे ही वो हटते, मैं ग्राहकों को उल्टे-सीधे दाम बताता ताकि मुझे तौलने की मेहनत न करनी पड़े. अब ऐसा नहीं करता. बापू का हाथ बंटाता हूं ताकि काम जल्दी खत्म हो जाए और मुझे घर जाकर नाचने मिले.
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