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रघुवीर सहाय जन्मदिन विशेष: 'कहीं से ले आओ वह दिमाग़, जो खुशामद आदतन नहीं करता'

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Updated: December 9, 2019, 12:27 PM IST
रघुवीर सहाय जन्मदिन विशेष: 'कहीं से ले आओ वह दिमाग़, जो खुशामद आदतन नहीं करता'
रघुवीर सहाय जन्मदिन विशेष

संपादक, समीक्षक, कथाकार और कवि रघुवीर सहाय (Raghuvir Sahay) का 9 दिसंबर यानी आज जन्मदिन है.

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  • Last Updated: December 9, 2019, 12:27 PM IST
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संपादक, समीक्षक, कथाकार और कवि रघुवीर सहाय (Raghuvir Sahay) का 9 दिसंबर यानी आज जन्मदिन है. वह लिखते हैं, 'इस लज्जित और पराजित युग में, कहीं से ले आओ वह दिमाग़, जो खुशामद आदतन नहीं करता. कहीं से ले आओ निर्धनता जो अपने बदले में कुछ नहीं मांगती, और उसे एक बार आंख से आंख मिलाने दो.' उनके जीवन परिचय की बात करें तो लखनऊ में जन्मे रघुवीर सहाय ने लखनऊ यूनिवर्सिटी से 1951 में इंग्लिश लिटरेचर से एमए किया और वहीं से प्रकाशित अखबार 'नवजीवन' जॉइन करके 1949 में अपने पत्रकारिता के करियर की शुरुआत की. दो साल बाद वह दिल्ली आ गए.

इसके बाद वह 'प्रतीक' में सहायक संपादक, आकाशवाणी के समाचार विभाग में उपसंपादक और 'नवभारत टाइम्स' में स्पेशल कोरेसपोंडेंट के तौर पर जुड़े रहे. 1969 से 1982 के दौरान उन्होंने 'दिनमान' की बागडोर संभाली और वहां वह प्रधान संपादक रहे. मगर, 1982 से 1990 तक उन्होंने भरपूर स्वतंत्र लेखन किया. 29 दिसंबर 1990 को गुजरे रघुवीर सहाय की कुछ कविताएं आइए आज हम आपको पढ़ाएं...

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कविता का नाम- अधिनायक

राष्ट्रगीत में भला कौन वह
भारत-भाग्य-विधाता है
फटा सुथन्ना पहने जिसकागुन हरचरना गाता है

मखमल टमटम बल्लम तुरही
पगड़ी छत्र चँवर के साथ
तोप छुड़ा कर ढोल बजा कर
जय-जय कौन कराता है

पूरब-पश्चिम से आते हैं
नंगे-बूचे नरकंकाल
सिंहासन पर बैठा
उनके
तमगे कौन लगाता है
कौन कौन है वह जन-गण-मन
अधिनायक वह महाबली
डरा हुआ मन बेमन जिसका
बाजा रोज बजाता है

कविता का नाम- हा हा हा

हा हा हा
तुमने मार डाले लोग
हा हा हा

क्योंकि वे हँसे थे
तुमने मार डाले लोग
तुमने मार डाले लोग
हा हा हा

क्योंकि वे सुस्त पड़े थे
तुमने मार डाले लोग
तुमने मार डाले लोग
हा हा हा

क्योंकि उनमें जीने की आस नहीं रही थी
तुमने मार डाले लोग
तुमने मार डाले लोग
हा हा हा
तुमने मार डाले लोग

क्योंकि वे बहुत सारे लोग थे
इसी तरह के बहुत सारे लोग

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कविता का नाम- चांद की आदतें

चांद की कुछ आदतें हैं।
एक तो वह पूर्णिमा के दिन बड़ा-सा निकल आता है
बड़ा नकली (असल शायद वही हो)।
दूसरी यह, नीम की सूखी टहनियों से लटककर।
टंगा रहता है (अजब चिमगादड़ी आदत!)
तथा यह तीसरी भी बहुत उम्दा है
कि मस्जिद की मीनारों और गुम्बद की पिछाड़ी से
जरा मुड़िया उठाकर मुंह बिराता है हमें!
यह चांद! इसकी आदतें कब ठीक होंगी?

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First published: December 9, 2019, 12:24 PM IST
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