सोशल मीडिया पर नादान रहने में भलाई...

सोशल मीडिया पर नादान रहने में भलाई...
कभी कभी नादान बने रहना बेहतर है

इंटरनेट और खासकर सोशल मीडिया पर जानकारियों की खदान है. एक मुद्दे पर हजारों विचार रखे जा रहे हैं. लेकिन इन सबके बीच कोई इस दीन दुनिया से नादान और अंजान रहना चाहे तो, इसमें कोई बुराई है क्या?

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उंगलियों पर जानकारी रखने वाले सोशल मीडिया प्राणियों के पास हर चीज़ का जवाब है. जवाब जो उन्हें फटाफट गूगल करके मिल जाता है. वो जवाब जो उन्हें सोशल मीडिया पर ‘जानकार’ कहलाने के लिए काफी है. कोई मुद्दा ऐसा नहीं जिसके बारे में आप अपना नज़रिया नहीं रख सकते. राजनीति, इकोनॉमिक्स, फिल्में सबकी जानकारी ‘पेली’ जा सकती है. लेकिन कहीं ये जरूरत से ज्यादा जानकारी हमारे लिए हानिकारक तो नहीं बनती जा रही है. क्या जरूरी है कि दुनिया में होने वाली हर एक बात हमें पता ही हो. सोशल मीडिया पर कभी-कभी नादान बने रहने में भी आखिर क्या बुराई है.

सोशल मीडिया यानी फेसबुक, ट्विटर और इन सबमें सबसे आगे वॉट्सऐप. यहां जानकारियों की खदान है. हालांकि इसकी कोई गारंटी नहीं कि यह जानकारियां सही हो हो. अगर गहराई में जाएंगे तो फैमिली वॉट्सऐप ग्रुप में मिलने वाले ‘आयुर्वेदिक दवाइयों के असर’ ‘चीन की सड़कों पर उड़ने वाली कार’ जैसे मैसेज की सच्चाई के परखच्चे उड़ जाएंगे. तो ऐसे में गलत जानकारी रखने से बेहतर क्या यह नहीं होगा कि हमें कुछ पता ही न हो.

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इंटरनेट पर जानकारियों का अंबार है




मिशिगन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेविड डनिंग की रिसर्च कहती है कि भले ही हमारे पास जानकारियों और तथ्यों की खदान हो, लेकिन इसके बावजूद हम गुमराह हो सकते हैं. इसे ‘डनिंग-क्रूगर इफेक्ट’ का नाम दिया गया है. इसे समझने के लिए एक लंबी सांस लीजिए.
‘डनिंग क्रूगर इफेक्ट के मुताबिक कम जानकर लोगों को नहीं पता कि उन्हें कितना कम पता है और न ही वो इस स्थिति में है कि ये जान पाएं कि उन्हें कितना कम पता है क्योंकि अगर उन्हें ये पता होता कि उन्हें कितना कम पता है, तो वो पहले ही उसे ठीक करने का काम शुरू कर चुके होते.’ यही नज़रिया हमारे रोजमर्रा के फैसलों पर असर डालता है क्योंकि हम अपने काम का आकलन भी उसी बुद्धि के साथ करते हैं, जिस बुद्धि के साथ हमने पहले पहल वो काम किया होता है. तो इस हिसाब से हमें कभी यह पता चल ही नहीं पाता कि शायद हम किसी गलत बात को सही मान रहे हैं.

उदाहरण के तौर पर व्हाट्सएप का फॉर्वर्ड मैसेज पढ़कर भीड़ का किसी को पीट पीटकर मार डालना. वो भीड़ जो उस व्यक्ति को मारना अपना ‘धर्म’ समझ बैठी है, उससे कोई कदम उठाने से पहले मैसेज की विश्वसनीयता को चेक करने की अपेक्षा करना पता नहीं कितना सही है.

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बौराइए नहीं


प्रोफेसर डनिंग के मुताबिक डिजिटल युग में गुमराह होना और ज्यादा आसान है. जहां एक तरफ सच हमारे फोन के इंटरनेट में छुपा है, वहीं कई गलत जानकारियां भी उसी इंटरनेट का हिस्सा है. ऐसे में सही-गलत की समझ रखे बगैर हर जानकारी को सही मान लेना सबसे बड़ी अज्ञानता है. इंटरनेट की सूचना सेल में रखे कपड़ों के ढेर जैसी है. उसमें से कौन सा कपड़ा सही है और कौन सा खराब, यह ठीक से देखने पर ही पता चल पाता है. बिना चेक किए उठाएंगे तो खराब कपड़ा भी हाथ लग सकता है.

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जानकारी को ठीक से जांचें


डनिंग ने अपनी रिसर्च में जरूरत से ज्यादा जानकारी को मेडिकल के संदर्भ में भी समझाया. डनिंग के मुताबिक कई लोग डॉक्टर के पास न जाकर इंटरनेट पर भरोसा करना ज्यादा पसंद करते हैं. जो डॉक्टर के पास जाते हैं, वो इंटरनेट की जानकारी के साथ जाते हैं जिनसे डॉक्टर एक तिहाई बार असहमत ही नज़र आते हैं. इंटरनेट लोगों को जानकारी जुटाने में मदद करता है, उन्हें एहसास दिलाता है कि उन्हें काफी ज्ञान है, यह एहसास दिलाता है कि वो एक विशेष विषय के बारे में सब कुछ जानते हैं. जबकि सच तो यह है कि बहुत कुछ है जो वो नहीं जानते - अफसोस कि उन्हें एहसास ही नहीं है कि उन्हें नहीं पता. इसी एहसास का न होना खतरनाक है.

ऐसे में आधी अधूरी जानकारी से बेहतर है, जानकारी का बिल्कुल न होना. एक खाली स्लेट के साथ डॉक्टर के पास जाएंगे तो इलाज बेहतर तरीके से हो पाएगा. वरना ऐसा भी हो सकता है कि छोटा सा वायरल भी आपको इंटरनेट के ज्ञान से कैंसर जैसा लाइलाज रोग लगने लगे. इसलिए कुछ न पता होने का भी सुख लीजिए. अति किसी भी चीज़ की खराब होती है और डिजिटल युग में यह खराब से खतरनाक होती जा रही है.
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