TOH: अपनी फांसी के दिन हंस रहे थे वो 11 ठग, मंदिर जाते वक़्त नहीं करते थे ठगी

फांसी में देरी से एक छोटा मुसलमान ठग इतना परेशान हो गया कि खुद ही रस्सी की गांठ बांधने लगा और उसके बाद खुद ही फंदे पर झूल गया मानो तैरने के लिए किसी समंदर में छलांग लगाने जा रहा हो.

News18Hindi
Updated: November 9, 2018, 3:45 PM IST
TOH: अपनी फांसी के दिन हंस रहे थे वो 11 ठग, मंदिर जाते वक़्त नहीं करते थे ठगी
‘बेगम, ठग्स एंड व्हाइट मुग़ल्स’
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Updated: November 9, 2018, 3:45 PM IST
बॉलीवुड फ़िल्म ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ का उन ठगों से कोई संबंध नहीं जिन्होंने कभी हिंदुस्तान की सड़कों से लाखों लोगों को ग़ायब कर दिया था. ये ठग काली के भक्त थे और देवी को खुश करने के लिए हत्याएं करते थे.

फ़ेनी पार्क्स एक वैल्श लेखिका थी और 1850 में उन्होंने ‘वैंडरिंग्स ऑफ़ अ पिलग्रिम’ में अपनी भारत यात्रा को संजोया था. 1970 में ‘बेगम, ठग्स एंड व्हाइट मुग़ल्स’ के रूप में उनके संस्मरण छपे. इस किताब के ज़रिए पहली बार लोगों को पता चला कि अंग्रेज़ों ने कैसे ठगी प्रथा को ख़त्म किया था. हज़ारों ठगों पर मुक़दमे चलाकर उन्हें जलावतन किया गया या फांसी दे दी गई. फ़ेनी पार्क्स के जर्नल्स में ऐसे ही एक मुक़दमे का ज़िक्र यूं किया गया है...

16 अक्टूबर 1830.. ईस्ट इंडिया कंपनी के गजट में इस दिन 11 ठगों को सजा का जिक्र किया गया है. सजा का जिक्र कुछ यूं किया गया है...

सर, कल मैं 11 ठगों की सजा के वक्त मौजूद था.. जिन्हें भिलसा के नजदीक से पकड़ा गया था. इन पर 35 लोगों की हत्या का आरोप था. इन अभागों के शव भोपाल से सोगोर के रास्ते में कई जगहों से बरामद किए गए थे, जहां उनका गला घोंटकर मार डाला गया था और फिर उन्हें दबा दिया गया था. इन सभी ठगों को गवर्नर जनरल स्मिथ के आदेश से मौत की सजा दे दी गई.

जैसे ही सूर्य उगा, इन 11 लोगों को जेल से बाहर लाया गया, उन्हें मालाएं पहनाई गईं और उन्हें सजा के लिए मुअय्यन जगह तक लाया गया. जहां ये सभी खुद ब खुद पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़े हो गए.

फंदे के सामने एक साथ खड़े होने के बाद उन्होंने अपने हाथ आसमान की तरफ उठाए और जोर से नारा लगाया- विंध्याचल की जय, भवानी की जय. सभी ने एकसाथ इन शब्दों का उच्चारण किया, हालांकि इनमें से 4 मुसलमान थे, एक ब्राह्मण और बाकी राजपूत और हिंदुओं की दूसरी जाति के लोग थे. सभी फांसी के तख्ते पर चढ़े, पूरी अदा के साथ अपनी जगह पर खड़े हुए और दोनों हाथों में फंदा लेकर भवानी को याद किया. इसके बाद उन्होंने फंदों को गले में डाला और गर्दन में फंसाया. उनमें से कुछ तो वहां इकट्ठा भीड़ की मौजूदगी पर हँस रहे थे.

उनमें से एक सबसे छोटा मुसलमान ठग, देरी से इतना परेशान हो गया कि खुद ही रस्सी की गांठ बांधने लगा और उसके बाद खुद ही फंदे पर झूल गया मानो तैरने के लिए किसी समंदर में छलांग लगाने जा रहा हो. इस शख्स को पिछले साल दिसंबर में रीवां राजा के इलाके उमरपाटन में 6 यात्रियों को गला घोंटकर मारने के जुर्म में फांसी दी जानी थी. इसी ने भोपाल में 30 और यात्रियों की हत्या करने में ठगों की पार्टी में भागीदारी की थी. उसे हत्या की जगह पर भिलसा में लाया गया. उमरपाटन जबलपुर से 100 किलोमीटर पूर्व में है और वही जगह है जहां ठगों ने भोपाल इलाके में कई यात्रियों की हत्या की थी. इसके बाद दो सौ किलोमीटर दूर इन्होंने और यात्रियों को मार डाला था. इतनी तेजी के साथ इन ठगों ने कई जगहों पर सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने शिकारों को ठिकाने लगाया था.
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इन ठगों से मजिस्ट्रेट द्वारा जब पूछा गया कि क्या इनकी कोई आखिरी इच्छा है, तो उनका कहना था कि उनकी तमन्ना है कि एक यात्री की हत्या के बदले पांच ठगों को जेल से छोड़ दिया जाना चाहिए और वो कुछ पैसा दान में दे देंगे. मरने से ऐन पहले भवानी की जय उनका अपने अपराध की स्वीकारोक्ति का तरीका था. खास बात ये है कि ठगों के सिवा कोई भी फांसी पर चढ़ने से पहले भवानी को याद नहीं करता. और ठगों में भी चाहे जिसका जो धार्मिक विश्वास हो, भवानी के सिवा उनका कोई कारोबारी देवता नहीं. ठग भवानी को चार नामों से जानते हैं - देवी, काली, दुर्गा और भवानी और इस देवी का मंदिर विंध्याचल में मौजूद है, गंगा के किनारे मिर्जापुर से कुछ किलोमीटर दूर. इस मंदिर में हिंदुस्तान के कोने-कोने से ठग पहुंचते हैं और यहां अपनी लूट का एक हिस्सा चढ़ावे के बतौर चढ़ाते हैं, जो वो यात्रियों की  हत्या के बाद लूटते हैं.... ज्यादातर ये यात्राएं ठग बरसात के मौसम के बाद करते हैं और जब वो अपने घरों से मंदिर की यात्रा कर रहे होते हैं तो इस बीच वो किसी की हत्या या लूटपाट नहीं करते, चाहे जितना हालात उनके हक में क्यों न हों.

जब देवी की पूजा का काम खत्म हो जाता है तो इसके बाद अगले अभियान पर निकलने से पहले एक खास दिन गैंग के सभी सदस्य अपने नेता यानी जमादार के नेतृत्व में अपने गांव में इकट्ठे होते हैं. यहां वो अपनी कुदाली यानी कब्र खोदने के हथियार की पूजा करते हैं. उनका मानना है कि अगर वो अपनी इस कुदाली से किसी शिकार के लिए कब्र खोदेंगे तो कोई भी आत्मा उनके काम में अड़ंगा नही लगा सकती. इसलिए इस हथियार को वो बहुत ही पवित्र मानते हैं और उसकी अवज्ञा किसी बड़े से बड़े अपराध से कम नहीं मानी जाती. इसी कुदाली से एक बकरी की बलि दी जाती है और फिर उसे नारियल के साथ भवानी पर चढ़ाया जाता है. इसके बाद वो सिंदूर और चंदन का एक घोल बनाते हैं और उसे दूसरी कई पवित्र चीजों के साथ उबालते हैं. कुदाली को उबालने के बाद उसे सूखने के लिए खास ढंग से रखा जाता है. इससे पहले कुदाली को रखे जाने की जगह गोबर से लिपाई की जाती है और फिर कुछ खास प्रार्थनाएं और मंत्र पढ़े जाते हैं. इसके बाद कुदाली को एक सफेद कपड़े में बांधकर रख दिया जाता है. इसके बाद पुजारी के आदेश पर पूरा गैंग उस दिशा में निकलता है जिधर उन्हें जाना है. कुछ दूर रुककर रास्ते में फिर मंत्र पढ़े जाते हैं और शगुन निकाले जाते हैं. अगर सारे शगुन पक्ष में हों तो ठग अपने अभियान पर आगे निकल पड़ते हैं.

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