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'सेफ गोवा' के लिए ट्रैफिक पुलिस का मददगार एक स्कूल


Updated: November 26, 2019, 3:41 PM IST
'सेफ गोवा' के लिए ट्रैफिक पुलिस का मददगार एक स्कूल
एक ऐसा स्कूल है, जो राज्य की इस चुनौती से निपटने के लिए यातायात पुलिस का हाथ बंटा रहा है. यह है राजधानी पणजी से करीब 30 किलोमीटर दूर सत्तारी तहसील के अंतर्गत होंडा गांव का शासकीय उच्चतर माध्यमिक स्कूल.

एक ऐसा स्कूल है, जो राज्य की इस चुनौती से निपटने के लिए यातायात पुलिस का हाथ बंटा रहा है. यह है राजधानी पणजी से करीब 30 किलोमीटर दूर सत्तारी तहसील के अंतर्गत होंडा गांव का शासकीय उच्चतर माध्यमिक स्कूल.

  • Last Updated: November 26, 2019, 3:41 PM IST
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शिरीष खरे

देश के केंद्र-शासित राज्य गोवा की यातायात पुलिस ने वर्ष 2018 में यातायात का उल्लंघन करने वाले साढ़े सात लाख से अधिक लोगों का चालान किया. गौर करने वाली बात यह है कि यहां कुल वाहनों की संख्या ही करीब 15 लाख है. भारतीय जनगणना के मुताबिक यहां लोगों की संख्या भी करीब 15 लाख ही है.

स्पष्ट है कि इस छोटे राज्य में सड़क सुरक्षा और यातायात के नियमों का पालन कराना एक बड़ी चुनौती है. ऐसी स्थिति में एक ऐसा स्कूल है, जो राज्य की इस चुनौती से निपटने के लिए यातायात पुलिस का हाथ बंटा रहा है. यह है राजधानी पणजी से करीब 30 किलोमीटर दूर सत्तारी तहसील के अंतर्गत होंडा गांव का शासकीय उच्चतर माध्यमिक स्कूल.

यहां खास बात है कि यह स्कूल सड़क सुरक्षा का माहौल बनाने के लिए तो आगे आया ही है. साथ ही, भविष्य में कुशलतापूर्ण तरीके से यातायात संचालन को बनाए रखने के लिए यह बच्चों को जिम्मेदार नागरिक बनाने की शिक्षा दे रहा है.

खास बात यह भी है कि इस स्कूल में सड़क सुरक्षा के प्रति जागरुकता का प्रयास किसी विशेषज्ञ के व्याख्यान तक सीमित नहीं है. इसकी बजाय यहां पूरे शिक्षा सत्र की अवधि को ध्यान में रखते हुए एक योजना बनाई जाती है. शिक्षिका सुलोचना बाराजणकर की मानें तो शुरुआत में उन्होंने बच्चों को कुछ चित्र और वीडियो के माध्यम से यातायात के संकेत और नियम बताए थे. फिर, इसके बाद उन्होंने जो-जो किया वह किसी भी स्कूल के लिए अनुकरणीय हो सकता है.

सुलोचना के मुताबिक इस सत्र में वे बच्चों को ऐसे साठ से अधिक वीडियो दिखा चुकी हैं. उन्हें देख बच्चे आसानी से यह समझ जाते हैं कि सड़क यातायात के दौरान अनुशासनहीनता खतरनाक है और इससे कई तरह की दुर्घटनाएं होती हैं.

किंतु, सुलोचना यही नहीं रुकीं. वे बीते एक वर्ष से यातायात विषय पर बच्चों को जानकर बनाने के लिए सप्ताह में दो से तीन सत्र आयोजित कर चुकी हैं. इन सत्रों की एक विशेषता यह है कि इस दौरान बच्चों ने तरह-तरह की रचनात्मक गतिविधियों में शामिल होकर उल्लेखनीय सामग्री तैयार की है.इस अवसर को भुनाया
वर्ष 1995 में स्थापित इस स्कूल में पांचवीं से दसवीं तक कुल 254 बच्चे हैं. यहां प्रधानाध्यापिका शीतल कदम सहित दस शिक्षक और शिक्षिकाएं हैं. ये शिक्षक-शिक्षिकाएं यातायात-जागरुकता के अलावा कचरा-प्रबंधन और स्वच्छता जैसे विषयों पर अपने स्कूल में बच्चों के साथ लगातार बदलाव की दिशा में कार्य कर रहे हैं.

वहीं, करीब छह हजार की आबादी वाले होंडा गांव में अधिकतर निम्न-मध्यवर्गीय परिवार हैं. इसमें से अधिकतर या तो दैनिक मजदूर और दुकानदार हैं, या सरकारी विभागों में छोटे कर्मचारी. इन्हीं परिवारों के बच्चे अंग्रेजी माध्यम के इस सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं.

पूरे समुदाय को संवेदनशील बनाने की पहल
इनमें से एक सुलोचना बाराजणकर यातायात-जागरुकता पर कार्य करने वाली शिक्षिका हैं. वे अपने विषय से संबंधित अनुभव साझा करती हुई कहती हैं कि गोवा जैसे राज्य में ट्रैफिक सबसे जरुरी मुद्दों में से एक है. बतौर शिक्षिका मेरे लिए यह एक बड़ा मौका था. मैंने सोचा कि इसका लाभ उठाकर मैं सबसे पहले तो इस मुद्दे पर खुद और उसके बाद स्कूल के बच्चों, साथी शिक्षिकों और फिर पूरे समुदाय को संवेदनशील बनाने की कोशिश कर सकती हूं.

वे कहती हैं, ''ट्रैफिक जैसे मुद्दों पर कई बार हम बहुत कुछ जानते हुए भी सचेत नहीं रह पाते हैं. ऐसे में जो व्यक्ति यातायात का पालन कराने के इस अभियान से जुड़ रहा है, उसमें एक बड़ी जिम्मेदारी का एहसास हो रहा है. जैसे कि मेरे भीतर.''

प्रधानाध्यापिका शीतल कदम के लिए अहम बात यह है कि सड़क सुरक्षा के जरिए बच्चों ने सोचना शुरु किया है और कई मौके पर उनकी रचनात्मकता खुलकर सामने आ रही है. वे कहती हैं, ''इस विषय पर बच्चों ने दिखाने लायक सामग्री तैयार की है. इसके अलावा उन्होंने कविताएं लिखीं, नारे बनाएं, पोस्टर तैयार किए और नाटक दिखाएं. एक तरह से उनकी सकारात्मकता को बढ़ावा मिला.''

यहां के बच्चों ने शहर में यातायात दर्शाने वाले कई सुंदर मॉडल तैयार किए हैं. शिक्षिका शैलेजा पाटिल ये मॉडल दिखाते हुए बताती हैं, ''इन्हें आठवीं से दसवीं तक के बच्चों ने बनाया है. आप देख सकते हैं कि इनमें चित्रों के माध्यम से बच्चों ने स्कूल और अस्पताल के आसपास पालन किए जाने वाले संकेतों को अच्छी तरह से प्रदर्शित किया है.''

बच्चों ने किए अभिनव प्रयोग
यातायात-जागरुकता के मुद्दे पर इन शिक्षिकाओं को स्कूल-प्रबंधन का भरपूर साथ मिला. यही वजह है कि इस विषय पर बच्चों की जिज्ञासाओं को शांत करने के लिए स्कूल ने अपने यहां दो बार यातायात अधिकारियों को आमंत्रित किया.

यहां की शिक्षिकाओं ने बताया कि इसी शिक्षा सत्र में उन्होंने एक ऐसी गतिविधि भी आयोजित की थी, जिसमें बच्चों को फोरलेन मार्गों पर संचालित यातायात की फोटोग्राफी करने के लिए कहा गया था. बाद में फोटो-प्रदर्शनी के दौरान बच्चों की चर्चा में भाग लिया और सघन यातायात पर एक-दूसरे की समझ साफ की.

इन दिनों साइकिल चलाने का चलन न के बराबर देखा गया है. इसलिए, आमतौर पर बच्चों के अलावा कई लोगा भी इससे संबंधित यातायात के नियमों के बारे में अनभिज्ञ ही रहते हैं. ऐसे में स्कूल द्वारा इस विषय पर अलग से एक सत्र आयोजित किया गया था.

सुलोचना बताती हैं, ''इसमें कुछ बच्चे अपने घर से साइकिल लेकर आए थे. उन्होंने स्कूल परिसर में ही यातायात नियमों के अनुसार साइकिल चलाने का अभ्यास किया. उनके प्रदर्शन के दौरान ही हमने बच्चों के साथ चर्चा की और उनके सवालों के जवाब दिए.''

शिक्षिका स्मिता देसाई की मानें तो इस तरह की गतिविधियों का ही असर है कि बच्चों के साथ उनके परिजन भी इस मुद्दे पर अपनी संवेदनशीलता दिखा रहे हैं. कुछ दिन पहले की ही बात है, जब स्कूल की ओर से सड़क सुरक्षा पर आयोजित रैली में बच्चों के साथ उनके परिजनों ने भी भाग लिया था.

बच्चे खुद बताते हैं क्या सही, क्या गलत
दूसरी तरफ, इसी मुद्दे पर यहां के बच्चे पूरी जिम्मेदारी से अपनी बात रखते हैं. कक्षा नौवीं की साक्षी गावकर यातायात के एक-एक नियमों के बारे में विस्तार से बताते हुए कहती हैं कि बड़ी होकर जब वह कार चलाएगी तो हर नियम का अच्छी तरह से पालन करेगी. स्नेहा गावकर की सुनें तो वह अपने आसपास के लोगों को यातायात ऐसे संकेतों के बारे में बताती है जो अक्सर उन्हें भी पता नहीं होते.

छटवीं का अजीत गावडे कहता है कि जब कभी वह किसी व्यक्ति को यातायात का उल्लंघन करते देखता है तो उसकी कोशिश रहती है कि वह उस व्यक्ति के पास जाए और उसे यह बताए कि उसने क्या गलत किया है.

अंत में खूश्बू प्रजापति बताती हैं कि वह यातायात के उपयोग में आने वाले हर रंग का संकेत जानती है. उसके शब्दों में, ''मैं चाहती हूं, एक दिन मैं पुलिस (यातायात) वाले के पास जाऊं और दिन भर उनकी मदद करुं.''

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First published: November 26, 2019, 3:41 PM IST
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