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गर्म होती है मूली की तासीर लेकिन शाम में हो जाती है ठंडी, पढ़ें इसका वर्षों पुराना रोचक इतिहास

मूली की हजारों सालों से खेती की जा रही है, लेकिन इसकी उत्पत्ति के स्थल को लेकर ठोस प्रमाण नहीं है.

मूली की हजारों सालों से खेती की जा रही है, लेकिन इसकी उत्पत्ति के स्थल को लेकर ठोस प्रमाण नहीं है.

मूली की हजारों सालों से खेती की जा रही है, लेकिन इसकी उत्पत्ति के स्थल को लेकर ठोस प्रमाण नहीं है. हां, इतना ज़रूर कहा ...अधिक पढ़ें

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हाइलाइट्स

मूली का लिखित इतिहास तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व माना गया है.
दुनिया में मूली का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व भी रहा है.
थायराइड की समस्या से जुड़े लोगों को मूली का सीमित सेवन करना चाहिए.

Radish Benefits and Its History: भोजन का अनियमित सेवन और दूषित पेयजल लिवर में परेशानी का कारण बन सकते हैं. लिवर को दुरुस्त रखना है तो मूली का सेवन करें. यह लिवर को बीमारियों से बचाए रखती है. इसका सेवन पीलिया के इलाज के लिए भी उपयोगी है. शुगर को भी बढ़ने नहीं देती है मूली. इसे पेट के लिए भी बेहद लाभकारी माना जाता है. दुनिया में इसका हजारों वर्षों से सेवन हो रहा है, लेकिन इसका इतिहास गडमड है.

मूली का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व 

मूली को सब्जी के रूप में भी खाया जा सकता है और इसके सलाद का तो जवाब नहीं है. यह असल में एक जड़ है, जिसके पत्ते भी खाए जाते हैं. यह ऐसी सब्जी है, जो बहुत जल्दी उग जाती है. विशेष बात यह है कि मूली की तासीर गर्म होती है, लेकिन शाम के बाद खाओ तो इसकी तासीर ठंडी हो जाती है. दुनिया में मूली का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व भी रहा है और गुलामों का यह मशहूर भोजन रहा है. प्राचीन काल में यूनानी लोग अपने देवता अपोलो को सोने की मूली की प्रतिकृति भेंट करते थे. आज भी मेक्सिको में क्रिसमस की पूर्व संध्या से पहले 23 दिसंबर को मूली उत्सव ‘ला नोचे डी लॉस रबानोस’ मनाया जाता है, जिसमें मूर्तिकार बड़ी मूलियों की शानदार मूर्तियां बनाते और खुशियां मनाते हैं. ऐसा कहा जाता है कि मिस्र में जब पिरामिडों का निर्माण किया जा रहा था तो दासों को खाने के लिए मूली की सब्जी दी जाती थी. उन्हें मजदूरी के रूप में मूली, प्याज और लहसुन का भुगतान किया जाता था. आज दुनिया में सैंकड़ों किस्म की गोल व लंबी मूली उगाई जाती है, इसके बावजूद वैश्विक सब्जियों में इसका प्रतिशत मात्र 2 है.

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मूली की तासीर गर्म होती है, लेकिन शाम के बाद खाओ तो इसकी तासीर ठंडी हो जाती है.

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चीन और भारत से जुड़े हुए हैं इसके तार

मूली की हजारों सालों से खेती की जा रही है, लेकिन इसकी उत्पत्ति के स्थल को लेकर ठोस प्रमाण नहीं है. हां, इतना ज़रूर कहा जाता है कि इसके तार चीन और भारत से जुड़े हुए हैं. अमेरिकी भारतीय वनस्पति विज्ञानी सुषमा नैथानी ने इसके दो उत्पत्ति केंद्र वर्णित किए हैं, जिनमें से एक चीन व दक्षिण पूर्वी एशिया है, जिनमें चीन, ताइवान, थाइलैंड, मलेशिया, फिलीपींस, वियतनाम, कोरिया आदि देश है. दूसरा, उत्पत्ति स्थल इंडो-बर्मा उपकेंद्र है, जिसमें भारत और म्यांमार शामिल है. वैसे, पिरामिडों के निर्माण से पहले प्राचीन मिस्र के ग्रंथों में मूली की खेती की जानकारी दी गई है. रोमन भी मूली के विभिन्न रूपों से परिचित थे. विशेष बात यह है कि 16वीं शताब्दी की शुरुआत में इंग्लैंड और फ्रांस में इसकी खेती शुरू हुई और फिर इसे अमेरिका में उगाया गया.

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16वीं शताब्दी की शुरुआत में इंग्लैंड और फ्रांस में इसकी खेती शुरू हुई

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चरकसंहिता में कच्ची मूली को माना गया है त्रिदोष नाशक

खोजबीन में यह पाया गया कि मूली का लिखित इतिहास तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व माना गया है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि भारत में सातवीं-आठवीं ईसा पूर्व लिखे गए आयुवेर्दिक ग्रंथ ‘चरकसंहिता’ के ‘हरितवर्ग’ अध्याय में मूली (संस्कृत नाम मूलकं) की जानकारी और उसके गुण-दोष बताए गए हैं. ग्रंथ के अनुसार, कच्ची मूली त्रिदोष (वात-पित्त-कफ) नाशक है, जबकि पकी हुई मूली त्रिदोषकारक मानी गई है. घी-तेल में पकाई गई मूली के पत्तों की भाजी वायुनाशक होती है, जबकि सूखी हुई मूली कफ-वात को जीतती है. भारतीय वनस्पति विज्ञानियों के अनुसार, 100 ग्राम मूली में नमी 94 ग्राम, कैलोरी मात्र 17, प्रोटीन 0.7 ग्राम, फैट 0.1 ग्राम, मिनल्स 0.6, फाइबर 0.8, कार्बोहाइड्रेट 3.4 ग्राम होता है. इसके अलावा, इसमें कैल्शियम, ऑक्सेलिक व नाइकोटिन एसिड, आयरन, सोडियम, विटामिन ए और विटामिन सी भी पाया जाता है. यूएसडीए (United States Department of Agriculture) ने तो मूली को बेहतरीन लो-केलोरी स्नैक घोषित किया है.

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कच्ची मूली त्रिदोष (वात-पित्त-कफ) नाशक है और पकी हुई मूली को त्रिदोषकारक माना गया है.

शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकाले मूली 

सरकारी अधिकारी व आयुर्वेदाचार्य आरपी पराशर के अनुसार, गजब है यह जड़ीली सब्जी. इसमें औषधिय गुण भी हैं, इसलिए कुछ बीमारियों में इसका सेवन बताया गया है. यह लिवर के लिए तो लाभकारी है ही, साथ ही पीलिया होने पर मूली खाकर इस रोग को कम किया जा सकता है. यह शरीर में डिटॉक्सिफायर के रूप में भी काम करती है यानी ब्लड को शुद्ध करती है. विषाक्त पदार्थों को बाहर निकाल देती है. कब्ज की समस्या वाले लोग इसका नियमित सेवन करें तो उन्हें आराम मिलेगा. इसे पाइल्स के लिए भी बेहतर बताया गया है. माना जाता है कि इसके सेवन से गुर्दे की पथरी की समस्या सुलझ सकती है. अगर सूंघने की शक्ति कम हो रही है तो मूली उसमें सुधार करती है. इसका सेवन यूरिन की जलन को भी कम करता है. इसे शुगर रोगियों के लिए लाभकारी माना जाता है, क्योंकि मूली में ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, जिसका अर्थ है कि इसे खाने से ब्लड शुगर के स्तर पर कोई असर नहीं पड़ता. ब्रोंकाइटिस और अस्थमा जैसे श्वसन विकारों में भी मूली लाभकारी मानी जाती है.

इन रोगों में सीमित मात्रा में करें मूली का सेवन

आरपी पराशर के अनुसार, मूली में पाए जाने वाले विटामिन्स और अन्य तत्व स्किन में नमी के स्तर को बनाए रखने में मदद करते हैं. मूली में एंटी-प्रुरिटिक्स (Antipruritics) गुण होते हैं यानी मूली कीड़ों व अन्य वजहों से पैदा होने वाली खुजली से निजात दिलाती है. इसका रस दर्द और सूजन को भी कम करता है और प्रभावित क्षेत्र को शांत करता है. मूली का ज्यादा सेवन गैस पेट में गैस पैदा कर देता है. थायराइड की समस्या से जुड़े लोगों को मूली का सीमित सेवन करना चाहिए. जो लोग शुगर की दवाएं ले रहे हैं, उन्हें मूली खाने से पहले डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए.

Tags: Food, Lifestyle

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