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मैं कबीर सिंह की तरफ क्यों देखूँ? मेरा वास्ता तो प्रीति से है!

मैं कबीर सिंह की तरफ क्यों देखूँ? मेरा वास्ता तो प्रीति से है!

preeti sikka

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फ़िल्म में एक डायलॉग है, “अपने हिस्से का दर्द सबको झेलना पड़ता है उसमें ख़लल मत डालो.” कोई ये क्यों नहीं बताता अपने हिस्से की खुशी, अपने हिस्से का प्यार सबको लेना पड़ता है उसे भी मत छीनो. ये जितने लोग ललाहोट हुए जा रहे हैं कबीर और उसके इश्क़ पर, वो दरअसल अपने नाकाम इश्क़, अपनी दबी हुई ख्वाहिशों की झलक देख रहे हैं उसमें.

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    अब जब कबीर पर बात हो ही रही है. तो सिनेमाघर तक पहुंचने से पहले मैं जान चुकी थी, वो एक नशेड़ी, बदतमीज़, प्रेमिका को प्रॉपर्टी समझने वाला शख्स है. उसे नहीं समझ आते क़ायदे, क़ानून, वो जो कर ले वही सही है. तो अब जब बात हो ही रही है तो बात कर ही ली जाए. मैं सब सुनकर गई और सबकुछ देखने के बाद नहीं हुई मुझे नफरत कबीर से. मुझे थोड़ी और खीज हो गई समाज पर, अपनी परवरिश पर, अपने पिता पर, थोड़ा और गुस्सा आ गया अपनी माँ पर.

    क्या प्रीति को चूम लेना कबीर की गलती है?

    फ़िल्म में कबीर की प्रेमिका है प्रीति. कबीर उसका प्रेमी है या नहीं, ये मायने ही नहीं रखता. क्योंकि प्रीति को ये सिखाया ही नहीं गया. पहली मुलाक़ात में कबीर प्रीति के गाल पर किस करता है और प्रीति चुपचाप चली जाती है, न गुस्सा, न दुख, न कोई प्रतिरोध. इसमें ग़लती कबीर की नहीं, ग़लती प्रीति की परवरिश की है. उसे सिखाया ही नहीं गया कि मर्द को न कैसे करना है, कितनी ताक़त लगती है एक आदम को धक्का देने में, कैसे चीख सकते हैं जब कुछ बुरा लगे. उसे बताया गया पापा घर में आ जाएं तो तुम्हें कमरे में चले जाना है. भाई टीवी देख रहा हो तो रिमोट नहीं छीनना. वो तुमसे 8 साल छोटा है मगर बर्ताव बाप जैसे करेगा. उम्र छोटी है मगर भाई का रिश्ता बड़ा है. 24 साल की प्रीति से उसका 16 साल का भाई बदतमीज़ी कर लेता है. उसे इतना अधिकार होता है कि वो किसी पर भी हाथ उठा ले क्योंकि उसने उसकी बहन से प्रेम करने की जुर्रत की.

    एक सीन में प्रीति की माँ कहती हैं, “इसके पापा को आने दो, हमारे यहाँ सारे फैसले साथ बैठकर होते हैं.” और जब पापा आते हैं तो वो अकेले अपनी मर्ज़ी से कबीर को घर से धक्के मार कर निकाल देते हैं, तब प्रीति की मर्ज़ी मायने नहीं रखती कि वो बात करना चाहती है. उससे ग़लती हुई मगर वो तब भी बैठकर बात करना चाहती है. दरअसल ये प्रीति की माँ भी जानती हैं कि फैसले सबकी मर्ज़ी से नहीं, बल्कि सबकी मर्ज़ी वो होती है जो पापा का फैसला होता है.

    kabir singh

    हमारे यहाँ लड़कियों को ग्रेजुएट भी इसलिए कराया जाता है कि बच्चों को अच्छे से पाल सकोगी, घर गृहस्थी बढ़िया चला सकोगी. एक औरत पढ़ी मतलब एक परिवार पढ़ा. अगर नौकरी करी तो पति का हाथ बंट जाएगा थोड़ा, लेकिन उससे ज़्यादा मेहनत करके लौटने के बाद खाना तुम्हें ही बनाना है. पैदा होने के साथ घुट्टी दी जाती है कि पराए घर जाना है, कभी मज़ाक़ में, कभी प्यार में, कभी गुस्से में ज़ाहिर किया जाता रहा है कि हम तुम्हारी परमानेंट कस्टडी नहीं लेने वाले. तुम्हें किसी और को हैंडओवर करना है. फ़िर अपने पति के साथ जाना गोआ, मसूरी, शिमला हिमाचल.

    मुझमें तो इतनी कमियां हैं, तुम्हें मुझमें क्या भा गया कबीर?

    लेकिन दिक्कत तब होती है जब लड़की अपनी मर्ज़ी के गार्जियन के पास जाना चाहती है. प्रीति ने कबीर को क़ुबूल कर लिया तो क्या नया कर लिया, जो हमेशा से समझाया गया उसे स्वीकार कर लिया. उसके लिए काफी था कि वो उसकी कस्टडी में जीन्स और जैकेट पहन सकती थी. खुल कर हँस सकती थी, ज़िद करने का नाटक कर सकती थी, चार बार थप्पड़ खाकर एक थप्पड़ का जवाब दे सकती थी. प्रीति को बहुत बुरे और कम बुरे में से चुनना था, सो उसने चुन लिया कबीर.

    वो लड़की जिसे बचपन से परफेक्ट होने की ताकीद दी गई, चुन्नी ऐसे डालो, ऐसे मत हँसो, इतनी रात को मत निकलो, भाई से मत लड़ो. उसका पहला सवाल यही होता है, मुझमें तो इतनी कमियां हैं, तुम्हें मुझमें क्या भा गया कबीर? और वो उतने में ही आनंदित हो जाती है क्योंकि उसे उतना भी नहीं मिला होता.

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    क्या सिर्फ कबीर से सवाल करना जायज़ है?

    कितने दोगले हैं हम, कबीर से नफरत किये आधे हुए जा रहे हैं मगर प्रीति के बाप से सवाल नहीं कर पा रहे, अपनी मर्ज़ी से शादी करना चाहती है तो तुम किसी से भी शादी करके सज़ा दोगे उसे. हम क्लाइमेक्स तक उम्मीद करते हैं प्रीति को कबीर ढूंढेगा, मगर उसके पिता से नहीं पूछते तुमने क्यों थूक दिया उसे. सिर्फ इसलिए कि उसने कहा अब तक चली तुम्हारे मुताबिक़, अब बस एक चीज़ करनी है मुझे अपनी मर्ज़ी से. क्यों नहीं प्रीती गई कबीर के पास और एक थप्पड़ मारकर पूछा, प्यार के इतने दावे थे तो हो कैसे इस हीरोइन के साथ? क्यों प्यार की निशानी के नाम पर अकेले झेलती रही वो नौ महीने. अगर कबीर नहीं आता तो बच्चे को क्या बताती मर्द ज़ात और प्यार के बारे में?

    क्यों नहीं प्रीति अपने पापा पर गुस्सा दिखा सकी, जब वो कबीर के घर पहुंच गई. उसने क्यों नहीं पूछा, कि आज मुझे मेरे दूसरे कस्टोडियन ने छीन कर ही दम लिया और तुम्हारी ज़िम्मेदारी कम की तो आ गए मेरे प्यार को समझने के दावे करते हुए. क्यों नहीं प्रीति कबीर से सवाल कर सकी कि आज अपने लिए मुझे मेरे पापा से लड़ने को बोल रहे हो, ‘बी अ वुमन’ का नारा दे रहे हो तब कहाँ गई थी मेरे अंदर की वुमन जब मुझसे पूछे बिना पूरे कॉलेज में मुझे अपनी जायदाद घोषित कर दिया था. जब ज़बरदस्ती करने के बाद भी तुमने नहीं पूछा मुझे कैसा लगा वो चुम्बन, जो पहले प्यार का पहला चुम्बन था शायद.

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    सवाल उस लड़की से भी होना चाहिए कि क्यों नहीं कबीर के हाथ से चाकू छीनकर उसकी गर्दन पर रख देना था. क्यों नहीं उस नौकरानी को इतनी अक़्ल आई कि ज़्यादा कुछ न सही तो धक्का देकर बैठ जाए कबीर के सीने पर और पूछे, बोल कौन ताक़तवर? क्यों नहीं प्रीति की मम्मी ने कहा कि मत करो शादी, क्यों नहीं वो एक औरत होकर दूसरी औरत की तकलीफ समझ सकी. हम औरत के सशक्तिकरण की मांग भी मर्द से करते हैं, हमारे अच्छे दिनों की उम्मीद भी हमें मर्द से है. हम औरतों को समझाना ही नहीं चाहते कि जीवन में अपने लिए तुम्हें सब ख़ुद करना होगा, मर्द साथ दे सकता है, नेतृत्व नहीं कर सकता.

    ज़माना भरा पड़ा है कबीरों से!

    मैं पहले भी कह चुकी हूं, फ़िर कह रही हूँ फिल्में समाज का आईना नहीं होती बल्कि फिल्में समाज का अक्स हैं. वो आपके लिजलिजेपन को आपके सामने परोस देती हैं तो थोड़े असहज हो जाते हैं आप. ज़माना भरा पड़ा है कबीरों से. एक कबीर से नफरत करने के लिए ज़िन्दगी के हर मर्द से नफरत करनी पड़ेगी. सबमें थोड़ा-थोड़ा बंटा हुआ है वो. हमें सारी कमियां एक ही पैकेज में मिल गई तो थोड़ा ओवराडोज़ हो गया. कितने कबीर मेरी अपनी ज़िंदगी में हैं. आप पूछ रहे हैं कबीर को घमंड किस बात का है, इतना गुस्सा किस बात का है. अरे वो टॉपर है, दस बच्चों से बेहतर है. उसे घमंड है कि उसके माँ-बाप को उसकी तुलना नहीं करनी पड़ती. उसकी टीचर ने हमेशा कहा शरारती है, बट ही इज़ वेरी गुड इन एकेडेमिक्स, स्कूल की ट्रॉफियां यही लाएगा. उसकी पढ़ाई के पीछे उसकी हर ज़िद छुपा दी गई. तबसे जब उसे खुद समझ नहीं थी.

    मेरा अपना कज़िन, मेरा सगा कज़िन है कबीर, एकेडेमिक्स में अच्छा है और हम पर हाथ भी उठाया है, उम्र में मैं बड़ी हूँ उससे, बचपन में मेरा सिर फोड़ दिया तो मेरी अपनी बुआ ने कहा, “इसे दूसरे स्कूल में डाल दो, मेरा लड़का थोड़ा शैतान है और ये उसके साथ खेलेगी ज़रूर.” एक बार उसने मेरी छोटी बहन को मारा, हम फूफा जी से शिकायत करने गए तो उन्होंने साफ कहा, “मरखन्ने बैल से दूर रहो बेटा, वो है ही ऐसा.” फूफा ने उसको कुछ नहीं कहा क्योंकि वो उनके दम्भ को खुराक दे रहा था. मेरा बेटा, टॉपर बेटा, होशियार बेटा, मेरी परवरिश… उसे इतना एडवांटेज तो मिल ही सकता है. इस थोड़े-थोड़े एडवांटेज से ही कबीर बनते हैं, जो वहशी लगते हैं मगर हमारा ही बायप्रोडक्ट होते हैं. कबीर हीरो नहीं है, कबीर हमारी खीज की एक मिसाल भर है. जैसा समाज है वैसा कबीर है.

    मेरा अपना छोटा भाई, जिसे गोदी में पालकर बड़ा किया, खाना छोड़कर जिसकी पॉटी साफ की, वो ऊँची आवाज़ में बात करने से पहले दो बार नहीं सोचता. हालांकि मम्मी पापा डांटते हैं मगर समाज ने समझा दिया है उसे, मर्द हो और ये हक़ है.

    अपने हिस्से के दर्द पर सबका हक़, फिर प्यार पर वो हक़ क्यों नहीं?

    फ़िल्म में एक डायलॉग है, “अपने हिस्से का दर्द सबको झेलना पड़ता है उसमें ख़लल मत डालो.” कोई ये क्यों नहीं बताता अपने हिस्से की खुशी, अपने हिस्से का प्यार सबको लेना पड़ता है उसे भी मत छीनो. ये जितने लोग ललाहोट हुए जा रहे हैं कबीर और उसके इश्क़ पर, वो दरअसल अपने नाकाम इश्क़, अपनी दबी हुई ख्वाहिशों की झलक देख रहे हैं उसमें. कितने लोग जो उस हॉल में बैठे पिक्चर देख रहे थे, कितनों की शादी किसी और से करवा दी जाएगी क्योंकि घरवाले नहीं मानेंगे.

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    जब कबीर कहता है शादी हो गई तो क्या? वो मेरी बंदी है. हाँ उसके बच्चे हो जाएंगे तो क्या, प्यार थोड़ी ख़त्म होगा, वो बंदी मेरी ही रहेगी न. कितनी कहानियाँ हमने पढ़ी हैं जब प्रेमी अपने पार्टनर्स की मौत के बाद बुढ़ापे में शादी करते हैं, तब वो हमें बड़ा रोमैंटिक लगता है. कबीर ने वही बात जवानी में कह दी तो हमें उलझन हो गई, क्योंकि हमें सिखाया गया है, प्रेम त्याग है, समर्पण है, दूसरों की खुशी है, ये है वो है सब है मगर वो नहीं, जो तुम अपने लिए करो. प्यार कितनी बार ख़त्म हो सका है? क्या कस्टडी का सौदा करने से सोच का और जज़्बातों का भी कॉन्ट्रैक्ट हो जाता है?

    वन टाइम वॉच है फिल्म

    फ़िल्म का म्यूजिक अच्छा है मगर फ़िल्म में सही से इस्तेमाल नहीं किया गया है. बैकग्राउंड म्यूजिक काफी कसा हुआ और दमदार है, सीन को गति देने वाला. बाक़ी खुशनसीब हैं वो लोग जिनकी ज़िन्दगी में शिवा जैसा दोस्त है. ये शिवा भी आसमान से नहीं टपकते, होते हैं ऐसे लोग. मेरा भी है ऐसा एक दोस्त. सुरेश ओबेरॉय और कामिनी कौशल को इतने दिन बाद देखना अच्छा लगा. बाक़ी कियारा की अगली फिल्म का इंतज़ार है जिसमें उनके डायलॉग हों. फ़िल्म वन टाइम वॉच है.

    अंत में बस इतना ही, इतना आतंकी होकर भी कबीर, प्रीति को हासिल नहीं कर पाता. वो सब कुछ क़ाबू कर लेता है मगर समाज के सरपंच बने बैठे उसके पापा से हार जाता है. समाज इतना मज़बूत है कि आशिक़ों को अलग करने के लिए हज़ार दलीलें हैं मगर प्यार बने रहने देने के लिए एक भी नहीं. चाहने वालो को कबीर यूँ ही पसंद आया क्योंकि उसने वो कर दिखाया जो हम कर नहीं सकते.

    Tags: Film review, Kabir Singh Movie, Kiara Advani, Shahid kapoor

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