प्रियंका गांधी की जींस और कीचड़ वाले जूते

जींस का इतिहास गवाह है कि ये कपड़ा श्रम का प्रतीक है. इसलिए हर वो स्त्री जो श्रम कर रही है, जींस उसका कपड़ा है. और इस समाज के मर्दों को श्रम का ये कपड़ा शर्मिंदगी वाला कपड़ा लगता है और इसे पहनने वाली लड़की शर्मिंदगी का सबब.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: April 20, 2019, 7:53 AM IST
प्रियंका गांधी की जींस और कीचड़ वाले जूते
प्रियंका गांधी की ट्विटर प्रोफाइल
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: April 20, 2019, 7:53 AM IST
अगर आप ट्विटर पर हैं तो आपने प्रियंका गांधी की प्रोफाइल देखी होगी. बाकी महिला नेताओं की भी.
सुषमा स्वराज ने अपनी प्रोफाइल फोटो में साड़ी पहन रखी है. माथे पर लाल रंग की मोटी सी बिंदी है और बालों में उससे भी मोटा लाल सिंदूर. निर्मला सीतारमन की प्रोफाइल फोटो की नीली साड़ी बहुत करीने से बंधी है. माथे पर बिंदी है, हाथ में कंगन और नजरें थोड़ी झुकी हुई. डिंपल यादव गुलाबी रंग की साड़ी में हैं और मायावती दुपट्टे समेत सलवार-कुर्ते में. ममता बनर्जी की प्रोफाइल इन दिनों एक्टिव नहीं, लेकिन जब थी तो कंधे को नीले बॉर्डर वाली सफेद साड़ी से इस तरह ढका गया था कि एक इंच ब्लाउज भी नजर न आए.



भारतीय राजनीति में औरतों का प्रतिनिधित्व कर रही ये सारी महिला नेता वो कपड़ा पहनती हैं, जो मेरी मां पहनती हैं, मेरी दादी-नानी ताउम्र पहनती रहीं, और जो अभी पिछली पीढ़ी तक तकरीबन सभी भारतीय परिवारों की औरतें पहना करती थीं.

इन सबके बीच एक और महिला पॉलिटिशियन की ट्विटर प्रोफाइल है, जो अभी ढाई महीने पहले ही बनी है- प्रियंका गांधी की. साड़ी, शलवार-कुर्तों, दुपट्टों, बिंदी और सिंदूर के इस पूरे तामझाम के बीच वो इकलौती ऐसी प्रोफाइल है, जिसमें उन्होंने नीली जींस और नीली शर्ट पहनी हुई है. पैरों में नाजुक सैंडिल नहीं, काले रंग के सख्त से दिखते जूते हैं, लेकिन जूते गंदे और धूल अटे हैं. जूते गंदे होते ही हैं क्योंकि पैरों को गंदगी से बचा रहे होते हैं. जूते सख्त हैं, लेकिन चेहरे पर बड़ी सौम्य मुस्कान. प्रियंका की नीली शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले हैं, उतने ही कि कपड़ा हवादार हो, अशालीन नहीं. एक हाथ में घड़ी बंधी है और एक में मोबाइल. बाकी कोई आभूषण, कोई श्रृंगार नहीं. शादीशुदा होने का कोई निशान भी नहीं, जो हमारे यहां औरतों पर सात फेरे लगते ही लाद दिया जाता है ताकि पराया मर्द दूर से ही देखकर तसदीक कर ले कि ये औरत किसी और मर्द की संपत्ति है. जबकि मर्द के सिर से लेकर पांव तक किसी कोने से जान नहीं पड़ता कि वो अब तक किसी की प्रॉपर्टी हुआ कि नहीं.

तो प्रियंका गांधी की प्रोफाइल देखकर ये एकदम नहीं जान पड़ता कि उनका मैरिटल स्टेटस क्या है. कि उनके दो वयस्क बच्चे हैं.

वो इस देश की एक आम लड़की की तरह जींस, जूते, घड़ी में कहीं घास-फूस मिट्टी के बीच किसी पत्थर पर बैठी मुस्कुरा रही हैं.


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प्रियंका के कपड़ों की इतनी तफसील से बात यहां इसलिए हुई क्योंकि इन्हीं कपड़ों से हमारे मर्द नेताओं को बड़ी तकलीफ है. कोई ये नहीं कहता कि प्रियंका ने भाषण कैसा दिया, क्या बोलीं, जब पहली बार मंच पर बोलने आईं तो “मेरी प्यारी बहनों और भाइयों” बोलीं, “भाइयों और बहनों” नहीं. वो बात करते हैं प्रियंका की जींस और कटे हुए बालों की. वो टिप्पणियां करते हैं, उनके पहनावे पर, लाइफ स्टाइल पर. वैसे ही, उतने ही हक से, जैसे आम जिंदगी में लोग करते हैं. कोई भी खाप मुंह उठाकर फरमान जारी कर देता है कि “आज से इस गांव की लड़कियों का जींस पहनना बंद, मोबाइल रखना बंद.” जैसे छोटे शहरों और कस्बों के पिता गुस्से में फैसला सुनाते हैं- “जींस पहनी तो टांगें तोड़ दूंगा.” जैसे धर्मगुरु मंच से ज्ञान देते हैं, “जींस पहनने वाली लड़कियां बांझ हो जाती हैं, उनकी संतान संस्कारविहीन हो जाती है.” जैसे छोटे शहरों के लड़के फरमान तो नहीं देते, लेकिन मन में सोचते हैं, “सलवार-कुर्ते वाली लड़की संस्कारी और जींस वाली चालू.”

जैसे समाज में लड़कियों पर सब अपना हक समझते हैं. उन्हें ज्ञान देना, आदेश करना, फैसले सुनाना, सबक सिखाना सब अपना कर्तव्य समझते हैं. वैसे ही राजनीति में सब प्रियंका गांधी के कपड़ों पर पूरे हक से फैसले सुना रहे हैं. जींस वाली परकटी लड़की, ये क्या राजनीति करेगी, ये क्या देश चलाएगी. देश चलाएंगे हम मर्द, हम चाहे जींस में हों या धोती में.

इनका दोहरापन यहीं खत्म नहीं होता. भगवा धोती वाले बाबा रामदेव पहनते तो संस्कारी कपड़ा हैं, लेकिन बेचते कुसंस्कारी जींस हैं. हाल ही में उनकी कंपनी पतंजलि ने पतंजलि ब्रांड जींस लांच की थी. लेकिन जींस बेचने से उनके संस्कारों पर कोई आंच नहीं आती. जींस पहनने से आ जाती है और वो भी सिर्फ लड़कियों के.

लेकिन है तो ये लोकतंत्र और लोकतंत्र में वोट देने लड़कियां भी उतनी ही जाती हैं, जितना लड़के जाते हैं. धोती और जींस वाले सारे मर्द नेताओं को औरतों का वोट भी चाहिए.
इन्हें वोट देने वाली लड़कियां कौन हैं? इस साल ढाई करोड़ से ज्यादा लड़कियां 18 साल की हुई हैं और पहली बार वोट देने वाली हैं. डेमोग्राफी के मुताबिक इस वक्त देश की बहुसंख्यक आबादी 28 साल से कम उम्र की है और उसमें भी 50 फीसदी लड़कियां हैं. 28 से कम उम्र की देश के कोने-कोने में बिखरी ये वो लड़कियां हैं, जो रोज जींस पहनकर कॉलेज जाती हैं, दफ्तर, बाजार, दुकान, सिनेमा जाती हैं, दौड़कर बस, मेट्रो, रिक्शा पकड़ती हैं, नौकरी करने जाती हैं, अपने पैसे कमाने जाती हैं, बेहतर जिंदगी बनाने जाती हैं.



उनमें से कोई लड़की साड़ी पहनकर दौड़ नहीं लगाती. वो जींस और टॉप में है. उसने डेनिम का वो कपड़ा पहना है, जिसका आविष्कार मजदूरों के लिए हुआ था ताकि वो उसे पहनकर मेहनत वाला काम कर सकें. 17वीं सदी में ये कपड़ा सबसे पहले इटली में बनाया गया, श्रमिकों के लिए. फिर 18वीं सदी में अमेरिका के कैलीफोर्निया में जब सोने की खदानों की खोज हुई तो मजदूरों के लिए एक ऐसे कपड़े की जरूरत पड़ी, जिसे पहनकर आसानी से खदानों में घुसा जा सके. कपड़ा फटे नहीं, जल्दी गंदा न हो, उसे बार-बार धोना न पड़े. फिर डेनिम आया. नाम पड़ा जींस. 1871 में लेवी स्त्रास ने इसे पेटेंट करा लिया. तब से ये पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा पहना जाने वाला परिधान है.

भले बाद में बाजार ने इसे पेटेंट कर लिया, ब्रांड बना दिया. जींस महंगी हो गई तो भी सस्ती जींस कभी बाजार से गायब नहीं हुई. आज भी छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक स्टेशन के बाहर 200 रु. की जींस बिकती है, जिसे हर वो लड़का और लड़की खरीद सकते हैं, जो किस्मत वाले घरों में पैदा नहीं हुए, लेकिन अपनी किस्मत बदलना चाहते हैं.

जींस का इतिहास गवाह है कि ये कपड़ा श्रम का प्रतीक है. इसलिए हर वो स्त्री जो श्रम कर रही है, जींस उसका कपड़ा है. जो पुलिस में है, फौज में है, पैरामिलिट्री फोर्स में है, जो फक्ट्रियों और खदानों में काम कर रही है, जो मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट में काम कर रही है, जो श्रम और उत्पादन के काम में लगी है, जो सड़क पर ट्रैफिक कंट्रोल कर रही है, जो एयरपोर्ट के मेटल डिटेक्टेटर पर चेकिंग कर रही है, जो हवाई जहाज उड़ा रही है, जो 15 किलो का कैमरा कंधे पर उठाए दौड़ रही है, जो बॉर्डर पर तैनात है और जिसके साथ प्रियंका गांधी ने तीन दिन पहले वो तस्‍वीर टि्वटर पर शेयर की थी, जो चॉपर उड़ा रही थी. ये सारी लड़कियां जींस में है क्योंकि वो जींस में ही हो सकती है. कोई और कपड़ा उस काम के लिए मुफीद नहीं, जो श्रम का काम है.

और इस समाज के मर्दों को श्रम का ये कपड़ा शर्मिंदगी वाला कपड़ा लगता है और इसे पहनने वाली लड़की शर्मिंदगी का सबब. क्योंकि ये चुस्त है, शरीर से चिपका है, क्योंकि टांगों और जांघों का आकार दिखाई देता है इसमें. वो तो मर्द का भी दिखता है, लेकिन मर्द देह पर कोई शर्मिंदा कब हुआ. देह की सारी शर्मिंदगी तो औरत के हिस्से की है.

दिल्ली-मुंबई की लड़कियों के लिए जींस शायद कोई बड़ी बात न हो, लेकिन छोटे शहर, गांव और कस्बे की हर लड़की के लिए बहुत बड़ी बात है. छोटे शहर की हर लड़की ने घरवालों से छिपकर पहनी है जींस, बड़ी हसरतों से खरीदी है जिंदगी की पहली जींस. हर लड़की के पास है एक जींस वाली कहानी- “उसकी पहली जींस.” जींस उन लड़कियों के लिए उस आजादी का प्रतीक है, जिसका वो सपना देखती हैं और जिस सपने का रास्ता अथक श्रम से होकर जाता है. वो जींस पहनकर दौड़ना चाहती हैं कि एक दिन अपने कस्बे से बाहर निकल सकें और किसी नामुराद मर्द से ब्याह न दी जाएं.

इसलिए श्रम के रास्ते अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने की राह पर निकली ये लड़कियां न सुषमा स्वराज के सिंदूर से खुद को जोड़कर देखती हैं, न मेनका गांधी के स्ट्रेट बालों से, न सोनिया गांधी की खादी की साड़ियों से.

उनका कपड़ा तो प्रियंका गांधी ने पहना है- “रफ-टफ जींस और कीचड़ वाले जूते.”

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