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'क़मर' जलालाबादी : 'ग़ज़ल न ऐसी सुना जिसको भूल जाऊं'

Naaz Khan | News18Hindi
Updated: April 1, 2020, 1:25 PM IST
'क़मर' जलालाबादी :  'ग़ज़ल न ऐसी सुना जिसको भूल जाऊं'
उनके गीतों में मुहब्‍बत की कसक, जुदाई की टीस आज भी संगीत प्रेमियों को खींचती है. फोटो साभार/यूट्यूब

उन्होंने फिल्मों से हट कर भी अपनी शायरी का सिलसिला कभी टूटने नहीं दिया. 'रश्के-कमर' उनकी ऐसी ही गैरफिल्मी गजलों का संग्रह है. उनके अंदर के शायर ने जब-जब अंगड़ाई ली, ग़ज़ल वजूद में आई

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29 फरवरी, जन्‍मदिवस 

'कमर' जलालाबादी 29 फरवरी, 1916 को अमृतसर जिले के जलालाबाद में पैदा हुए थे. उनके शायरी के शौक ने उन्‍हें ओम प्रकाश भंडारी से 'कमर' जलालाबादी बना दिया. 'कमर' जलालाबादी की शायरी की शुरुआत बहुत छोटी उम्र में ही हो गई थी. हालां‍कि‍ उन्‍होंने कम उम्र में अपना पहला जो गीत लिखा वह खुद उन्‍हें भी पसंद नहीं आया और उन्‍होंने कहा था, 'वजन के ऐतबार से इस गीत के तीनों मिस्रे गलत हैं. ऐसा होना भी था, क्योंकि 09 साल की उम्र में कोई क्या शायरी करेगा.'

कमर जलालाबादी 1935 में 'प्रताप' में बतौर शायर शामिल हुए थे. फिर 'मिलाप' और 'प्रभात' में भी बतौर ख़ास शायर के तौर पर काम किया. इसके बाद वह मासिक 'निराला' के संपादक बनाए गए. उर्दू साप्‍ताहिक 'स्‍टार' के पहले संपादक भी बने. बाद में उन्‍होंने इसके सारे अधिकार ले लिए. इसके बाद पंजाब फिल्‍म जर्नलिस्‍ट एसोसिएशन के सेक्रेटरी चुने गए. इस दौरान उन्‍होंने स्‍टार बंद कर दिया और वह पूना प्रभात फिल्‍म कंपनी में शामिल हो गए. 1946 में वह मुंबई गए और फिर यहीं बस गए.  कहा जाता है कि फिल्‍मों में उनके गीत बहुत पसंद किए जाते थे. उनके गीतों की लोकप्रियता ने उन्हें इतना व्यस्त कर दिया था कि एक बार जब राजकपूर ने उनसे अपनी फिल्म के लिए गीत लिखने का आग्रह किया तो उन्होंने राजकपूर को साफ इंकार कर दिया था और कहा था कि 'मैं 16 फिल्मों के गीत लिख रहा हूं और इतना व्‍यस्‍त हूं कि मेरे पास किसी को देखने तक की फुर्सत नहीं है.'



हालांकि उन्‍होंने गीतकार के तौर पर एक लंबा सफर तय किया. अपने जीवन की अहम बातें करते हुए एक बार उन्‍होंने कहा था कि 'अनारकली' नाटक के लेखक सैयद इम्तियाज अली 'ताज' की सिफारिश पर मुझे लाहौर में फिल्म 'जमींदार' के गीत लिखने का मौका मिला था. हालांकि इस फिल्म के सभी गीत लोकप्रिय हुए थे. मगर 'दुनिया में गरीबों को आराम नहीं मिलता, रोते हैं तो हंसने का पैगाम नहीं मिलता' गीत को सबसे अधिक पसंद किया गया. इस फिल्म के गीतों की लोकप्रियता ने ही मेरे सफर को लाहौर से मुंबई की ओर मोड़ दिया.'



अपने जीवन में उन्होंने गीतों के अलावा करीब डेढ़ सौ से अधिक कहानियां, स्क्रीन प्ले और संवाद भी लिखे हैं. उन्होंने जीवन के करीब चार दशक फिल्मी दुनिया में बतौर गीतकार, संवाद लेखक के तौर पर बिताए. फिर जब उन्‍हें तन्‍हाई का एहसास हुआ और उनके साथी दुनिया से कूच कर गए, तो उन्होंने भी माया नगरी को अलविदा कह दिया. इन चार दशक में उन्‍होंने एक से बढ़ कर एक गीत लिखे.

उनके लिखे गीत, 'मैं तो एक ख्वाब हूं, इस ख्वाब से तू प्यार न कर’ के बारे में एक बहुत दिलचस्‍प वाकिया है. इसे खुद उन्‍होंने बयां किया था और कहा था, 'जब मैंने संगीतकार कल्याण जी को यह गीत सुनाया तो उन्होंने कहा था कि हम तो पूरी उम्र 'प्यार कर' जैसे गीत बनाते रहे. इस 'प्यार न कर' की तरफ कभी ध्‍यान ही नहीं गया. इसके बाद उन्‍होंने अपनी फिल्म में इस गीत को लेने से ही इंकार कर दिया था. इत्तेफाक से उस वक्‍त कवि इंदीवर भी वहां मौजूद थे. उन्होंने कल्याण जी से कहा कि यह गीत बेहद सफल होगा और उनके कहने पर इस गीत को फिल्म 'हिमालय की गोद' में शामिल किया गया था.' आज भी यह गीत लोगों की जबान पर है.

उनके गीत कानों में रस घोलते रहे हैं. उनके गीतों के बोलों में मुहब्‍बत की कसक और जुदाई के दर्द की टीस दोनों आज भी संगीत प्रेमियों को खींचती है. फिल्‍म 'फागुन' का गीत 'एक परदेसी मेरा दिल ले गया, दीवानों से यह मत पूछो, मैं कैसे कहूं टूटे हुए दिल की कहानी, ओ दूर जाने वाले, वादा न भूल जाना, इक दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई दुनिया में हमारी तरह बर्बाद न हो, अंखियों का नूर है तू जैसे गीत लोगों की जबान पर हैं. अपने जीवन में उन्होंने जितने भी गीत लिखे, वे ज्‍यादातर लोकप्रिय हुए. इनमें फिल्म 'हावड़ा ब्रिज' का गीत आइए मेहरबां बैठिए जानेजां, 'महुआ' का मधुर गीत, दोनों ने किया था प्यार मगर मुझे याद रहा तू भूल गई, 'शहीद' का गीत, बदनाम न हो जाए और फिल्म 'पहली तारीख' का गीत, दिन है सुहाना आज पहली तारीख है, तो आज भी लोगों की जबान पर अक्‍सर आ ही जाता है.

इसके अलावा उन्होंने फिल्मों से हट कर भी अपनी शायरी का सिलसिला कभी टूटने नहीं दिया. 'रश्के-कमर' उनकी ऐसी ही गैरफिल्मी गजलों का संग्रह है. उनके अंदर के शायर ने जब-जब अंगड़ाई ली, ग़ज़ल वजूद में आई और व्यस्तता के बावजूद उन्होंने लिखा.

मत करो यारों इधर और उधर की बातें
कर सको तुम तो करो रश्‍के कमर की बातें

जो दिल को छू न सके, गुनगुना न पाऊं मैं
ग़ज़ल न ऐसी सुना जिसको भूल जाऊं

 

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First published: February 29, 2020, 12:11 PM IST
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