'शायद मरना ही आसान है' - डॉक्टर को लिखे वो ख़त सुसाइड नोट्स थे?

LoveSexaurDhokha: पुलित्ज़र सम्मान से सम्मानित कवयित्री सिल्विया प्लैथ की एक और चिट्ठी, जिसमें उसने अपने पति नामचीन कवि टेड ह्यूज़ की बेवफाई को पूरी घिन, गुस्से, और उस कश्मकश के साथ बयान किया जो खुदकुशी से पहले होती है.

Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: February 8, 2019, 7:47 PM IST
Bhavesh Saxena | News18Hindi
Updated: February 8, 2019, 7:47 PM IST
साल 1963 में 30 साल की उम्र में खुदकुशी से कुछ पहले ही सिल्विया ने एक अमेरिकी डॉक्टर को चिट्ठियां लिखी थीं जिनमें उसने अपने पति टेड की बेवफाई के किस्से और अपनी तकलीफ बयान की थी. टेड के संबंध लंदन में आसिया के साथ थे और डेवॉन में टेड के बच्चों की मां के तौर पर रह रही सिल्विया को जब ये पता चला तो 1962 में उसने टेड से अलग होने का फैसला लिया था. तभी से वह डिप्रेशन की शिकार थी.

सिल्विया की पहली चिट्ठी यहां पढ़ें

इन चिट्ठियों के सामने आने के बाद टेड पर सिल्विया को आत्महत्या के लिए उकसाने के इल्ज़ाम लगे. ये चिट्ठियां सिल्विया के शब्दों में टेड की बेवफाई के दस्तावेज़ हैं. सिल्विया के ख़तों पर आधारित इस अंतिम कड़ी में सिल्विया की तीसरी चिट्ठी. इस चिट्ठी में खुदकुशी के खयालों की तरफ तेज़ी से बढ़ने के सिल्विया के इशारे बहुत साफ दिखाई और सुनाई देते हैं.



सिल्विया की दूसरी चिट्ठी यहां पढ़ें

चिट्ठी-3 : शनिवार, 29 सितंबर 1962
"डॉक्टर रूथ ब्यूशर,

मुझे लगता है कि मैं मर रही हूं. मैं बहुत बेचैन मायूसी में हूं. टेड ने मुझे उजाड़कर रख दिया है. वो दो हफ्तों से मुझे नहीं दिखा, लंदन में कहीं ऐसे रह रहा है जैसे लापता हो गया हो.
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सिल्विया प्लैथ.


आज की रात, मुझे लग रहा है जैसे मेरी तनहाई मुझे पागल कर देगी. ये तेज़ बारिशें और हवाएं जैसे सैकड़ों खिड़कियों को भड़भड़ा रही हैं. मैं घर की कैदी होने जैसे एहसास के साथ अपने स्टडी रूम की तरफ जाती हूं और उसकी लिखा सब कुछ पढ़ने लगती हूं. उसकी किताबें, चिट्ठियां और प्यार की उन कविताओं का पुलिंदा भी देख रही हूं, जो उसने उस औरत के लिए लिखी हैं, जिसके साथ उसका रिश्ता और और गहरा होता जा रहा है.

कई कविताएं बहुत खूब हैं. वाकई प्यार के जोशीले जज़्बात से लबरेज़ - और इधर मैं मर रही हूं.

मेरे सामने रह रहकर उस कमीनी वेश्या का चेहरा आ रहा है. वो बहुत हसीन है और मैं? बेहद बदसूरत हूं. मेरे बाल जंजाल हैं, मेरी नाक बहुत बड़ी है और मेरा दिमाग जैसे बदल चुका है... भगवान जाने मैं इतने बदसूरत अंगों को कैसे एक साथ रखूं.

मैं पागल हो चुकी हूं. अगर मेरे साथ कोई होता, तो मैं उसके सामने रोती नहीं, खुद से ही बातें करती रहती, चीखती और घंटों घूरती रहती. लेकिन मेरे पास कोई नहीं है, कोई दोस्त कोई अपना नहीं.


यही झटका मेरे दिल को चीरता जा रहा है. मैं अब भी टेड को चाहती हूं, उसी पुराने टेड को और मैं अपने पूरे होशो-हवास में जब यह महसूस करती हूं कि उसके लिए मैं बदसूरत और नफरत के काबिल हूं तो मैं इस एहसास में मरने लगती हूं.

मैंने उससे एक बार पूछा था कि क्या वो तलाक चाहता है तो उसने कहा नहीं, बस अलग होना चाहता है. वो शायद मुझे अगले 50 सालों तक न देखना चाहे लेकिन हफ्ते में एक बार कोई कविता या कुछ लिखना ज़रूर चाहेगा. मैं डूब रही हूं और मुझे सांस भी नहीं आ रही.

ये खयाल भी मुझे मारे देता है कि मैंने उसके साथ जो अंतरंगता चाही, वो अब नामुमकिन हो चुकी है. यानी, मेरे खयाल थे कि उसके साथ जीना कितना रोमांचक होगा, रोज़ कुछ नया, कोई नया विचार, नया काम या हमारी आपसी घनिष्ठता.

और अब? वो तो ज़िंदा है, आज़ादी से बाहर घूम रहा है और सबके साथ मस्ती में है. लेकिन मैं? यहां इस घर में दो दुधमुंहों के साथ फंस गई हूं और मेरे साथ कोई नहीं है. मैं कुछ भी सीधा नहीं सोच पा रही हूं. मैं कैसे अपने बच्चों से कहूंगी कि उनके बाप ने उन्हें छोड़ दिया था? शायद मरना ही सबसे आसान है.


मैंने जैसे चाहा था, वैसी ज़िंदगी चुनी थी - एक घर हो, सब कुछ सुंदर और खुशनुमा हो. साथ ही, एक बौद्धिक उत्तेजना बनी रहे और मैं गाहे-ब-गाहे कुछ लिखती रहूं. लेकिन अब महसूस करती हूं कि टेड हमसे नफरत करता है. वो हमें खत्म कर देना चाहता है ताकि उस औरत पर सारी दौलत लुटाने के लिए आज़ाद हो सके.

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सिल्विया प्लैथ के पत्रों की किताब का चित्र.


मैं खुद को किसी जाल में फंस चुका पाती हूं. मेरी नज़र जैसे एक उसी विकराल नज़ारे की वजह से वहीं रुक सी, अटक सी गई है कि उन दोनों के जिस्म पूरी गर्मी के साथ आपस में गुंथ गए हैं. वो उसके लिए महान अमर कविताएं लिख रहा है. और हमारे सारे लोग मेरे नहीं, उसी के साथ हैं, उसी के जश्न में हैं.

हे भगवान! मैं कहां से और कैसे नयी शुरूआत करूं? मैं इस भावना से रूबरू हो ही नहीं सकती कि वो चाहता है कि मैं उसे तलाक दूं ताकि वो उससे शादी कर सके. और मैं कैसे इस वेदना से निपटूं कि हर दिन हज़ारों छोटी छोटी बातें अंदर तक भेद जाती हैं, हर छोटी छोटी याद, हर वो लमहा जो हमने साथ गुज़ारा था. कैसे वो मुझे तब प्यार करता था - तब, जब बहुत देर नहीं हुई थी!

पुन:श्च : आभारी हूं कि आपने तलाक की सलाह मुझे दी. आपकी ये चिट्ठी आज सुबह ही आई और टेड भी उसी वक्त आया. शायद आखिरी बार आया. शायद अब यही ठीक और सटीक होगा. तलाक एक तेज़धार चाकू की तरह है और मैं एक पके हुए फल की तरह चाकू के लिए तैयार हूं."

(पीटर के स्टीनबर्ग और कैरन वी क्यूकिल द्वारा संपादित 'द लैटर्स ऑफ सिल्विया प्लैथ वॉल्यूम दो: 1953-63' शीर्षक वाली किताब में ये चिट्ठियां प्रकाशित हुई थीं. गौरतलब है कि टेड ह्यूज़ अंग्रेज़ी के सम्मानित और बेस्टसेलर कवि व राइटर रहे हैं और सिल्विया प्लैथ खुद भी चर्चित और सम्मानित कवयित्री रहीं.)

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