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संडे स्पेशल: 5 भारतीय पुरुष जिन्होंने महिला अधिकारों की लड़ाई लड़ी


Updated: December 8, 2019, 8:25 AM IST
संडे स्पेशल: 5 भारतीय पुरुष जिन्होंने महिला अधिकारों की लड़ाई लड़ी
Indian Men who fought for women rights

10 दिसंबर 1948 को, संयुक्त राष्ट्र (United Nations) ने मानव अधिकारों (Human Rights) की घोषणा की और इस दिन को मानवाधिकार दिवस (World Human Rights Day) के रूप में मनाया जाने लगा.

  • Last Updated: December 8, 2019, 8:25 AM IST
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नईदिल्ली. 10 दिसंबर 1948 को, संयुक्त राष्ट्र (United Nations) ने मानव अधिकारों (Human Rights) की घोषणा की और इस दिन को मानवाधिकार दिवस (World Human Rights Day) के रूप में मनाया जाने लगा. उस दिन के 71 साल बाद हम आज एक ऐसी स्वतंत्रता का से जी सकते हैं जिसकी गारंटी संविधान (Constitution of India) देता है. इसमें जाति, रंग, लिंग, भाषा, राजनीतिक विचार या किसी भी अन्य सामाजिक मानदंडों द्वारा समुदायों को अलग नहीं किया जाता है.

1947 में भारत पर ब्रिटिश शासन के पहले तक हमारे यहां भी मानवाधिकारों का हनन लगातार होता रहा. इसके बाद 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा आपातकाल लागू किए जाने के समय भी हमने ऐसा दौर देखा. बार-बार इस तरह के दमन के खिलाफ पूरा समाज एक होकर लड़ा लेकिन महिलाओं की मुक्ति के लिए कुछ अलग लड़ाई की जरुरत होती है.

स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए दोनों पुरुषों और महिलाओं ने हमारे अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी, लेकिन महिलाओं के हालात में बदलाव लाने के लिए कुछ नायकों वास्तव में जबरदस्त काम किया. इन नायकों से मिली प्रेरणा के दम पर ही महिलाओं ने अपनी आवाज बुलंद की और लिंगभेद के खिलाफ एकजुट हुईं.

आइए जानते हैं भारत के इन्हीं नायकों के बारे में

राजा राम मोहन राय (1774-1833)

राजा राम मोहन राय
राजा राम मोहन राय


सती, भारत की सबसे घृणित प्रथाओं में से एक थी. जिसने एक विधवा को अपने मृत पति के अंतिम संस्कार की चिता में खुद को बलिदान करने के लिए मजबूर किया जाता था. इस बर्बर प्रथा के खिलाफ उठने वाली आवाज़ों में प्रमुख राजा राम मोहन राय थे. जिन्होंने इस व्यवस्था को खत्म करने की लड़ाई लड़ी. राममोहन राय ने ब्राह्मो समाज का निर्माण किया. जिसने जाति व्यवस्था की बेड़ियों को तोड़ने की कोशिश की और सती के खिलाफ लड़ाई ने कई महिलाओं की जान बचाई. उन्होंने महिलाओं के लिए संपत्ति के अधिकारों की वकालत की और बाल विवाह के खिलाफ भी आवाज बुलंद की.मनोकजी कोवासजी (1808-1887)
रॉयल एशियाटिक सोसाइटी और रॉयल जियोग्राफिकल सोसाइटी के सदस्य के रूप में कोवासजी ने पाया कि महिलाओं के साथ वर्षों से शैक्षिक और व्यावसायिक क्षेत्र में भेदभाव होता रहा है. 859 में उन्होंने मुंबई में लड़कियों के लिए पहला अंग्रेजी स्कूल शुरू किया. इस स्कूल में उनकी घर की गवर्नेस और बेटियों ने पढ़ाना शुरू किया. जब इस पहल को तो कोवासजी ने स्कूल को दूसरे परिसर में स्थानांतरित कर दिया. इस स्कूल का नाम एलेक्जेंड्रा नेटिव गर्ल्स इंग्लिश इंस्टीट्यूशन रखा गया. स्कूल सभी जातियों की लड़कियों के लिए था. 1887 में उनकी मृत्यु तक कोवासजी स्कूल का अध्यक्ष बने रहे. बाद में इस स्कूल के नाम से 'नेटिव' शब्द को हटा लिया गया. 2013 में इस स्कूल ने अपनी 150वीं वर्षगांठ मनाई थी.

ज्योतिराव गोविन्दराव फुले (1827-1890)

ज्योतिराव गोविन्दराव फुले
ज्योतिराव गोविन्दराव फुले


ज्योतिराव गोविंदराव फुले एक भारतीय समाजसेवी और सुधारक थे. उन्होंने समाज में महिलाओं के जीवन में व्यापक बदलाव लाया. उनके समय में, निचली जातियों की महिलाओं को स्कूल जाने और शिक्षा प्राप्त करने की अनुमति नहीं थी. उन्होंने इसे बदलने की कसम खाई और इसकी शुरूआत अपनी पत्नी को शिक्षित करके किया. एक साथ, उन्होंने अपने परिवार के विरोध के बावजूद लड़कियों के लिए अपना पहला स्कूल शुरू किया. उन्होंने विधवा पुनर्विवाह की वकालत की और साथ ही कन्या भ्रूण हत्या की घटनाओं को कम करने के लिए एक अनाथालय शुरू किया.
बेहरामजी मालाबारी (1853-1912)

बेहरामजी मेरवानजी मालाबारी वडोदरा के रहने वाले एक भारतीय लेखक और सुधारक थे. जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी और बाल विवाह के खिलाफ मजबूती से खड़े हुए. उन्होंने विधवा और बाल विवाह पर अपने शक्तिशाली लेखन के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त किया. 1885 में जज पिनही द्वारा, रुखमाबाई नाम की एक लड़की को उसके पति के पास वापस जाने या जेल जाने के लिए मजबूर किया गया था, लेकिन उसने मालाबारी की मदद से केस जीत लिया.

डॉ. भीमराव आंबेडकर (1891-1956)

डॉ. भीमराव आंबेडकर
डॉ. भीमराव आंबेडकर


डॉ. बीआर अंबेडकर, भारतीय संविधान के वास्तुकार दलितों के अधिकारों और समाज में उनके उत्थान के लिए प्रसिद्ध हैं. इसके अलावा, वह हिंदू कोड बिल की शुरुआत के लिए जिम्मेदार थे. इस बिल में महिलाओं को तलाक की याचिका दायर करने का अधिकार दिया और साथ ही विरासत का अधिकार भी दिया. संसद के रूढ़िवादी सदस्यों द्वारा मजबूत विरोध के बावजूद उन्होंने समाज में पुरुषों और महिलाओं के व्यक्तिगत और समान अधिकारों की स्वतंत्रता को व्यापक बनाने की अनुमति देने की वकालत की.

इन पांच पुरुषों ने महिलाओं को समान अधिकार प्रदान करने के लिए अथक संघर्ष किया. लेकिन निरंतर परिवर्तन तभी होगा जब पुरुष समानता और मानव अधिकारों की लड़ाई में महिलाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होंगे. तभी, दुनिया वास्तव में रहने के लिए एक बेहतर जगह बन पाएगी.

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First published: December 8, 2019, 8:16 AM IST
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