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कभी 'लिक्विड गोल्ड' कहा जाने वाला जैतून का तेल शुगर करे कंट्रोल, पढ़ें, भारत में कैसे पहुंचा ऑलिव ऑयल

दुनियाभर में जैतून ही एक ऐसा तेल है, जो बीज की बजाय फल से निकाला जाता है.

दुनियाभर में जैतून ही एक ऐसा तेल है, जो बीज की बजाय फल से निकाला जाता है.

जैतून का तेल ऐसा तेल है, जो दिल की बीमारियों से बचाने में तो बेहद कारगर है ही, शुगर को भी कंट्रोल करने में मुख्य भूमिका निभाता है. जैतून के तेल को कभी तरल सोना कहा जाता था. जानते हैं इस तेल से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण और रोचक बातें.

हाइलाइट्स

जैतून के पेड़ की पृथ्वी पर उत्पत्ति करीब 6000 साल पूर्व हुई.
जैतून के तेल में कैलोरी 126 और वसा 14 प्रतिशत होती है.
यूनेस्को ने इसके वृक्ष को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल किया है.

दुनिया में ऐसा कौन सा खाद्य तेल है, जिसे सबसे अधिक पौष्टिक तो माना ही जाता है, साथ ही जिसका आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर बेहद सम्मान है. इसमें एक ही नाम उभरता है, वह है जैतून का तेल (Olive Oil). यह ऐसा तेल है जो दिल की बीमारियों से बचाने में तो बेहद कारगर है ही, शुगर को भी कंट्रोल करने में मुख्य भूमिका निभाता है. दिमाग को भी सेहतमंद बनाए रखता है. जैतून के तेल को कभी तरल सोना (Liquid Gold) कहा जाता था. विशेष बात यह है कि भारत में 21वीं सदी में इसके पेड़ उगाए जा रहे हैं, इससे पहले तक यह आयात किया जाता था.

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यूनानी कवि होमर ने इसे Liquid Gold बताया

दुनियाभर में जैतून ही एक ऐसा तेल है, जो बीज की बजाय फल से निकाला जाता है. हजारों सालों पूर्व जब इसे जाना गया, तब इसका उपयोग घर में उजाला करने वाले तेल और धार्मिक समारोह में ही किया जाता था. प्राचीन समय में जैतून को शांति, धन व प्रसिद्धि का प्रतीक माना गया. कहा जाता है कि उस दौर में जैतून के तेल ने कला, व्यापार और अर्थव्यवस्था में एक विशेष भूमिका निभाई. इसकी इसी विशेषता के चलते यूनानी कवि व विचारक होमर (1000 ईसा पूर्व) ने अपने महाकाव्य इलियड (ILIAD) में इसे तरल सोना (Liquid Gold) बताया. उस समय ग्रीस सभ्यता में कब्रों और सिक्कों पर अमरता के प्रतीक के रूप में जैतून की टहनी उकेरी जाती थी. इससे बेशकीमती इत्र भी बनाया गया. इसकी इन्हीं विशेषताओं और संरक्षण के लिए यूनेस्को ने इसके वृक्ष को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (Intangible Cultural Heritage) में शामिल किया है. साथ ही इसके सम्मान में हर वर्ष 26 नवंबर का दिन ‘विश्व जैतून का पेड़ दिवस’ (World Olive Tree Day) घोषित किया गया है.

यूनेस्को ने इसके वृक्ष को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में शामिल किया है.

6000 वर्ष पूर्व भूमध्य सागर क्षेत्र में हुई उत्पत्ति

इतिहास से जुड़े संदर्भ बताते हैं कि जैतून के पेड़ की पृथ्वी पर उत्पत्ति करीब 6000 साल पूर्व हुई. अमेरिकी स्थित ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी के वनस्पति विज्ञान व प्लांट पैथोलॉजी विभाग की प्रोफेसर सुषमा नैथानी ने अपनी रिसर्च रिपोर्ट में जैतून का उत्पत्ति केंद्र भूमध्य सागर के आसपास का क्षेत्र घोषित किया है. अगर और डिटेल की बात करें तो इसका वृक्ष ग्रीस के क्रीत (Crete) द्वीप में सबसे पहले उगा. सैंकड़ों सालों तक इसके तेल का उपयोग घरों के प्रकाश व धार्मिक अनुष्ठानों के बाद खाने के तेल के रूप में प्रयोग में आने लगा. धीरे-धीरे जैतून का तेल भूमध्यसागरीय क्षेत्र की प्राचीन सभ्यताओं फीनिशियन, ग्रीक और रोमन में प्रसिद्ध हुआ और बहुत की धीमी गति से विश्व में अपना स्थान बनाता गया, लेकिन जहां भी गया, जैतून और इसके तेल को भरपूर सम्मान मिला. मध्य युग में स्पेन और फ्रांस आदि देशों में खाने के अलावा इसका प्रयोग साबुन, मलहम, दवा बनाने के लिए भी किया गया. अमेरिका में यह 16वीं शताब्दी में पहुंचा.

भारत में हाल ही में शुरू हुई इसका उत्पादन

आपको बताते चलें कि भारत में जैतून के तेल का उपयोग सालों से हो रहा है, लेकिन तब इसे इंपेार्ट किया जाता था और इसका डिब्बा सौंदर्य प्रसाधन की ही दुकानों पर मिलता था यानी इसका उपयोग कॉस्मेटिक रूप में हो रहा था, लेकिन कुछ सालों से अब इसका उपयोग खाने के लिए भी हो रहा है. उसका कारण यह है कि 21वीं सदी में ही भारत में इसके पेड़ उगाए गए और फिर इसके फलों से तेल तैयार किया जाने लगा. भारत में जैतून का उत्पादन राजस्थान के थार क्षेत्र में साल 2007 शुरू किया गया. इसके पौधे इजराइल से आयात किए गए, क्योंकि वहां और थार क्षेत्र का मौसम एक जैसा था. इसके तेल का उत्पादन सितंबर 2013 में शुरू हुआ और राज ऑयल नामक पहला भारतीय निर्मित जैतून का तेल ब्रांड 9 नवंबर 2016 को लॉन्च किया गया. अब इसे कई क्षेत्रों में उगाया और तेल बनाया जा रहा है. अब भारत में यह खाद्य तेल के रूप में यूज हो रहा है, लेकिन सीमित स्तर पर, क्योंकि अभी भी भारतीय तेलों की तुलना में इसके दाम बहुत अधिक हैं. पैसे वाले जैतून के तेल को प्राथमिकता देते हैं.

भारत में जैतून का उत्पादन राजस्थान के थार क्षेत्र में साल 2007 शुरू किया गया.

दिल-दिमाग को रखता है तंदुरुस्त

आधुनिक विज्ञान के अनुसार, एक चम्मच जैतून के तेल में कैलोरी 126, वसा 14 प्रतिशत होती है ओर इसमें फैट, कार्बोहइड्रेट, शुगर आदि न के बराबर होता है. यह एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर है. इसमें पॉलीफेनॉल (Polyphenols) की बड़ी मात्रा होती है, जो रसायनों का जटिल समूह है. इस वजह से यह तेल कोलेस्ट्रॉल और बीपी को कंट्रोल करता है, दिल की चाल को सामान्य बनाए रखता है और दिमाग को बल देता है. इसका एक प्रमुख प्राकृतिक लाभ यह है कि यह अधिक वजन और मोटापे के खिलाफ काम करता है, जिससे शुगर का खतरा कम हो जाता है. वैज्ञानिक दावा करते हैं कि जो लोग जैतून के तेल से बने आहार का सेवन करते हैं, उनमें कुछ प्रकार के कैंसर का खतरा कम होता है, जिसमें छोटी आंत, पेट के साथ-साथ ऊपरी पाचन तंत्र का कैंसर भी शामिल है. मछली के साथ इसका सेवन बेहद लाभकारी माना जाता है.

यह तेल कोलेस्ट्रॉल और बीपी को कंट्रोल करता है.

आयुर्वेद ने गठिया व जोड़ों के दर्द के लिए माना बेहतर

आयुर्वेद भी जैतून के तेल को शरीर के लिए गुणकारी मानता है. जाने-माने आयुर्वेद डॉक्टर आरपी पराशर के अनुसार, जैतून का तेल स्वाद में कसैला तो होता है, लेकिन यह वात और पित्त का शमन करता है. पाचन सिस्टम को सुधारता है, शरीर में बल पैदा करता है, भूख बढ़ाता है और लिवर से जुड़ी समस्याओं में गुणकारी है. इसे आंखों के लिए लाभकारी माना जाता है. विशेष बात यह है कि इसका तेल जोड़ों के दर्द व गठिया रोग में भी लाभकारी है. इसका सेवन घावों में पस नहीं पड़ने देता. यह खून को भी पतला बनाए रखता है. इसके तेल में 70 प्रतिशत तक मोनोअनसैचुरेटेड फैटी एसिड होता है, जो खून में बैड कोलेस्ट्रॉल के संचय को कम करने में मदद करता है, जिससे हृदय स्वस्थ रहता है.

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ज्यादा सेवन करने से हो सकता है मोटापा

आयुर्वेद डॉक्टर आरपी पराशर ने स्पष्ट किया कि भोजन में जैतून का तेल जोड़ने का अर्थ यह नहीं है कि आप स्वस्थ आहार खा रहे हैं. इससे अगर स्वास्थ्य लाभ पाना है तो साथ में खाने के तरीके में भी बदलाव करना होगा. इसके तेल में बहुत अधिक कैलोरी पाई जाती है. अगर इसका ज्यादा सेवन किया तो मोटापे की समस्या पैदा हो सकती है. भूमध्य सागरीय क्षेत्र में अधिकतर लोग इसलिए मोटापे के शिकार होते हैं, क्योंकि वह फिश, मटन, रेड मीट, सलाद आदि में इसका अधिक सेवन करते हैं. इसका अधिक सेवन सिरदर्द पैदा कर सकता है. इसके फल का अचार कब्ज पैदा कर सकता है. अधिक खाने से यह नींद में भी खलल पैदा कर सकता है. जैतून के तेल का नियमित लेकिन संतुलित मात्रा में सेवन किया जाए तो शरीर के लिए यह बेहद गुणकारी है.

Tags: Food, Lifestyle

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