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गंगा को योगी नहीं साध्वी की नज़र से देखो

News18Hindi
Updated: February 10, 2020, 4:15 PM IST
गंगा को योगी नहीं साध्वी की नज़र से देखो
गंगा को योगी नही साध्वी की नज़र से देखो

ज़रूरी सवाल तो ये है कि किसी महिला का उसकी जानकारी के बगैर गर्भ जांच क्या कानून के खिलाफ नहीं है? उसके चरित्र पर सवाल खड़े करना क्या नारी उत्पीड़न और शोषण नहीं है ?

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  • Last Updated: February 10, 2020, 4:15 PM IST
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कुछ रीत जगत की ऐसी है, हर एक सुबह की शाम हुई,
तू कौन है, तेरा नाम है क्या, सीता भी यहां बदनाम हुई.

अमर प्रेम फिल्म के गीत ये बोल आपके सामने उस हकीकत को बयान करता है जो भारत ही नहीं दुनियाभर की औरत को लेकर हमारी सोच को बयान करता है.

आपमें से अगर किसी ने भी रामानंद सागर की रामायण देखी होगी तो आपको वो अंतिम दृश्य याद होगा जिसमें सीता आजिज आकर धरती में समाहित हो जाती है. दरअसल वो सीता का विरोध था, जो समाज से कहता है कि तुम मेरे लायक ही नहीं हो. ये बात इसलिए भी क्योंकि पर्यावरण के लिए लड़ रही सशक्त नारी की आवाज़ को दबाने के लिए सरकारी महकमें ने एक बार फिर वहीं पैंतरा अपनाया जो समाज निर्माण से अपनाया जा रहा है. औरत के चरित्र पर पर सवाल खड़ा करना, चरित्र को शरीर से जोड़ना. और इस तरह चाल चरित्र की बात करने वाली सरकारों और प्रशासन ने अपनी चाल और चरित्र की नुमाइश की.

हम बात कर रहे हैं मातृ सदन में पिछले 45 दिनों से हड़ताल पर बैठी पद्मावती की, जिसे पहले जबर्दस्ती मातृसदन से उठा कर देहरादून के अस्पताल में भर्ती किया जाता है फिर उस पर वो इल्जाम लगाया जाता है जिसे सुनकर पद्मावती के होश उड़ गए. दून मेडिकल कॉलेज के चिकित्सक विजय सिंह भंडारी का कहना था कि तुम दो महीने की गर्भवती हो. इस बात को सुनकर उन्हें अपने कानों पर विश्वास ही नहीं हुआ कि ये उनसे क्या कहा जा रहा है. बात को आगे बढ़ाते हुए दून मेडिकल कॉलेज की सीएमओ डॉ जोशी का कहना कि तुम तो खुद को ब्रह्मचारिणी और साध्वी कहती हो और तुम्हारा चरित्र ऐसा है, और तुम त्रिवेन्द्र सिंह रावत और कुश्म चौहान (उप जिल मजिस्ट्रेट, हरिद्वार) पर अपने अपहरण और हत्या का आरोप किस आधार पर लगा रही हो. सबसे पहला सवाल तो यही कि जिस साध्वी की जांच रोजाना हो रही है उसे अचानक दो महीने का गर्भ कैसे हो सकता है. हालांकि बाद में चिकित्सक की बात गलत साबित हुई और जांच में उनका कथन झूठ निकला.

गंगा को बचाने और उसकी धारा को अविरल रखने के लिए कई सालों से संघर्ष कर रहा मातृसदन आज जहां गंगा पर्यावरण के लिए कुछ करने वालों के लिए प्रेरणा स्थल बन गया है
गंगा को बचाने और उसकी धारा को अविरल रखने के लिए कई सालों से संघर्ष कर रहा मातृसदन आज जहां गंगा पर्यावरण के लिए कुछ करने वालों के लिए प्रेरणा स्थल बन गया है
यहां पहला और ज़रूरी सवाल तो ये है कि किसी महिला का उसकी जानकारी के बगैर गर्भ जांच क्या कानून के खिलाफ नहीं है? एक महिला पर इस तरह का आरोप लगाना और उसके चरित्र पर सवाल खड़े करना क्या नारी उत्पीड़न और शोषण नहीं है ?

दरअसल ये सब कुछ बस आत्मविश्वास डिगाने भर का एक खेल था. हम सब जानते हैं कि किसी भी व्यक्ति के सामने अगर आप आत्मविश्वास के साथ कोई झूठ भी बोलो तो व्यक्ति एक पल के लिए तो घबरा जाता है. पद्मावती के साथ भी यही करने की कोशिश की गई थी, क्योंकि अगर पद्मावती का ज़रा सा भी आत्मविश्वास डगमगाता तो पूरा महकमा मातृ सदन को नेस्तानाबूद करने की नींव रख देता. लेकिन जब उनका आत्मविश्वास नहीं डगमगाया तो किसी किसी का तो डगमगाना था, इस बार बारी प्रशासन की थी. उनकी जांच के परिणाम को पहले से ही निर्धारित करने वाली पक्ष के डॉ भंडारी ने ये बात बोलने वक्त इस बात पर गौर ही नहीं किया कि बीते 45 दिनों में कितनी बार साध्वी का यूरिन टेस्ट किया जा चुका है. और जब उन्हें इस बात का इल्म हुआ कि वो क्या गलती करने जा रहे हैं तो तुरंत जांच में सब नॉर्मल आ गया.

मातृसदन क्या है?
गंगा को बचाने और उसकी धारा को अविरल रखने के लिए कई सालों से संघर्ष कर रहा मातृसदन आज जहां गंगा पर्यावरण के लिए कुछ करने वालों के लिए प्रेरणा स्थल बन गया है, वहीं इसी वजह से शासन-प्रशासन के लिए सरदर्द भी बना हुआ है. इससे पहले भी मातृ सदन (हरिद्वार) के गंगा तपस्वी श्री निगमानंद की अस्पताल में मौत आज तक राज बनी हुई है, वहीं पर्यावरण इंजीनियर स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद( प्रो जी.डी.अग्रवाल) की मौत भी तब हुई जब उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया. इसके बाद ब्रह्मचारी आत्मबोधानंद के साथ भी ऐसा ही कुछ करने की कोशिश हुई लेकिन वो इस साज़िश से बच निकले. इसी कड़ी में अगली नंबर साध्वी पद्मावती का था. जो पिछले डेढ़ महीनों से अनशन पर बैठी हुई है. उन्हें उनके तप से डिगाने के कई प्रयास किए जा चुके हैं लेकिन जब किसी तरह से कोई बात नहीं बनी तो फिर औरत पर इस्तेमाल किए जाने वाला सबसे सस्ता हथकंडा अपनाया गया. लेकिन अस्पताल प्रशासन को यहां पर भी मुंह की खानी पड़ी. दरअसल मातृसदन, गंगा में अवैध खनन पर रोक, गंगा अविरलता, पर्यावरणीय प्रवाह की सुनिश्चितता, कुछ क्षेत्र विशेष को पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील घोषित करना, गंगा सरंक्षण और प्रबंधन कानून, और कानून का पालन सही से हो इसके लिए गंगा भक्त परिषद का गठन, हिमालय और वन सुरक्षा जैसे मांगे उठाता रहा है.

दरअसल प्रशासन समझ ही नहीं पा रहा है कि मातृ सदन का क्या किया जाए. इससे पहले जब स्वामी सानंद ने अपने प्राणों की आहुति दी तो सत्ता ने सोचा कि अब शायद कुछ नहीं होगा लेकिन फिर एक संत ने उस खाली जगह को भर दिया. गंगा के लिए संघर्ष कर रहा मातृ सदन सिर्फ दो हथियारों के साथ ताकतवर होती जा रही और गंगा को अर्थव्यवस्था समझ रही सत्ता के साथ लड़ रहा है. उनका पहला हथियार है सत्याग्रह. अभी तक मातृ सदन 61 सत्याग्रह कर चुका है. और दूसरा उनका हथियार है सत्याग्रह या व्रत करने में अड़चन पैदा करने पर एफआईआर औऱ मुकदमा दर्ज करवाना.

प्रशासन समझ ही नहीं पा रहा है कि मातृ सदन का क्या किया जाए.
प्रशासन समझ ही नहीं पा रहा है कि मातृ सदन का क्या किया जाए.


इधर यूपी के योगी गंगा यात्रा पर निकले. अभी यात्रा की शुरूआत ही हुई थी कि योगी ने घोषित कर दिया की गंगा पूरी तरह साफ हो चुकी है. ये कुछ उसी तरह से था जैसे आप किसी शोध के लिए पत्र तैयार करते हैं और कहते हैं कि मैं फलाने विषय पर शोध करना चाहता हूं जिसका परिणाम ये होगा. खास बात ये रही कि योगी की यात्रा से लेकर उनके परिणामों तक हर बात को बिंदुवार, देशभर के तमाम मीडिया ने अच्छे से बेचा. इस तरह गंगा की यात्रा भी संपन्न हुई, गंगा साफ भी हो गई, मीडिया ने बता भी दिया और लोगों ने मान भी लिया. किसी भी हिंदी फिल्म की तरह इस यात्रा का भी एक सुखद अंत हुआ. इस यात्रा रूपी फिल्म की खास बात ये रही कि पूरी कोशिश की गई की पद्मावती जैसे चरित्रों का उल्लेख गलती से भी कहीं ना होने पाए.

वैसे भी जब साध्वी ने गंगा के लिए व्रत करने की ठानी तो सत्ता पक्ष के ज़हन में इस बात के अलावा कुछ आया ही नहीं होगा कि औरत है तो चरित्र की बात कर ली जाए. दरअसल सत्ता हो, जनता हो या समाज हो, बात औरत की आती है तो हमारी सोच इससे ऊपर बढ़ ही नहीं पाती है.

सीता का धरती में समाना उसी सोच को दर्शाता है. वो बताता है कि औरत हो या प्रकृति हमारा रवैया उपभोग का, उत्पाद का ही रहेगा. लेकिन विश्वास कीजिए जिस दिन सीता धरती में समाती है उसके बाद हमारे पास पछताने के अलावा कुछ नहीं रह जाता है. कभी पहाड़ों पर जाकर दर्रों के बीच से बहती हुई नदियों को देखिएगा. जिन पहाड़ों के बीच नदी बह रही है वो पहाड़ कभी उसके अंदर थे. पहाड़ों पर उसकी रवानी की रगड़ साफ नज़र आ जाएगी. लेकिन हमारी सोच, हमारे दोहन ने उसे गहरे में पहुंचा दिया. और इसी तरह एक दिन ये नदियां भी धरती में समा जाएंगी और फिर हमारे पास कुछ नहीं बचेगा. इसलिए हमें योगी की नज़र से नहीं साध्वी की नजर से गंगा को देखना होगा. और रही बात चरित्र की तो ध्यान रखिए नदी जब अपना चरित्र दिखाती है तो हमारे सामने पुराने सारी गलतियों के चित्र उभर जाते हैं.

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First published: February 10, 2020, 1:37 PM IST
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