Home /News /lifestyle /

इब्नबतूता पहन के जूता, पढ़ें सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविताएं

इब्नबतूता पहन के जूता, पढ़ें सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविताएं

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविताएं

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविताएं

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविताएं (Sarveshwar Dayal Saxena Poem): भेड़िए की आंखें सुर्ख हैं, उसे तब तक घूरो, जब तक तुम्हारी आंखें सुर्ख न हो जाएं...

    सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविताएं (Sarveshwar Dayal Saxena Poem) :सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (Sarveshwar Dayal Saxena) का नाम तीसरे सप्तक के उन अहम कवियों की सूची में शुमार में जिन्होंने बेहद सहज और साधारण ढंग से पेचीदा बातों को भी कविता की लड़ियों में पिरोया. उन्होंने प्रकृति की नैसर्गिक खूबसूरती को भी अपनी कलम के जरिए बेहद नजाकत के साथ कागज़ पर उकेरा. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने कई ऐसे नाटक और कविताएं लिखीं जो लोगों द्वारा काफी पसंद की गई. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता श्रंखला 'खूंटियों पर टंगे लोग' को साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया. इसके साथ ही उनके व्यंगात्मक नाटक 'बकरी' को भी काफी सम्मान मिला और उसपर कई प्ले भी हुए .सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने सरल शब्दों में बेहद गहरी बात और कटाक्ष किए हैं. उनकी प्रसिद्ध रचनाएं हैं- काठ की घंटियां, बांस का पुल, गर्म हवाएं, एक सूनी नाव, कुआनो नदी, आज हम आपके लिए कविता कोश के सभार से लाए हैं सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की चुनी हुई कुछ बेहतरीन कविताएं...

    शब्दों का ठेला...

    मेरे पिता ने
    मुझे एक नोटबुक दी
    जिसके पचास पेज
    मैं भर चुका हूँ.

    जितना लिखा था मैंने
    उससे अधिक काटा है
    कुछ पृष्ठ आधे कोरे छूट गये हैं
    कुछ पर थोड़ी स्याही गिरी है
    हाशिये पर कहीं
    सूरतें बन गईं हैं
    आदमी और जानवरों की एक साथ
    कहीं धब्बे हैं गन्दे हाथों के
    कहीं किसी एक शब्द पर
    इतनी बार स्याही फिरी है
    कि वह सलीब जैसा हो गया है.
    इस तरह

    मैं पचास पेज भर चुका हूँ.
    इसमें मेरा कसूर नहीं है

    मैंने हमेशा कोशिश की

    कि हाथ काँपे नहीं

    इबारत साफ सुथरी हो

    कुछ लिखकर काटना न पड़े

    लेकिन अशक्त बीमार क्षणों में

    सफेद पृष्ठ काला दीखने लगा है

    और शब्द सतरों से लुढ़क गये

    कुछ देर के लिए जैसे

    यात्रा रुक गयी.
    अभी आगे पृष्ठ खाली हैं

    निचाट मैदान

    या काले जंगल की तरह.

    बरफ गिर रही है.

    मुझे सतरों पर से उसे हटा हटाकर

    शब्दों का यह ठेला खींचना है

    जिसमें वह सब है

    जिसे मैं तुममे से हर एक को

    देना चाहता हूँ

    पर तुम्हारी बस्ती तक पहुँचू तो.
    मजबूत है सीवन इस नोटबुक की

    पसीने या आँसुओं से

    कुछ नहीं बिगड़ा!

    यदि शब्दों की तरह कभी

    यह हाथ भी लुढ़क गया

    तो इस वीराने में

    तुम इसके जिल्द की

    टिमटिमाती रोशनी टटोलते

    ठेले तक आना

    और यह नोट बुक ले जाना

    जिसे मेरे बाप ने मुझे दी थी

    और जिसके पचास पेज

    मैं भर चुका हूँ.
    लेकिन प्रार्थना है

    अपने झबरे जंगली कुत्ते मत लाना

    जो वह सूँघेगे

    जो उन्हें सिखाया गया हो,

    वह नहीं

    जो है.

    बतूता का जूता...

    जब सब बोलते थे
    वह चुप रहता था
    जब सब चलते थे
    वह पीछे हो जाता था
    जब सब खाने पर टूटते थे
    वह अलग बैठा टूँगता रहता था
    जब सब निढाल हो सो जाते थे
    वह शून्य में टकटकी लगाए रहता था
    लेकिन जब गोली चली
    तब सबसे पहले
    वही मारा गया

    इब्नबतूता पहन के जूता
    निकल पड़े तूफान में
    थोड़ी हवा नाक में घुस गई
    घुस गई थोड़ी कान में

    कभी नाक को, कभी कान को
    मलते इब्नबतूता
    इसी बीच में निकल पड़ा
    उनके पैरों का जूता

    उड़ते उड़ते जूता उनका
    जा पहुँचा जापान में
    इब्नबतूता खड़े रह गये
    मोची की दुकान में

    पोस्टमार्टम की रिपोर्ट...
    गोली खाकर
    एक के मुँह से निकला -
    'राम'.

    दूसरे के मुँह से निकला-
    'माओ'.

    लेकिन तीसरे के मुंह से निकला-
    'आलू'.
    पोस्टमार्टम की रिपोर्ट है
    कि पहले दो के पेट
    भरे हुए थे.

    व्यंग्य मत बोलो...

    व्यंग्य मत बोलो.
    काटता है जूता तो क्या हुआ
    पैर में न सही
    सिर पर रख डोलो.
    व्यंग्य मत बोलो.

    अंधों का साथ हो जाये तो
    खुद भी आँखें बंद कर लो
    जैसे सब टटोलते हैं
    राह तुम भी टटोलो.
    व्यंग्य मत बोलो.

    क्या रखा है कुरेदने में
    हर एक का चक्रव्यूह कुरेदने में
    सत्य के लिए
    निरस्त्र टूटा पहिया ले
    लड़ने से बेहतर है
    जैसी है दुनिया
    उसके साथ होलो
    व्यंग्य मत बोलो.

    भीतर कौन देखता है
    बाहर रहो चिकने
    यह मत भूलो
    यह बाज़ार है
    सभी आए हैं बिकने
    राम राम कहो
    और माखन मिश्री घोलो.
    व्यंग्य मत बोलो.

    भेड़िए की आंखें सुर्ख हैं...

    भेड़िए की आंखें सुर्ख हैं.

    उसे तबतक घूरो

    जब तक तुम्हारी आंखें

    सुर्ख न हो जाएं.

    और तुम कर भी क्या सकते हो

    जब वह तुम्हारे सामने हो?

    सब कुछ कह लेने के बाद ...

    सब कुछ कह लेने के बाद
    कुछ ऐसा है जो रह जाता है,
    तुम उसको मत वाणी देना.

    वह छाया है मेरे पावन विश्वासों की,
    वह पूँजी है मेरे गूँगे अभ्यासों की,
    वह सारी रचना का क्रम है,
    वह जीवन का संचित श्रम है,
    बस उतना ही मैं हूँ,
    बस उतना ही मेरा आश्रय है,
    तुम उसको मत वाणी देना.

    वह पीड़ा है जो हमको, तुमको, सबको अपनाती है,
    सच्चाई है-अनजानों का भी हाथ पकड़ चलना सिखलाती है,
    वह यति है-हर गति को नया जन्म देती है,
    आस्था है-रेती में भी नौका खेती है,
    वह टूटे मन का सामर्थ है,
    वह भटकी आत्मा का अर्थ है,
    तुम उसको मत वाणी देना.

    वह मुझसे या मेरे युग से भी ऊपर है,
    वह भावी मानव की थाती है, भू पर है,
    बर्बरता में भी देवत्व की कड़ी है वह,
    इसीलिए ध्वंस और नाश से बड़ी है वह,

    अन्तराल है वह-नया सूर्य उगा लेती है,
    नये लोक, नयी सृष्टि, नये स्वप्न देती है,
    वह मेरी कृति है
    पर मैं उसकी अनुकृति हूँ,
    तुम उसको मत वाणी देना.

    अक्सर एक व्यथा....

    अक्सर एक गन्ध
    मेरे पास से गुज़र जाती है,
    अक्सर एक नदी
    मेरे सामने भर जाती है,
    अक्सर एक नाव
    आकर तट से टकराती है,
    अक्सर एक लीक
    दूर पार से बुलाती है .
    मैं जहाँ होता हूँ
    वहीं पर बैठ जाता हूँ,
    अक्सर एक प्रतिमा
    धूल में बन जाती है .

    अक्सर चाँद जेब में
    पड़ा हुआ मिलता है,
    सूरज को गिलहरी
    पेड़ पर बैठी खाती है,
    अक्सर दुनिया
    मटर का दाना हो जाती है,
    एक हथेली पर
    पूरी बस जाती है .
    मैं जहाँ होता हूँ
    वहाँ से उठ जाता हूँ,
    अक्सर रात चींटी-सी
    रेंगती हुई आती है .

    अक्सर एक हँसी
    ठंडी हवा-सी चलती है,
    अक्सर एक दृष्टि
    कनटोप-सा लगाती है,
    अक्सर एक बात
    पर्वत-सी खड़ी होती है,
    अक्सर एक ख़ामोशी
    मुझे कपड़े पहनाती है .
    मैं जहाँ होता हूँ
    वहाँ से चल पड़ता हूँ,
    अक्सर एक व्यथा
    यात्रा बन जाती है .

    तुम्हारे साथ रहकर...

    तुम्हारे साथ रहकर
    अक्सर मुझे ऐसा महसूस हुआ है
    कि दिशाएं पास आ गयी हैं,
    हर रास्ता छोटा हो गया है,
    दुनिया सिमटकर
    एक आंगन-सी बन गयी है
    जो खचाखच भरा है,
    कहीं भी एकान्त नहीं
    न बाहर, न भीतर.

    हर चीज़ का आकार घट गया है,
    पेड़ इतने छोटे हो गये हैं
    कि मैं उनके शीश पर हाथ रख
    आशीष दे सकता हूँ,
    आकाश छाती से टकराता है,
    मैं जब चाहूँ बादलों में मुँह छिपा सकता हूँ.

    तुम्हारे साथ रहकर
    अक्सर मुझे महसूस हुआ है
    कि हर बात का एक मतलब होता है,
    यहाँ तक कि घास के हिलने का भी,
    हवा का खिड़की से आने का,
    और धूप का दीवार पर
    चढ़कर चले जाने का.

    तुम्हारे साथ रहकर
    अक्सर मुझे लगा है
    कि हम असमर्थताओं से नहीं
    सम्भावनाओं से घिरे हैं,
    हर दिवार में द्वार बन सकता है
    और हर द्वार से पूरा का पूरा
    पहाड़ गुज़र सकता है.

    शक्ति अगर सीमित है
    तो हर चीज़ अशक्त भी है,
    भुजाएँ अगर छोटी हैं,
    तो सागर भी सिमटा हुआ है,
    सामर्थ्य केवल इच्छा का दूसरा नाम है,
    जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है
    वह नियति की नहीं मेरी है.



    रिश्ते की खोज ...

    मैंने तुम्हारे दुख से अपने को जोड़ा
    और -
    और अकेला हो गया .
    मैंने तुम्हारे सुख से
    अपने को जोड़ा
    और -
    और छोटा हो गया .
    मैंने सुख-दुख से परे
    अपने को तुम से जोड़ा
    और -
    और अर्थहीन हो गया .
    प्‍यार:एक छाता...

    विपदाएं आते ही,
    खुलकर तन जाता है
    हटते ही
    चुपचाप सिमट ढीला होता है;
    वर्षा से बचकर
    कोने में कहीं टिका दो,
    प्‍यार एक छाता है
    आश्रय देता है गीला होता है.

    लीक पर वे चलें ...

    लीक पर वे चलें जिनके
    चरण दुर्बल और हारे हैं,
    हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
    ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं.

    साक्षी हों राह रोके खड़े
    पीले बाँस के झुरमुट,
    कि उनमें गा रही है जो हवा
    उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं.

    शेष जो भी हैं-
    वक्ष खोले डोलती अमराइयाँ;
    गर्व से आकाश थामे खड़े
    ताड़ के ये पेड़,
    हिलती क्षितिज की झालरें;
    झूमती हर डाल पर बैठी
    फलों से मारती
    खिलखिलाती शोख़ अल्हड़ हवा;
    गायक-मण्डली-से थिरकते आते गगन में मेघ,
    वाद्य-यन्त्रों-से पड़े टीले,
    नदी बनने की प्रतीक्षा में, कहीं नीचे
    शुष्क नाले में नाचता एक अँजुरी जल;
    सभी, बन रहा है कहीं जो विश्वास
    जो संकल्प हममें
    बस उसी के ही सहारें हैं.

    लीक पर वें चलें जिनके
    चरण दुर्बल और हारे हैं,
    हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
    ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं .

    Tags: Book, Lifestyle

    विज्ञापन

    राशिभविष्य

    मेष

    वृषभ

    मिथुन

    कर्क

    सिंह

    कन्या

    तुला

    वृश्चिक

    धनु

    मकर

    कुंभ

    मीन

    प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
    और भी पढ़ें
    विज्ञापन

    टॉप स्टोरीज

    अधिक पढ़ें

    अगली ख़बर