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    मैं नज़र से पी रहा था तो ये दिल ने बद्दुआ दी, पढ़ें शकील बदायूंनी की रोमांटिक शायरी

    शकील बँदायूनी की शायरी
    शकील बँदायूनी की शायरी

    शकील बदायूंनी की शायरी (Shakeel Badayuni Shayari): जीने वाले क़ज़ा से डरते हैं, ज़हर पीकर दवा से डरते हैं...

    • News18Hindi
    • Last Updated: August 4, 2020, 9:49 AM IST
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    शकील बदायूंनी की शायरी (Shakeel Badayuni Shayari): शकील बदायूंनी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है. शकील बदायूंनी को शायरी की कला अपने खानदान से विरासत में नहीं मिली थी. हालांकि उनके एक दूर के रिश्तेदार सूफी शायरी किया करते थे. उनकी ही छाप शकील बदायूंनी पर पड़ी. शकील बदायूंनी जब यूनिवर्सिटी में थे तब मुशायरों में हिस्सा लिया करते थे. इसी दौरान एक फिल्म निर्माता को उनकी शायरी का अंदाज कुछ ऐसा भाया कि उन्होंने शकील बदायूंनी को मुंबई आने का न्योता दे डाला. शकील बदायूंनी ने मायानगरी मुंबई में गीतकार नौशाद के साथ मिलकर कई ऐसे गीत लिखे जिन्होंने धूम मचा दी. आज हम आपके लिए रेख्ता और कविताकोश के साभार से लाए हैं शकील बदायूंनी की कुछ बेहद मशहूर शायरी....

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    ग़म-ए-आशिक़ी से कह दो .. रह-ए-बाम तक ना पहुंचे...



    ग़म-ए-आशिक़ी से कह दो .. रह-ए-बाम तक ना पहुंचे
    मुझे खौफ़ है.. ये तोहमत .. मेरे नाम तक ना पहुंचे ;

    मैं नज़र से पी रहा था .. तो ये दिल ने बद्दुआ दी...
    तेरा हाथ जिंदगी भर .. कभी जाम तक ना पहुंचे ;

    नई सुबहा पर नज़र है.. मग़र आह.. ये भी डर है...
    ये सफ़र भी रफ़्ता-रफ़्ता .. कहीं शाम तक ना पहुंचे ;

    वो नवा-ए-मुज़म्मिल क्या .. ना हो जिसमें दिल की धड़कन...
    वो सदा-ए-एहल-ए-दिल क्या .. जो अवाम तक ना पहुंचे ;

    उन्हें अपने दिल की खबरें .. मेरे दिल से.. मिल रही हैं...
    मैं जो उनसे रूठ जाऊं .. तो पयाम तक ना पहुंचे ;

    ये अदा-ए-बेनियाज़ी ... तुझे बेवफ़ा... मुबारक़...
    मग़र ऐसी बेरुखी क्या .. जो सलाम तक ना पहुंचे ;

    जो नक़ाब-ए-रुख उठा दी .. तो ये क़ैद भी लगा दी...
    उठे हर निग़ाह.. लेकिन .. कोई बाम तक ना पहुंचे ;

    वही इक खामोश नगमा .. है 'शक़ील'.. जान-ए-हस्ती ...
    जो ज़ुबान तक ना आए .. जो क़लाम तक ना पहुंचे..."



    ज़िन्दगी का दर्द लेकर इन्क़लाब आया तो क्या...
    ज़िन्दगी का दर्द लेकर इन्क़लाब आया तो क्या
    एक जोशीदा पे ग़ुर्बत में शबाब आया तो क्या

    अब तो आँखों पर ग़म-ए-हस्ती के पर्दे पड़ गए
    अब कोई हुस्न-ए-मुजस्सिम बेनक़ाब आया तो क्या

    ख़ुद चले आते तो शायद बात बन जाती कोई
    बाद तर्क-ए-आशिक़ी ख़त का जवाब आया तो क्या

    मुद्दतों बिछड़े रहे फिर भी गले तो मिल लिए
    हम को शर्म आई तो क्या उनको हिजाब आया तो क्या

    एक तजल्ली से मुनव्वर कीजिए क़त्ल-ए-हयात
    हर तजल्ली पर दिल-ए-ख़ानाख़राब आया तो क्या

    मतला-ए-हस्ती की साज़िश देखते हम भी 'शकील'
    हम को जब नींद आ गई फिर माहताब आया तो क्या.



    रूह को तड़पा रही है उन की याद...
    रूह को तड़पा रही है उन की याद
    दर्द बन कर छा रही है उन की याद

    इश्क़ से घबरा रही है उन की याद
    रुकते-रुकते आ रही है उन की याद

    वो हँसे वो ज़ेर-ए-लब कुछ कह उठे
    ख़्वाब से दिखला रही है उन की याद

    मैं तो ख़ुद्दारी का क़ाइल हूँ मगर
    क्या करूँ फिर आ रही है उन की याद

    अब ख़्याल-ए-तर्क-ए-रब्त ज़ब्त ही से है
    ख़ुद ब ख़ुद शर्मा रही है उन की याद.

    बदले बदले मेरे सरकर नज़र आते हैं ...

    बदले बदले मेरे सरकर नज़र आते हैं .
    घर की बरबादी के आसार नज़र आते हैं .

    मेरे मालिक ने मुहब्बत का चलन छोड़ दिया
    कर के बरबाद उम्मीदों का चमन छोड़ दिया
    फूल भी अब तो ख़ार नज़र आते हैं
    घर की बरबादी के .

    डूबे रहते थे मेरे प्यार में जो शाम-ओ-सहर
    मेरे चेहरे से नहीं हटती थी कभी जिनकी नज़र
    मेरी सूरत से ही बेज़ार नज़र आते हैं
    घर की बरबादी के .

    जीने वाले क़ज़ा से डरते हैं...
    जीने वाले क़ज़ा से डरते हैं
    ज़हर पीकर दवा से डरते हैं

    ज़ाहिदों को किसी का ख़ौफ़ नहीं
    सिर्फ़ काली घटा से डरते हैं

    आह जो कुछ कहे हमें मंज़ूर
    नेक बंदे ख़ुदा से डरते हैं

    दुश्मनों के सितम का ख़ौफ़ नहीं
    दोस्तों की वफ़ा से डरते हैं

    अज़्म-ओ-हिम्मत के बावजूद 'शकील'
    इश्क़ की इब्तदा से डरते हैं.
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