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कोलोरेक्टल कैंसर में इम्यून कंट्रोलिंग के काम नहीं करने की वजह आई सामने

नए अध्ययन में दिखी कैंसर के इलाज की नई संभावना. (प्रतीकात्मक फोटो- pexels.com)

नए अध्ययन में दिखी कैंसर के इलाज की नई संभावना. (प्रतीकात्मक फोटो- pexels.com)

Immune control in colorectal cancer : कैंसर के इलाज में ट्यूमर कोशिकाओं (Tumor Cells) के खिलाफ इम्यून प्रतिक्रिया के मामले में इम्यून चेकप्वाइंट प्रतिरोधक से क्रांतिकारी बदलाव आया है. जबकि बहुत सारे रोगियों खासकर कोलोरेक्टल (आंत और मलाशय) कैंसर से ग्रस्त लोगों पर दवा का पर्याप्त असर नहीं होता है.

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    Immune control in colorectal cancer : कैंसर के इलाज को लेकर हुई एक स्टडी से कुछ अच्छे संकेत मिले हैं. हाल के एक रिसर्च में यह पता लगाया गया है कि कुछ प्रकार के कोलोरेक्टल कैंसर (Colorectal Cancer) में इम्यून चेकप्वाइंट प्रतिरोधक (Immune Checkpoint Resistance) काम क्यों नहीं करता है और इस तरह के प्रतिरोधों (Resistors) से निपटने की क्या रणनीति हो सकती है? दैनिक जागरण अखबार में छपी न्यूज रिपोर्ट के मुताबिक, कैंसर के इलाज में ट्यूमर कोशिकाओं (Tumor Cells) के खिलाफ इम्यून प्रतिक्रिया के मामले में इम्यून चेकप्वाइंट प्रतिरोधक से क्रांतिकारी बदलाव आया है. जबकि बहुत सारे रोगियों खासकर कोलोरेक्टल (आंत और मलाशय) कैंसर से ग्रस्त लोगों पर दवा का पर्याप्त असर नहीं होता है. एमजीएस यानी मैसाचुसेट्स जनरल हास्पिटल (Massachusetts General Hospital) और यूनिवर्सिटी आफ जेनेवा (UNIGE) के रिसर्चर्स के नेतृत्व में की गई ये स्टडी पीएनएएस जर्नल में प्रकाशित हुई है.

    इस रिपोर्ट में आगे लिखा है कि एमजीएच के ईएल स्टील लेबोरेटरीज फॉर ट्यूमर बायोलाजी (EL Steel Laboratories for Tumor Biology) के डायरेक्टर और इस रिसर्च के राइटर डॉ राकेश के जैन (Rakesh k Jain) और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल (Harvard Medical School) में रेडिएशन आन्कोलाजी (Radiation Oncology) के प्रोफेसर एंड्रयू वर्क कुक (Andrew Work Cook) ने बताया कि कोलोरेक्टल कैंसर से पीड़ितों की मौत का एक बड़ा कारण लिवर मेटास्टेसिस है. मतलब कैंसर लिवर तक फैल जाता है.

    क्या रहा परिणाम
    इस रिसर्च के को-राइटर दाई फुकुमुरा (Dai Fukumura) का कहना है कि हमने पाया कि चूहों के मॉडल स्टडी में कोलोरेक्टल कैंसर की स्थिति में रोगियों की तरह ही इम्यून चेकप्वाइंट प्रतिरोधकों का बर्ताव रहा. इस परिणाम से यह बात सामने आई कि जिस वातावरण में कैंसर सेल्स बढ़ते हैं, वह इम्यूनोथेरेपी की प्रभावशीलता को कैसे प्रभावित कर सकता है? साथ ही इसमें सबसे अहम संकेत यह मिला कि इस मॉडल का इस्तेमाल इम्यून चेकप्वाइंट के कामकाजी प्रतिरोध (working resistance) की स्टडी में किया जा सकता है, क्योंकि कोलोरेक्टल कैंसर के रोगियों में भी कमोबेश यही स्थिति बनती है.

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    यह पता लगाने के लिए कि लिवर मेटास्टेसिस (liver metastasis) किस प्रकार से इम्यून चेकप्वाइंट ब्लॉकेड (Immune checkpoint blocked) का प्रतिरोध करता है, जैन और उनके सहकर्मियों ने चूहों के लिवर मेटास्टेसिस में मौजूद प्रतिरक्षी (इम्यून) कोशिकाओं की संरचना का त्वचा में इंजेक्ट की गई कोलोरेक्टल कैंसर की कोशिकाओं से तुलना की. इसमें पाया गया कि लिवर मेटास्टेसिस में कुछ खास इम्यून कोशिकाएं नहीं थी, जिन्हें डेंडिटिक सेल्स कहते हैं और ये अन्य इम्यून कोशिकाओं (साइटोटाक्सिक टी लिंफोसाइट्स) को एक्टिव करने में अहम होते हैं. यह साइटोटाक्सिक टी लिंफोसाइट्स कैंसर सेल को मार सकते हैं. यही स्थिति रोगियों के लिवर मेटास्टेसिस में देखी गई कि डेंडिटिक कोशिकाओं (Denditic cells) और एक्टिव टी लिंफोसाइट्स (T lymphocytes) का अभाव था.

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    रिसर्च करने वालों ने जब लिवर मेटास्टेसिस में खास प्रक्रिया के जरिये डेंडिटिक सेल्स की संख्या बढ़ाई, तो पाया कि ट्यूमर में साइटोटाक्सिक टी लिंफोसाइट्स में भी वृद्धि हुई और ट्यूमर इम्यून चेकप्वाइंट प्रतिरोधकों के प्रति ज्यादा संवेदनशील भी हो गया.

    विसंगति (Discrepancy) को समझने के लिए किया प्रयोग
    डॉ राकेश जैन का कहना है कि कोलोरेक्टल कैंसर जब लिवर तक फैल जाता है, तो ऐसे ज्यादातर मामलों में इम्यून चेकप्वाइंट प्रतिरोधक की प्रतिक्रिया प्रभावी नहीं रह जाती है. लेकिन रिसर्च टीम ने जब कोलोरेक्टल कैंसर सेल्स को चूहों के पिछले हिस्से की त्वचा में इंजेक्ट किया तो इम्यून चेकप्वाइंट प्रतिरोधक की प्रतिक्रिया अच्छी रही, जबकि रोगियों में ऐसा देखने को नहीं मिलता है. रिसर्चर्स ने इस विसंगति को समझने के लिए कैंसर सेल्स को आंत और लिवर में इंजेक्ट किया.

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