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वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर इस की आदत भी आदमी सी है, पढ़िए मशहूर शायर गुलजार की कविताएं

News18Hindi
Updated: April 1, 2020, 1:10 PM IST
वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर इस की आदत भी आदमी सी है, पढ़िए मशहूर शायर गुलजार की कविताएं
गुलजार की कविताएं

अजनबी सी होने लगी हैं आती जाती साँसें, आँसुओं में ठहरी हुई हैं, रूठी हुई सी यादें....

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वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर....


शाम से आंख में नमी सी है
आज फिर आप की कमी सी है

दफ़्न कर दो हमें के सांस मिले



नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है



वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
इस की आदत भी आदमी सी है

कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी
एक तस्लीम लाज़मी सी है
इसी ग़ज़ल के कुछ और अश'आर:

कौन पथरा गया है आंखों में
बर्फ़ पलकों पे क्यों जमी सी है

आइये रास्ते अलग कर लें
ये ज़रूरत भी बाहमी सी है

अजनबी सी होने लगी हैं आती जाती साँसें
आँसुओं में ठहरी हुई हैं, रूठी हुई सी यादें
आज क्यों रात यूँ थमी थमी सी हैं

पत्थरों के होठों पे हमने नाम तराशा अपना
जागी जागी आंखों में भर के सोया हुआ था सपना
आंख में नींद भी थमी थमी सी हैं

-गुलज़ार


स्पर्श:


कुरान हाथों में लेके नाबीना एक नमाज़ी
लबों पे रखता था
दोनों आंखों से चूमता था
झुकाके पेशानी यूं अक़ीदत से छू रहा था
जो आयतें पढ़ नहीं सका
उन के लम्स महसूस कर रहा हो
मैं हैरां-हैरां गुज़र गया था
मैं हैरां-हैरां ठहर गया हूँ
तुम्हारे हाथों को चूम कर
छू के अपनी आंखों से आज मैं ने
जो आयतें पढ़ नहीं सका
उन के लम्स महसूस कर लिये हैं

-गुलज़ार


चांद इस तरह बुझा, जैसे फूंक से दिया


मैं अगर छोड़ न देता, तो मुझे छोड़ दिया होता, उसने
इश्क़ में लाज़मी है, हिज्रो- विसाल मगर
इक अना भी तो है, चुभ जाती है पहलू बदलने में कभी
रात भर पीठ लगाकर भी तो सोया नहीं जाता
बीच आस्मां में था
बात करते- करते ही
चांद इस तरह बुझा
जैसे फूंक से दिया
देखो तुम…
इतनी लम्बी सांस मत लिया करो.

-गुलज़ार

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First published: March 31, 2020, 7:36 AM IST
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