टैगोर के नायक औरतों पर झपट नहीं पड़ते, उनका दिल जीत लेते हैं

रबींद्रनाथ टैगोर के सबसे ख़राब नायक में भी वैसी निर्लज्ज कठोरता नहीं है, जैसी “पत्थर के सनम तुझे हमने मुहब्बत का खुदा जाना” गाते हुए हिंदी समाज के नायक में है.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: August 7, 2019, 5:56 PM IST
टैगोर के नायक औरतों पर झपट नहीं पड़ते, उनका दिल जीत लेते हैं
रबींद्रनाथ टैगोर
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: August 7, 2019, 5:56 PM IST
एक लड़का था अमूल्य. उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में, कोलकाता से दूर बंगाल के किसी गांव में और उसी गांव में एक लड़की थी मृण्मयी, जिसे सब मीनू कहकर बुलाते थे. जवान हो रही मीनू बिल्कुल आजाद पंछी की तरह अपने से कम उम्र के लड़कों के साथ गांव के बाग-बगीचों में आम तोड़ती, चिड़िया उड़ाती और आते-जाते राहगीरों को परेशान करती फिरती. अमूल्य एक धीर-गंभीर लड़का, आंखों पर चश्मा चढ़ाए, किताबों में सिर गड़ाए, कविताओं-कहानियों की दुनिया में तिरता फिरता.

अमूल्य और मीनू की ये कहानी ‘समाप्ति’ रबींद्रनाथ टैगोर ने 1900 के आसपास लिखी थी, जिस पर सत्यजीत रे ने 1961 में इसी नाम से फिल्म भी बनाई. मीनू की भूमिका में थी अपर्णा सेन. रबींद्रनाथ टैगोर की नायिकाओं का जब भी जिक्र हो, मीनू के जिक्र के बगैर बात पूरी नहीं होती. जैसे खुद टैगोर की कहानियों का जिक्र उनकी नायिकाओं के जिक्र के बगैर पूरा नहीं होता. कितने शोध हुए, कितने लेख लिखे गए उन औरतों पर, जिन्हें टैगोर ने अपनी कलम से रचा था. ‘चोखेर बाली’ की बिनोदिनी, ‘नष्टनीड़’ की चारूलता, ‘स्त्री-पत्र’ की मृणाल और ‘अपरिचित’ की कल्याणी. कहां से खोजी और कहां पर पाई थीं टैगोर ने ऐसी स्त्रियां, जो 18वीं सदी के अंत के बंगाल के बेहद रूढ़िवादी समाज में इस तरह अपने हृदय की सुनतीं और हृदय से जीती थीं. प्रेम, करुणा, त्याग और ममता के साथ आत्मबल, साहस और अपनी कामनाओं के ताप में ऐसे जलती, देह की राह चुनती स्त्रियां. ये वही बंगाल था, जो अपनी जीती-जागती औरतों को पति की जलती चिता पर सती किए दे रहा था.

लेकिन आज मैं उन औरतों की अनेकों बार सुनाई गई कहानी फिर से सुनाने नहीं बैठी. आज टैगोर की नायिकाओं की नहीं, उनके नायकों की कहानी सुनाऊंगी . मृण्मयी की नहीं, अमूल्य की कहानी. क्योंकि टैगोर के जन्म के तकरीबन डेढ़ सौ साल बाद भी हिंदुस्तान के हिंदी प्रदेश में पैदा हुई कोई भी लड़की जब उनके पुरुष चरित्रों से गुजरती है तो उसके मन में एक ही सवाल आता है, ये लड़के किस ग्रह के वासी थे? कहां से आए थे? क्या ऐसे भी लड़के होते हैं दुनिया में? क्योंकि हमने तो नहीं देखे. न अपने घरों में, समाज में, आसपास की दुनिया में, न अपनी कहानियों में, न अपने सिनेमा में.

तो कैसे थे वो मर्द, जो टैगोर की स्त्रियों के नायक थे. उनके पति, प्रेमी, पिता, भाई, पुत्र.

कैसा था अमूल्य?

अमूल्य जब चलता तो उसके पांव धरती पर अधिकार से नहीं, कृतज्ञता से पड़ते थे. मानो वो आने-जाने वाले सब राहगीरों, जीव-जंतुओं के हिस्से की जमीन छोड़ता चले और गलती से किसी चींटी पर भी पांव पड़ जाए तो सिर झुकाकर माफी मांग ले. उसकी नजरें दुनिया को ऐसे नहीं देखती थीं कि ये जो नदी के उस पार तक सारा जमीन-जंगल है, सब अपने बाप का माल है. वो सबकुछ को ऐसे देखता कि उसे बस पेड़ की एक निचली डाल मिल जाए बैठकर नदी निहारने को तो काफी है. कुछ भी नहीं था उसके समूचे होने में ऐसा, जिससे ताकत, दंभ, अहंकार, श्रेष्ठता और कुलीनता की बू आती.

टैगोर की कहानी समाप्ति पर सत्यजीत रे की बनाई फिल्म के एक दृश्य में अपर्णा सेन
टैगोर की कहानी समाप्ति पर सत्यजीत रे की बनाई फिल्म के एक दृश्य में अपर्णा सेन

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और अपनी स्त्री के साथ तो वो ऐसे पेश आता कि मेरी दादी-नानी अगर हिंदी में वो कहानी पढ़ सकतीं तो मुझे यकीन है कि रसोई में मुंह छिपा जारो-कतार रोतीं. लड़की न चूल्हा जलाना जाने, न मांछ पकाना, न घर का कोई काम तो कौन ऐसी लड़की से मुहब्बत से पेश आएगा. लेकिन मजाल है जो कभी अमूल्य अपनी आवाज ऊंची कर दे. मां को बहू से सौ नाराजगी हों, लेकिन मां की खुशी के लिए भी वो कभी मीनू को तिनके से भी नहीं छुएगा. जो वो खुद भी नाराज हुआ तो चुप हो गया. भड़ककर अपना अधिकार तब भी नहीं जताया. अमूल्य इतना विनम्र जैसे फलों वाली डाल, इतना तरल जैसे मांझ-भात का झोल, इतना सौम्य, जैसे मृण्मयी के नाजुक आलता वाले पांव.

ओह, ऐसा लड़का होता है कहीं. लड़के तो ऐसे नहीं होते. थोड़ा कठोर न हो, थोड़ा जिद्दी, थोड़ा रौबीला, थोड़ा अधिकार जमाने वाला तो काहे का मर्द. कहने वाले ये भी कह सकते हैं कि एक अमूल्य से क्या. भूल गई बासु चटर्जी की 1977 में आई फिल्म ‘स्वामी’ के घनश्याम को. फिल्म का नाम ही था स्वामी यानी पति. फिल्म का आखिरी संवाद भी यही था कि “एक स्त्री के स्वामी का घर ही उसका घर है.” लेकिन फेमिनिस्ट डीकोडिंग को एक किनारे कर अगर आप घनश्याम को करीब से देखेंगे तो उसकी विनम्रता, प्रेम और अच्छाइयों के सामने उसका स्वामी होना भी नहीं खलेगा.

अमूल्य भी ऐसा ही है. लेकिन अगर ये सिर्फ एक अमूल्य की, सिर्फ टैगोर के एक पुरुष चरित्र की बात होती तो इसी कहानी पर खत्म हो जाती. एक कहानी से ये कैसे साबित होगा कि टैगोर के पुरुष बेहतर मनुष्य थे. लेकिन वो सचमुच थे क्योंकि उनकी कहानी अपरिचित का अनुपम भी ऐसा ही है. शेष रोखा का गौदाई, बिनोद और चंद्रकांत भी ऐसे ही हैं. नष्ट नीड़ का अमल और यहां तक कि भूपति भी विनम्र और स्नेही ही हैं. चोखेर बाली का बेहारी और यहां तक कि स्त्री पत्र का सामंती पति भी हमारे देखे-जाने सामंती पतियों के मुकाबले कितना शांत और विनम्र सामंती है.

टैगोर के नायकों को पर्दे पर उतारने वाले सत्यजीत रे
टैगोर के नायकों को पर्दे पर उतारने वाले सत्यजीत रे


टैगोर की कहानियों का सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश वही है, जो आज से डेढ़ सौ पुराने भारतीय समाज का था. वहां स्त्री और पुरुष की पारंपरिक भूमिकाएं तय हैं. लाल साड़ी, सिर के बीचोंबीच तक सिंदूर से भरा माथा, ढेर सारे आभूषण, कलाई में सुहाग की निशानी शाका-पोला और पैरों में लाल आलता वाली उन औरतों के सौंदर्य वर्णन में ऐसी चमक है कि मानो उन शब्दों को लिखे जाने से किताब का पन्ना भी चमकने लगता है. मृणाल पति की शर्ट के बटन टांकती है और चारूलता भरी दोपहरी घर के सारे काम निपटाकर सुस्ताने के समय पर उठकर अमल और उसके दोस्तों के लिए माछ पकाने लगती है. कल्याणी अलगनी से कपड़े उतारकर करीने से तहाती है. कादंबिनी प्रेम पत्र लिखने से पहले घर के सारे काम निपटाती है. टैगोर की स्त्रियां मेजपोश काढ़ती हैं और साड़ियों में बूटे जड़ती हैं. वो बहुत सारा समय रसोई में रहती हैं और तरह-तरह के पकवान बनाती हैं. देह के ताप में जलती हुई भी कोई अपना अधिकार मांगने नहीं जातीं. बस अपनी कामना और पुरुष के सामने ऐसे न्यौछावर हो जाती हैं, जैसे घर आई नई बहू के पैरों की चोट खाकर कलश में भरे चावल जमीन पर छिटक जाते हैं.

वो सारी स्त्रियां वैसी ही हैं, जैसी अमूमन हमने आसपास तब देखीं, जब दुनिया इतनी तेजी से बदल नहीं रही थी. वो चौथी पास लेकिन कविताएं लिखने और पढ़ने वाली औरतें मर्दाने माल-असबाब में अपनी हिस्सेदारी का कोई दावा नहीं करतीं. वो सिर झुकाती हैं, लेकिन कोई मर्द उन्हें इसलिए नहीं दबाता क्योंकि उन्होंने सिर झुकाया. उनके मर्द विनम्र इसलिए नहीं हैं कि औरतों की आजादी की धमक ने उन्हें ऐसा होने को मजबूर किया है. वो ऐसे ही हैं. सरल और सौम्य.

टैगोर की कहानियों के पुरुषों को पढ़ते हुए मुझे लगा था कि अगर उत्तर भारत के मर्द इन कहानियों को पढ़कर बड़े हुए होते तो वो किस तरह के इंसान होते. वो औरत से कभी ऊंची आवाज में बात नहीं करते, वो औरत पर हाथ नहीं उठाते, वो उसके साथ चालबाजियां नहीं करते, उसे धोखा नहीं देते, उन्हें मर्द होने का अहंकार नहीं होता, सेक्स के लिए वो औरतों पर झपट नहीं पड़ते, वो उनका दिल जीतते, प्रेम करने को आते वो बालों से नहीं तलवों से शुरुआत करते, सिर झुकाते, आग्रह करते, आदर करते, प्रशंसा करते, जान छिड़कते. टैगोर के नायक ये सब करते हैं. कुछ स्वार्थी और निर्लज्ज भी हैं. जैसे ‘षश्टी’ कहानी का उपेंद्र और ‘दुई बोन’ का शशांक. लेकिन सच पूछो तो उनकी निर्लज्जता में भी वैसी निर्लज्ज कठोरता नहीं है, जैसी “पत्थर के सनम तुझे हमने मुहब्बत का खुदा जाना” गाते हुए हिंदी समाज के नायक में है. जैसे पारो के देवदास में है, जैसे जैनेंद्र के उपन्यास ‘त्यागपत्र’ के प्रमोद में है और यहां तक कि इतने चाहे और सराहे गए ‘शेखर एक जीवनी’ के शेखर में भी है.

बात सिर्फ टैगोर की कहानियों की है. उनके लिखे-रचे पुरुष चरित्रों की. जमीनी हकीकत क्या थी और क्या है, बहुत पता नहीं. लेकिन उनकी कहानियों की बात ऐसी थी कि वो हमारी जिंदगी की बात आज भी नहीं लगती. इसलिए उनकी कहानियां पढ़कर पिछड़े समाजों की स्त्रियों को काठ मार जाता है. उनका दिल बैठ जाता है. हालांकि दुनिया बदल रही है. अब तो हिंदी समाज के अर्बन स्पेस में भी औरतों के न्याय, हक, बराबरी का बहुत सारा नरेटिव आ गया है. लेकिन असल बात तो अब भी नहीं हो रही. लड़कों को कैसा होना चाहिए, इसका नरेटिव कहां है? हमारा अमूल्य, हमारा अनुपम कहां है, जो कल्याणी की देह पाए बगैर भी उसके काम के लिए अपना जीवन समर्पित कर दे. जो धरती पर अधिकार से नहीं, कृतज्ञता से पांव धरे. जो स्त्री को हासिल न करे, उसका दिल जीत ले.

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First published: August 7, 2019, 10:38 AM IST
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