'ज़िंदगी जब भी तेरी बज्‍़म में लाती है हमें...' शहरयार का दिलकश कलाम

'ज़िंदगी जब भी तेरी बज्‍़म में लाती है हमें...' शहरयार का दिलकश कलाम
कुंवर अख़लाक़ खान यानी शहरयार को बचपन से शायरी का नहीं, हॉकी खेलने का जुनून था.

कुंवर अख़लाक़ मुहम्मद ख़ान (Akhlaq Mohammed Khan) उर्दू अदब की दुनिया में 'शहरयार' (Shaharyar) के नाम से जाने जाते हैं...

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 8, 2020, 9:01 AM IST
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उर्दू के मशहूर शायर (Shayar) कुंवर अख़लाक़ मुहम्मद ख़ान (Akhlaq Mohammed Khan) उर्दू शेरो-सुख़न  की दुनिया में 'शहरयार' (Shaharyar) के नाम से जाने जाते हैं. उनका जन्‍म 16 जून, 1936 को उत्तरप्रदेश (Uttar Pradesh) के जिला बरेली (Bareilly) में हुआ था. उन्‍होंने फिल्‍मों के लिए भी गीत लिखे. 'उमराव जान' की मशहूर ग़ज़ल (Ghazal) आज भी लोगों की ज़बान पर हैं. उन्‍हें ज्ञान पीठ और साहित्य अकादमी सहित कई अहम सम्मानों से नवाज़ा गया. उनकी अहम किताबों में ख़्वाब का दर बंद है, शाम होने वाली है, मिलता रहूंगा ख़्वाब में आदि शामिल हैं. आज 'रेख्‍़ता' के साभार से पेश हैं 'शहरयार' के चंद अहम अशआर. आप भी उनके बेशक़ीमती कलाम का लुत्‍फ़ उठाइए...

 'शहरयार' ने शायरी के अलावा गमन, उमराव जान, अंजुमन, जूनी, दामन फिल्‍मों के लिए गीत भी लिखे. इसके बावजूद उन्‍हें फिल्‍मों में गीत लिखने का शौक नहीं था.
'शहरयार' ने शायरी के अलावा गमन, उमराव जान, अंजुमन, जूनी, दामन फिल्‍मों के लिए गीत भी लिखे. इसके बावजूद उन्‍हें फिल्‍मों में गीत लिखने का शौक नहीं था.


कुंवर अख़लाक़ खान यानी शहरयार को बचपन से शायरी का नहीं, हॉकी खेलने का जुनून था.
कुंवर अख़लाक़ खान यानी शहरयार को बचपन से शायरी का नहीं, हॉकी खेलने का जुनून था.




 1965 में 'इस्मे-आज़म' की शक्ल में 'शहरयार' का पहला मजमुआ (काव्‍य संग्रह) प्रकाशित हुआ. इसे बेहद पसंद किया गया.
1965 में 'इस्मे-आज़म' की शक्ल में 'शहरयार' का पहला मजमुआ (काव्‍य संग्रह) प्रकाशित हुआ. इसे बेहद पसंद किया गया.

 उन्होंने उर्दू में एमए किया और 1966 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लेक्चरर हो गए.
उन्होंने उर्दू में एमए किया और 1966 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लेक्चरर हो गए.
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