ये है ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ की असली कहानी, रुमाल से घोंट देते थे गला

अमीर अली 1785 में पैदा हुआ था. जब वह 5 साल का ही था तब उसे अपने माता-पिता के साथ एक यात्रा का मौका मिला. पढ़िए असली 'ठग ऑफ हिंदोस्तान' अमीर अली की कहानी...

News18Hindi
Updated: November 9, 2018, 4:09 PM IST
ये है ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ की असली कहानी, रुमाल से घोंट देते थे गला
‘कन्फ़ेशंस ऑफ़ अ ठग’ किताब का एक अंश
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Updated: November 9, 2018, 4:09 PM IST
‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ का उन ठगों से कोई रिश्ता नहीं, जिन्होंने 19वीं सदी की शुरुआत में ईस्ट इंडिया कंपनी की नाक में दम कर दिया था. डायरेक्टर विजय कृष्ण आचार्य यह बात पहले ही कह चुके हैं कि यह फ़िल्म फ़िलिप मैडोज़ टेलर की किताब ‘कन्फ़ेशंस ऑफ़ अ ठग’ पर आधारित नहीं है, जैसा पहले माना जा रहा था. फिर भी यह जानना दिलचस्प होगा कि ‘ठग्स ऑफ़ हिंदोस्तान’ असल में कितने क्रूर हत्यारे थे.

इन्हीं में एक था ठग अमीर अली. जिससे बातचीत के आधार पर एक अंग्रेज अधिकारी ने 1839 में किताब लिखी थी- 'कन्फेशन्स ऑफ ठग'. इसकी खबर जब इंग्लैंड की महारानी क्वीन विक्टोरिया को हुई तो वह इतनी उत्सुक हो गईं कि उन्होंने छपने से पहले ही फिलिप से उसकी पांडुलिपि पढ़ने के लिए मांग ली. इसी किताब का एक अंश...

नागपुर की हमारी बाकी यात्रा के दौरान कुछेक अकेले यात्रियों की हत्या के अलावा कुछ खास नहीं हुआ था, जो ठगों के एक गिरोह के हाथों मारे गए थे और जिसे हमारे ग्रुप ने साथ साथ दूसरे रास्ते भेजा था. इनके बारे में बताने के लिए साहब कुछ खास नहीं है. अब मैं आपको अपने नागपुर में ठहरने की घटना बताता हूं.

शहर के बाहर एक बड़ा तालाब है, जिसके सहारे हमारे गिरोह के लोग जाकर रुके. मेरे पिता और कुछ दूसरे लोग शहर में चले गए ताकि लूटे गए माल के बदले धन हासिल किया जा सके. यह कोई मुश्किल काम नहीं था क्योंकि ब्रिजलाल से लूटी गई संपत्ति आसानी से बेची जा सकती थी और हमें इस सामान के बहुत से खरीदार साहूकार आसानी से मिल भी गए.

एक साहूकार से बातचीत के दौरान मेरे पिता ने यूं ही जिक्र किया कि वह अपने गांव के कुछ आदमियों के साथ हैदराबाद जा रहे हैं, जिन्हें वह अपने भाई के यहां रोजगार दिला देंगे, जो इस वक्त मौजूद सिकंदर जाह की खिदमत में है. साहूकार ने अचानक हमारे साथ चलने का फैसला कर लिया और यात्रा के दौरान उसे सुरक्षा के बदले खासा पैसा देने का प्रस्ताव रखा. साहूकार का कहना था कि वह इस काम के लिए लोगों को तलाश रहा था और इससे बढ़िया क्या हो सकता था कि वह एक इज्जतदार शख्स के लश्कर के साथ यात्रा कर पाएगा.

वतन के खराब हालात को देखते हुए उस वक्त साहब गांव के इज्जतदार लोग सोचते थे कि अगर उन्हें किसी की खिदमत में सैनिक का काम मिल जाए तो इससे अच्छी कोई बात नहीं हो सकती थी. चाहे फिर हिंदुस्तान के दरबार में मिले या दकन, होल्कर, सिंधिया या पेशवाओं के यहां. हर राजकुमार के पास बड़ी तादाद में सैनिक हुआ करते थे, जिन्हें ठीक ठाक पैसा मिल जाता था. ऐसे में उनके यहां काम करना किसी और पेशे के मुकाबले ज्यादा अच्छा माना जाता था. मेरे पिता पूरे हथियारों के साथ घोड़े पर निकलते हुए एक सैनिक जैसे लगते भी थे...

इसलिए मेरे पिता ने साहूकार की बात मान ली और हैदराबाद तक साहूकार को सुरक्षा देने का वायदा कर लिया. चलने से पहले एक खुफिया बैठक में साहूकार ने मेरे पिता को बताया कि वह एक खजाने की खरीद के लिए हैदराबाद जा रहा है. उसे उम्मीद थी कि इससे खासा रुपया उसे हासिल हो जाएगा. और आपको यकीन नहीं होगा साहब कि इस बात का पता चलने पर हमारे कैंप में तो खुशियों का ठिकाना नही रहा.
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अपने आदमियों को सैनिकों जैसा दिखने के लिए मेरे पिता ने नागपुर से तलवारें,  बर्छियां और दूसरे हथियार खरीदकर बांट दिए. और जब वो सब इन्हें लेकर तैयार हुए तो पूरी तरह सैनिकों का दस्ता लग रहा था. जाहिर है कि यह अभियान अब तक का सबसे रोमांचक अभियान होने वाला था. अपने सभी साथियों को पहले ही साहूकार के साथ हुए करार के बारे में बता दिया गया था और साथ ही हिदायतें दे दी गई थीं कि वो सभी खुद को सैनिकों की तरह ही पेश करें....

पूरी तैयारियों के बाद हम पूरी शिद्दत से साहूकार के हमारे साथ चलने का इंतजार करने लगे. साहूकार हमारे कैंप में अपनी एक छोटी सी बैलगाड़ी और कुछ नौकरों के साथ पहुचा, जिसमें कुछ टट्टू भी थे. इनमें दो हकारों के साथ 10 सांड भी जुते थे. उसे मिलाकर कुल 8 लोग उसके साथ चल रहे थे.

हमने उमरावती (अमरावती) के लिए कूच के दौरान उसे बहुत कम देखा था. मेरे पिता और हुसैन कभी-कभी शाम को उसके टैंट में उसके साथ बैठा करते थे और मेरा भी उससे परिचय करा दिया गया था. वह एक लंबा-चौड़ा गठीले बदन का इंसान था और मैं सोचने लगा कि शायद पहली बार मेरे लिए इसका चुनाव ठीक नहीं था. इस बारे में मैंने अपने पिता को भी बताया और वह भी इस बात से सहमत थे.

"मैंने सोचा था कि तुम्हें भुटोटे (हत्यारा) के बतौर तैयार करना है. वह बहुत मोटा है और इसलिए कोई सख्त प्रतिरोध नहीं कर पाएगा. इसलिए वह तुम्हरे लिए आसान शिकार होगा." इसके बाद मैंने उसे अपने शिकार के बतौर देखना शुरू कर दिया.

मैं अपने साथी के साथ जाकर अपने काम को सीखने समझने के लिए ज्यादा मेहनत शुरू कर दी और कपड़े (रुमाल) को इस्तेमाल करने पर ध्यान देने लगा. इसी दौरान मेरे साथी ने एक दिन मेरे सामने एक अकेले यात्री को निपटाने का प्रस्ताव रखा, जो किसी तरह हमारे कैंप में चला आया था, लेकिन मैंने इससे इनकार किया. मुझे अपनी ताकत पर भरोसा था और यकीन था कि पहले ही मैं साहूकार को अपने लिए चुन चुका हूं और वही मेरा पहला शिकार होना चाहिए....

उमरावती से मंगलूर (मैंगलोर) तक तीन टुकड़ों में सफर होता है और वहां मेरे पिता ने तय किया कि "इस मामले का अंत हो जाना चाहिए." अगर मुझे सही सही याद है तो वहां कुछ छोटी पहाड़ियां थीं और ऊंचा-नीचा रास्ता था और इससे हमें अपने शिकार को आसानी से छिपाने का बढ़िया मौका था....

इस फैसले के बाद कुछ साथियों को इलाके का पता लगाने भेजा गया. हमारा पहला ठिकाना था गांव बॉम.... जब लौटकर साथियों ने इलाके का पूरा खाका खींचा तो मुझे लगा कि अब मेरे हुनर दिखाने का वक्त आ पहुंचा है. और कुछ ही घंटों बाद मैं अपने साथियों के बराबर हुनरमंद हो जाने वाला था और यह मेरा हक भी था.

शायद इसे मेरी कमजोरी कहिए साहब कि अब जितना मुमकिन हो, मैं साहूकार से मिलने और उसे देखने से कतराने लगा था. कभी-कभी हमारा आमना-सामना हो भी जाता था और तब मुझे लगता था कि काश! मैं अपने गांव में ही होता. मगर अब देर हो चुकी थी. अब मुझे अपने लिए एक रास्ता चुनना था और मुझे प्यार करने वाले अपने पिता की नजर में अपनी जगह हासिल करनी थी. अगर मैं ऐसा नहीं करता और सौंपे गए काम से पीठ दिखाता तो यह मेरी कायरता होती और इसके बाद उनकी नजर में मेरी इज्जत कभी नहीं लौट सकती थी....

हम मंगलूर पहुंचे. यह एक बड़ा शहर था और यहां बहुत से मुसलमान रहते थे. हमने मीर हयात कलंदर की दरगाह पर उर्स में हिस्सा लिया.... नमाज के बाद जब हम वापस अपने ठिकाने पर पहुंचे तो देखा साहूकार का आदमी हमारा इंतजार कर रहा था, जिसने हमें बताया कि साहूकार आज शहर में अपने दोस्त के घर ठहरेगा और हमारे कैंप में नहीं आएगा....

इस बीच हमने अपनी तैयारियां शुरू कर दी थीं. कब्र खोदने के लिए तकरीबन 14 साथियों को आगे भेज दिया गया. इनमें वो लोग भी शामिल थे जिन्हें इलाके की खासी जानकारी थी.... अब तक साथियों को इस बात की जानकारी हो चुकी थी कि मैंने अपने पहले शिकार के रूप में साहूकार को चुना है. अब हर साथी मुझे बधाई दे रहा था और इससे मेरा खुद में यकीन दोबाला हो गया था.... मेरे पिता भी मुझे बहुत लाड़ से देखते थे और मुझे महसूस होने लगा था कि मुझे उन्हें नाउम्मीद नहीं करना है....

मैं अपने तंबू के बाहर बैठा था कि तभी रूप सिंह मेरे पास आया. मेरे पास बैठने के बाद वह बोला -

बाबा, तुम्हें कैसा लग रहा है? क्या तुम्हारा मन पक्का और खून ठंडा है?

मैंने कहा - दोनों, कुछ भी मेरे अटल मन को नहीं हिला सकता. और लो मेरे हाथ को देखो, क्या मेरा खून गर्म लग रहा है?

रूप सिंह बोला - नहीं, ऐसा नहीं है और ऐसा होना भी नहीं चाहिए. मैंने बहुतों को अपने पहले शिकार के लिए तैयार होते देखा है लेकिन कोई भी इतना खामोश नहीं दिखाई दिया जितना तुम दिख रहे हो. मगर यह सब इसलिए है क्योंकि तुम पर मंत्र पढ़े गए हैं और कई कर्मकांड किए गए हैं.

मैंने कहा- हो सकता है, लेकिन मुझे लगता है कि मैं उनके बगैर भी इस मौके पर वैसा ही होता, जैसा अभी हूं.

उसने जवाब दिया- मां भवानी तुम्हें माफ करे, मेरे बच्चे. अभी तुम उन मंत्रों की ताकत नहीं जानते. तुमसे ज्यादा घमंड तो मुझे था. पैदाइश से राजपूत और शुद्ध जाति वाला शख्स...

जल्द ही हम इकट्ठे हुए और हमारे गुरु हमें एक खाली मैदान में लेकर गए. वहां वह एक जगह रुके और उस तरफ को मुंह करके खड़े हो गए जिधर हमें जाना था. उन्होंने अपने हाथ ऊपर उठाए और जोर से बोले- ओ काली, महाकाली! अगर यात्री हमारे साथ है, तो उसे हमारे नए साथी के हाथों मारा जाना चाहिए. हमारी मनोकामना पूरी करें. हम सभी खामोश खड़े थे तभी हमारी दायीं तरफ एक गधा रेंका. हमारा गुरु बेहद खुश हो गया. उसने खुशी से चिल्लाते हुए कहा- क्या कभी इतनी जल्दी काली को आशीर्वाद देते देखा है तुमने. पूजा के तुरंत बाद शुभ संकेत? मेरे पिता बोले - शुक्र अल्लाह. अब यह अपना काम पूरा करेगा और उसमें फतह हासिल करेगा. बस तुम्हें गांठ बांधनी बाकी है.

गुरु ने कहा - वह मैं लौटते हुए कर दूंगा. जब हम कैंप में पहुंचे तो उसने मेरा रुमाल लिया और उसमें लगी गांठ खोलकर फिर से बांधी और उसमें चांदी का एक टुकड़ा रख दिया. इसके बाद रुमाल मुझे देते हुए वह बोला - इस पवित्र हथियार को अपने पास रखो. इसमें अपना यकीन रखना और मां काली के नाम पर मैं इसे तुम्हें सौंपता हूं. मैं उसे अपने दायें हाथ में ले लिया और धीरे से उसे अपनी कमर पर बांध लिया. जल्दी ही मुझे उसकी जरूरत पड़नी थी....

मैं अपने ख्यालों से बाहर आया जब मुझे अपने पिता की आवाज सुनाई पड़ी. वह बोले - होशियारी (सावधान). यह तैयारी का संकेत था. वह बैलगाड़ी की तरफ गए और नदी के पास साहूकार की तरफ जाकर खड़े हो गए. साहूकार अपने दोस्त के पास से लौट रहा था और अपनी गाड़ियों और सामान को सुरक्षित देख वह आगे चलने की तैयारी करने लगा.

अब सारा माजरा मेरे सामने था. बैलगाड़ियां और उनके महावत ठगों के साथ नदी के किनारे चलने की तैयारी में थे. साहूकार के आदमी अपने जानवरों पर चिल्ला रहे थे. हर आदमी पर एक ठग मौजूद था. हमारे कदमों से कुछ दूर नदी काफी संकरी बह रही थी. इसके बाद हम सबके साथ मेरे पिता, हुसैन, मैं और साहूकार और उसके कुछ नौकर और कई ठग मौजूद थे.

मैं बेहद उत्सुकता से इशारे का इंतजार कर रहा था और मैंने अपने हाथों में कसकर रुमाल बांध रखा था. मेरा शिकार मुझसे चंद फुट की दूरी पर मौजूद था. मैं उसके पीछे गया और फिर दूसरे ठगों को उसके नौकरों के पीछे खड़े होने का इशारा किया. साहूकार सड़क की तरफ एक-दो कदम बढ़ा. मैं भी उसके पीछे-पीछे बढ़ गया. मैं उसके हर कदम पर नजर रखे था. तभी मेरे पिता चिल्लाए - जय काली. यह इशारा था और मैंने इसका पूरी तरह पालन किया.

एक पल में मेरा रुमाल साहूकार के गले पर था. मुझे अहसास हुआ मानो मुझमें कोई दैवीय ताकत आ गई थी. मैंने उसकी गर्दन को अच्छी तरह घोंटना शुरू कर दिया. वह कुछ देर के लिए लड़ा और उसके बाद गिर गया. मैंने अपनी पकड़ ढीली नहीं की और मैं भी उसके साथ नीचे झुक गया और तब तक रुमाल को खींचता रहा जब तक कि मेरे हाथ में दर्द नहीं होने लगा. मगर उसने हिलना-डुलना बंद कर दिया था. वह मर चुका था! इसके बाद मैं उस पर पकड़ ढीली कर खड़ा हो गया. मैं उत्तेजना से पागल हो रहा था. मेरा खून खौल रहा था और मुझे लग रहा था कि अभी मैं इसी तरह सैकड़ों को मौत के घाट उतार सकता हूं. कितना आसान था यह? मेरे हाथ की एक जुंबिश ने मुझे अपने बाकी साथियों के साथ खड़ा कर दिया था. उनके साथ जिन्हें आने वाले सालों में मेरा अनुकरण करना था.

मुझे अपने ख्यालों से मेरे पिता ने बाहर निकाला. उन्होंने प्यार से कहा कि तुमने बहुत अच्छा काम किया है. जल्द ही तुम्हें इसका इनाम भी मिलेगा. अब मेरे साथ चलो. हम कब्रों पर जाएंगे, जहां इन लाशों को ठिकाने लगाना है. और मुझे खुद देखना है कि कब्रें तैयार हैं कि नही.... इसके बाद हम नदी की धारा में नीचे उतरे और कुछ साथियों के साथ कब्रों तक पहुंचे. पीछे-पीछे साहूकार की लाश लिए लोग आ रहे थे....

कौन था अमीर अली

अमीर अली 1785 में पैदा हुआ था. जब वह 5 साल का ही था तब उसे अपने माता-पिता के साथ एक यात्रा का मौका मिला. तब आधुनिक सड़कें नहीं थीं. यात्री लंबे मार्गों पर बैलगाड़ी से और पैदल चला करते थे. रास्ते में कुछ ठगों के गिरोह ने अमीर के माता-पिता की हत्या कर दी और उन्हें लूट लिया. न जाने क्यों बच्चे को ठगों ने छोड़ दिया था. ठगों के सरदार इस्माइल ने अमीर को अपना लिया और उसे अपने साथ ले गया. इस्माइल अमीर को बहुत ज्यादा अहमियत देता और प्यार करता था. धीरे-धीरे अमीर अपने माता-पिता के बारे में भूल गया. अब इस्माइल और उसकी पत्नी ही उसके मां-बाप थे. जब वह सिर्फ 9 साल का था तभी बुखार की वजह से उसकी नई मां की मौत हो गई. अब जो कुछ था, अली का नया पिता इस्माइल ही था. अली को पढ़ाने-लिखाने के लिए इस्माइल ने एक शिक्षक रख दिया. जिसका काम था उसे लिखने-पढ़ने के साथ साथ फारसी में बातचीत करना सिखाना. धीरे-धीरे वह वक्त आ पहुंचा था, जिसके लिए इस्माइल बरसों से सोच रहा था. अमीर अली की किस्मत को अभी कई बार पलटा खाना था. इस्माइल उसे अपना उत्तराधिकारी बनाने के बारे में सोच रहा था. अब अमीर 17 साल का किशोर बन चुका था और उसे पहली बार अपना हुनर दिखाया था.

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