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फेफड़े हो सकते हैं खराब, अगर इस तरह सोते हैं आप

News18Hindi
Updated: January 1, 2020, 8:32 AM IST
फेफड़े हो सकते हैं खराब, अगर इस तरह सोते हैं आप
फेफड़े हो सकते हैं खराब, अगर इस तरह सोते हैं आप

यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर और यूनिवर्सिटी ऑफ आक्सफोर्ड के शोधकर्ताओं के अनुसार शरीर की जैविक घड़ी शरीर में मौजूद एक-एक कोशिका को संचालित करती है.

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  • Last Updated: January 1, 2020, 8:32 AM IST
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पूरी नींद लेने से सेहत और मन दोनों बेहतर रहते हैं ये बात तो आपने भी सुनी होगी. अक्सर लोग पूरे 8 घंटे की नींद लेने की सलाह दी जाती है. लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि कम और ज्यादा नींद लेने से आपकी सेहत पर क्या असर पड़ सकता है. हाल में ही हुए एक शोध में यह बात सामने आई है कि जो लोग रोजाना 11 घंटे से ज्यादा सोते हैं या चार घंटे से कम नींद लेते हैं, उनमें गंभीर और लाइलाज फेफड़ों की बीमारी पल्मोनरी फिब्रोसिस होने का खतरा दो से तीन गुना ज्यादा होता है. शोध के अनुसार सात घंटे सोने वालों की तुलना में कम या ज्यादा सोने वालों में बीमारी का खतरा ज्यादा होता है.

पत्रिका पीएनएएस में प्रकाशित शोध में फेफड़ों की कोशिकाओं का अध्ययन करने के बाद बताया गया है कि जैविक घड़ी के अनुसार सोने से फेफड़ों में होने वाला फिब्रोसिस और फेफड़ों में होने वाले घाव कम हो जाते हैं. फेफड़ों में मौजूद कोशिकाओं को यह बीमारी निशाना बनाती है. पल्मोनरी फिब्रोसिस तब होता है जब फेफड़ों में मौजूद ऊतक क्षतिग्रस्त हो जाते हैं और इसकी वजह से अंग सही तरीके से काम नहीं कर पाते हंै.

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यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर और यूनिवर्सिटी ऑफ आक्सफोर्ड के शोधकर्ताओं के अनुसार शरीर की जैविक घड़ी शरीर में मौजूद एक-एक कोशिका को संचालित करती है. यह जैविक घड़ी 24 घंटे के चक्र में कई प्रक्रियाएं जैसी सोना, हार्मोन का स्राव और चयापचय को संचारित करती है. फेफड़ों में यह घड़ी हवा अंदर ले जाने वाली प्रमुख नली यानी वायुमार्ग में स्थित होती है. शोध में पता चला कि पल्मोनरी फिब्रोसिस से पीड़ित मरीजों में इस घड़ी का दोलन छोटे एयर स्पेस बनाता है, जिसे एलवियोली कहते हैं.



यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के प्रमुख शोधकर्ता जॉन ब्लाइक्ले ने कहा, पल्मोनरी फिब्रोसिस एक गंभीर बीमारी है जिसका फिलहाल कोई इलाज मौजूद नहीं है. ऐसे में जैविक घड़ी की खोज होने से इस बीमारी का इलाज करने के लिए नए तरीकों की खोज की जा सकेगी. चूहों पर किए गए शोध में पता चला है कि जैविक घड़ी में बदलाव होने से फिब्रोटिक प्रक्रिया में भी बदलाव होता है और इससे पल्मोनरी फिब्रोसिस होने का खतरा बढ़ जाता है.

यूके बायोबैंक से लिए गए प्रतिभागियों के डाटा का विश्लेषण करने के बाद शोधकर्ताओं ने बताया कि पल्मोनरी फिब्रोसिस का संबंध कम या ज्यादा सोने से है. शोधकर्ताओं ने कहा कि नींद के समय और इस बीमारी के बीच उतना ही मजबूत संबंध है जितना अन्य कारकों से है.

(एजेंसी- भाषा)

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First published: January 1, 2020, 8:24 AM IST
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