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अब भी नहीं चेते तो मिट्टी में मिल जाएगा हमारा अस्तित्व

News18Hindi
Updated: October 24, 2019, 2:08 PM IST
अब भी नहीं चेते तो मिट्टी में मिल जाएगा हमारा अस्तित्व
अब भी नहीं चेते तो मिट्टी में मिल जाएगा हमारा अस्तित्व

मेडिकल जर्नल ‘द लांसेट’ में छपे अध्ययन के मुताबिक, प्रदूषण से दक्षिण पूर्व एशिया में साल 2015 में 32 लाख मौतें हुई हैं. दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के इस आंकड़े में भारत भी शामिल है. दुनियाभर में हुई करीब 90 लाख मौतों में से 28 प्रतिशत मौतें अकेले भारत में हुई हैं.

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  • Last Updated: October 24, 2019, 2:08 PM IST
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इन दिनों रांची में हूं. दो दिनों से झारखंड के कई इलाकों में बारिश हो रही है. बारिश से धुले आकाश को देखना सुखद लगता है. दूर-दूर तक पसरी हरियाली के नजारे बेहद साफ हैं और हवा में मौजूद सिहरन रोमांच पैदा कर रही है. मौसम बेहद खुशनुमा है. दीपावली के स्वागत की तैयारी में लगा हूं. जरा भी तनाव नहीं कि दीपावली में हवा जहरीली हो जाएगी.

दरअसल, इसी इत्मीनान ने देश की हवा बिगाड़ी है. दिल्ली एनसीआर समेत देश के कई हिस्सों में सांस लेने पर हवा का वजन महसूस होता है. दिल्ली-एनसीआर में रह रहे साथी बता रहे थे कि आंखों में जलन और नाक बहने की शिकायत बढ़ गई है. दीपावली करीब आने पर हवा के और जहरीली हो जाने की आशंका अभी से सताने लगी है.

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एक अध्ययन के मुताबिक, 2015 में प्रदूषण से हुई मौतों के मामले में 188 देशों की सूची में भारत 5वें स्थान पर रहा है. मेडिकल जर्नल ‘द लांसेट’ में छपे अध्ययन के मुताबिक, दक्षिण पूर्व एशिया में साल 2015 में 32 लाख मौतें हुई हैं. दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के इस आंकड़े में भारत भी शामिल है. दुनियाभर में हुई करीब 90 लाख मौतों में से 28 प्रतिशत मौतें अकेले भारत में हुई हैं. यानी यह आंकड़ा 25 लाख से ज्यादा है. ये मौतें हवा, पानी और अन्य तरह के प्रदूषण के कारण हुई हैं.

प्रदूषण से होने वाली मौतों की लिस्ट में बांग्लादेश सबसे ऊपर है और उसके बाद सोमालिया का नंबर है. चीन में प्रदूषण से होने वाली मौंतों का आंकड़ा 22 लाख रहा है जो इस सूची में 16वें स्थान पर है.
2017 में भारत में किया गया एक साझा अध्ययन प्रकाशित हुआ था. भारतीय अनुसंधान चिकित्सा परिषद, पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया और ग्लोबल बर्डेन डिजीज के इस अध्ययन में बताया गया कि भारत में हर 3 मिनट में 5 साल तक के एक बच्चे की मौत वायु प्रदूषण के कारण हो जाती है. इस अध्ययन के आंकड़े बताते हैं कि 2017 में भारत में वायु प्रदूषण से 1 लाख 85 हजार से ज्यादा बच्चों की मौत हुई थी. इस तरह देखें तो इस वर्ष प्रतिदिन 507 से ज्यादा बच्चों को इस वायु प्रदूषण ने मार डाला.

इस भयावह आंकड़े के बाद भी हम सचेत नहीं हैं. हमें सोचने की जरूरत है कि क्या देश की हवा शुरू से जहरीली रही होगी? बेशक इसका जवाब ‘नहीं’ में ही होगा. जाहिर है कि हमने इस हवा में जहर घोला है. हम बेपरवाह रहे प्रकृति के प्रति. हमने कभी नहीं सोचा कि जो शुद्ध हवा हमें मिल रही है वह हमें अपनी भावी पीढ़ी को भी देनी है. शायद हमारे पूर्वजों की छोटी-मोटी लापरवाहियां हम तक पहुंच कर बड़ी होती गईं.
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गौर करें कि हरियाणा और पंजाब में पराली जलाना बैन है. बावजूद वहां धान कटते ही पराली जलाने का सिलसिला शुरू हो जाता है. सरकार दावा करती है कि पराली की उपयोगिता को लेकर दोनों राज्यों में जागरूकता फैलाने का काम किया गया. पर या तो सरकार की कोशिशों में कहीं खोट है या इन राज्यों के किसान जरूरत से ज्यादा लापरवाह. पराली से पसरा धुआं आसपास के राज्यों को अपनी चपेट में लेता रहा है.

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हर साल दीपावली पर सुप्रीम कोर्ट तक को हस्तक्षेप करना पड़ता है. सरकारों और प्रशासन की ओर से गाइडलाइन जारी की जाती है कि क्रैकर से हम बाज आएं. पर हम अपनी परंपरा की दुहाई देकर प्रदर्शनप्रियता के गुलाम बने रहते हैं. हम अंधेरे को उजाले में बदलने की अपनी परंपरा को भूल कर उसके विकृत रूप में अपनी खुशी तलाशने लगते हैं.

हमारी परंपराएं हमें प्रकृति की रक्षा, उसका सम्मान करना सिखाती हैं. पर अब हम अपनी परंपराओं को अपने मुताबिक परिभाषित करने लगे हैं. हम अपने को प्रगतिशील बताने के लिए यह दिखावा करते हैं कि कर्मकांडों में हमारी आस्था नहीं. अमूमन, इस दिखावे में हम अपनी परंपरा की वैज्ञानिकता और उसकी तार्किकता को नजरअंदाज करते रहते हैं.

पूर्वांचल के लोग अब भी अपनी परंपरा का निर्वाह करते हुए प्रकृति की पूजा करते हैं. सरहुल और छठ जैसे पर्व और त्योहार यहां अब भी रचे-बसे हैं. अभी-अभी दीपावली के बाद पूर्वांचल का महापर्व छठ आने वाला है.

छठ शुद्ध रूप से प्रकृति की पूजा का पर्व है. प्रकृति के प्रति कृतज्ञता दिखाने का अवसर है यह, लेकिन इसमें किसी कर्मकांड की जरूरत नहीं. सूर्य की पूजा का मौका है यह. यह एकमात्र ऐसे भगवान हैं जो दिखते हैं. यह पर्व जलाशयों की महत्ता समझने-समझाने का अवसर देता है. छठ में व्यक्तिगत और सामूहिक भागीदारी दोनों चीजें दिखती हैं. घर की साफ-सफाई जहां व्यक्तिगत होती है वहीं नदी-तालाब किनारे पहुंच कर पूजा करना सामूहिक भागीदारी का मामला है.

यह दुनिया का इकलौता अवसर है जिसमें डूबते सूर्य का भी सम्मान किया जाता है. यह परंपरा इसे दूसरे पर्वों से अलग करती है. इससे समाज का यह दायित्वबोध भी दिखता है कि जिस सूर्य ने हमें दिन भर तेज दिया, रोशनी दी, उसके निस्तेज होने पर भी हम उसे भूलते नहीं. छठ पूजा में प्रकृति का महत्व उसकी पूजा-विधि से लेकर प्रसाद तक में मौजूद है. छठ के प्रसाद में केला व सेब समेत सभी फलों के अलावा मूली और कच्ची हल्दी भी होती हैं. ईख तो खास होती ही है. पूजा के लिए कोसी का इस्तेमाल होता है. कोसी मिट्टी का पात्र होता है जिस पर कई दीये बने होते हैं.

इन बातों का मकसद सिर्फ यह ध्यान दिलाना है कि हमारी परंपराएं हमें बार-बार प्रकृति की ओर हमें खींचती हैं और हम अपनी हेठी में इस प्रकृति से दूर होते चलते हैं. यह सही है कि अब पूर्वांचल का मौसम भी बदलने लगा है. प्रदूषण की मात्रा यहां की हवा में भी बढ़ चुकी है, पर वह अभी खतरनाक नहीं हुई है. यह राहत देने वाली बात तो है पर इत्मीनान में रहने की बजाए हमें सतर्क होने की जरूरत है. अभी तक जिस साफ हवा में हम दूर-दूर तक हरियाली देख पा रहे हैं, उस साफ हवा और हरियाली पर हमारे लालच की नजर लग चुकी है. अब भी नहीं चेते तो तय है कि हमारा वह अस्तित्व मिट्टी में मिल जाएगा, जिसे सवांरने की अंधी धुन में हम पर्यावरण को नजरअंदाज कर रहे हैं.

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First published: October 24, 2019, 12:34 PM IST
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