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मनहूस रसोई है या वो घर, जिसमें रसोई रहती है

16वीं शताब्दी की डच आर्टिस्‍ट जोहनेस वरमीर की पेंटिंग- ‘द मिल्‍कमेड’
16वीं शताब्दी की डच आर्टिस्‍ट जोहनेस वरमीर की पेंटिंग- ‘द मिल्‍कमेड’

कब किस रसोई से उठी कौन सी पहचानी हुई गंध का सिरा पकड़कर हम यादों के कौन से घर में जा पहुंचें. वो गंध खाने की भी हो सकती है और आंसुओं की भी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 16, 2019, 11:53 AM IST
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टर्किश राइटर एलिफ शफक के उपन्यास ‘40 रूल्स ऑफ लव’ की इला एक पूरी दोपहर रसोई से बाहर नहीं निकली. वो तब तक तरह-तरह के स्वाद रचती रही, जब तक शहर के आसमान को घुप्प अंधेरे ने न ढंक लिया. जितनी परवाह से उसने ये स्वाद रचे थे, उतनी ही बेपरवाही से उन्हें चखा गया. बदले में एक शुकराना भी न मिला. उसके बाद ही उसने रूमी और शम्स की कहानी लिखने वाले उस अनाम लेखक को ढूंढना शुरू किया था. रसोई का स्वाद उसकी उंगलियों में तब भी बचा रहा. मुहब्बत के 40 नियमों के उस उपन्यास में एक मुहब्बत वो भी है, जिसका स्वाद रसोई में मिलता है.

एक रसोई उस हंगेरियन फिल्म ‘ऑन बॉडी एंड सोल’ की मारिया की भी थी. बिलकुल अनछुई बेरंग रसोई. सफेद प्लेट के बीचोंबीच ब्रेड की दो स्लाइस. बीच में एक चीज. न रंग, न स्वाद. टमाटर का एक टुकड़ा या धनिए का एक पत्ता भी नहीं. 1951 का समय था. फिल्म ‘द आवर्स’ की लॉरा अपनी रसोई में पति के जन्मदिन का केक बनाने की कोशिश कर रही थी. अपनी तमाम नेकनियती और ईमानदार कोशिश के बावजूद केक जल गया. फिर लॉरा ने घर छोड़ दिया.

15वीं सदी के डच आर्टिस्‍ट फ्लोरिस वान स्‍कुतन की एक पेंटिंग. रसोई उनकी पेंटिंग्‍स की केंद्रीय थीम रही.
15वीं सदी के डच आर्टिस्‍ट फ्लोरिस वान स्‍कुतन की एक पेंटिंग. रसोई उनकी पेंटिंग्‍स की केंद्रीय थीम रही.




एक बहुत सुंदर सी रसोई भी थी, जोन्‍नी सिल्‍वी हैरिस के नॉवेल ‘चॉकलेट’ की, हालांकि विएन्ने उसमें ज्यादातर वक्त तरह-तरह के चॉकलेट ही बनाती थी. लेकिन मानो वो चॉकलेट नहीं, जीवन के हर दुख, हर मर्ज की दवा थी. पीढ़ियों का खोजा और पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोया गया जीवन का हर वो स्वाद था, जो प्रकृति ने इंसानों को बख्शा था. आप ढूंढना चाहें तो उसकी गंध और स्वाद में आपको हर सवाल का जवाब मिल सकता था. हर स्वाद का हर इंद्रिय के साथ अपना ही एक रिश्ता था. कोई स्वाद देह में आग लगा सकता था तो कोई रुला सकता था. लेकिन हर स्वाद में एक चीज कॉमन थी- प्यार. पेड़ में फल कोई भी उगे, जड़ों में हर पेड़ के एक ही चीज है- प्यार. विएन्ने की हर रेसिपी प्यार वाली रेसिपी थी.
वैसे जलते चूल्हे के सामने बैठी स्त्री चाहे कितने भी पसीने में लथपथ क्यों न हो, सामने डेगची में जो उबल रहा है, वो प्यार ही होता है.

मैं इस वक्त अपनी रसोई में खड़ी पतीली में अपने लिए प्यार उबाल रही हूं. ठीक इस वक्त ठीक ऊपर वाली रसोई से मछली की खुशबू आ रही है. उस महक को अपने नथुनों में भरते हुए मैंने सामने वाली बिल्डिंग की रसोइयां गिनी हैं. कुल 10 रसोइयां दिखाई देती हैं यहां से और चार कदम बढ़ाकर बालकनी में चले जाओ तो 14. हर रसोई की एक कहानी होती है. इन 14 रसोइयों की भी एक कहानी है.

फिल्‍म ‘द आवर्स’ के एक दृश्‍य में पति के जन्‍मदिन के लिए केक बनाने की कोशिश कर रही लॉरा
फिल्‍म ‘द आवर्स’ के एक दृश्‍य में पति के जन्‍मदिन के लिए केक बनाने की कोशिश कर रही लॉरा


उन 14 में से 11 रसोइयों में ठीक इस वक्त 11 औरतें खड़ी हैं. ठीक सामने वाली में एक औरत अकेले रोटियां बेल रही है. कुछ मिनट पहले शॉट्स और बनियान में एक लंबा सा लड़का आया था. आलमारी में कुछ देर कुछ ढूंढा और चला गया. उसके बगल वाली रसोई में दो महीने पहले तक सिर्फ एक लड़का दिखाई देता था. अकसर ऐसा होता कि किचन की लाइट जलती, लड़का एक बड़ी सी पॉलिथीन में से कुछ सामान निकालकर किचन के प्लेटफॉर्म पर रखता और चला जाता. उसके किचन की लाइट कभी पांच मिनट से ज्यादा नहीं जली. अभी पिछले दो महीने से रोज शाम एक छरहरे बदन की गोरी सी लड़की दिखाई देती है. आजकल उस किचन में रोज खाना बनता है. कभी-कभी वो लड़का भी दिखता है. कभी दीवार से सटकर खड़ा कुछ बातें कर रहा होता है या कभी किचन में रोमांस. शायद उन दोनों ने इस बात पर गौर नहीं किया है कि जैसे मेरे किचन से 14 किचन दिख रहे हैं, उनके किचन से भी 14 किचन दिख रहे होंगे. क्या पता, उनमें से किसी किचन में खड़ी कोई आंटी सब्जी छौंकने के बहाने उनके रोमांस के छौंके में भी छनछना रही हो. फिलहाल, मुझे तो अच्छा लगता है किचन में रोमांस करते लोगों को देखना. मेरी एक दोस्त कहती थी कि अगर लड़का किचन में रोमांस करने वाला हुआ तो मैं कभी आलू-प्याज काटने में बराबरी के लिए झगड़ा नहीं करूंगी. मैं एक कप तो क्या, एक बाल्टी भरकर चाय पिलाने को तैयार हूं. वो बस पीछे से कमर में हाथ डाले खड़ा रहे और कानों को चूम ले.

पता नहीं इस वक्त दुनिया की कितनी रसोइयों में ऐसे पतीली और देह, दोनों में संग-संग प्यार पक रहा होगा.

वो ठीक नीचे वाली रसोई में एक औरत सलेटी साड़ी और लापरवाह जूड़े में प्लेटफॉर्म पर सिर झुकाए कुछ काट रही है. जूड़ा सिर के पीछे से उचककर कट रही सब्जियों का मुआयना कर रहा है. उसके हाथों की चूड़ियां हिलती दिख रही हैं, खनकती सुनाई नहीं दे रहीं. वो सबसे ऊपर वाली रसोई की बालकनी में अकसर एक लड़की देर रात अकेली सिगरेट पीती खड़ी रहती है. एक और किचन में औरत ने एक बच्चे को प्लेटफॉर्म पर बिठा रखा है और काम कर रही है. बच्चे का हाथ और मुंह चलता दिखाई दे रहा है. बीच-बीच में औरत भी अपना सिर हिला रही है.

जोन्‍नी सिल्‍वी हैरिस के नॉवेल ‘चॉकलेट’ पर बनी फिल्‍म में विएन्ने की रसोई
जोन्‍नी सिल्‍वी हैरिस के नॉवेल ‘चॉकलेट’ पर बनी फिल्‍म में विएन्ने की रसोई


एक और रसोई में नीले धारीदार कच्छे में एक आदमी आया था अभी. आया और चला गया. एक लड़की किचन में शॉर्ट्स में खड़ी है और मैं उसके सुंदर पैर देख रही हूं. वैसे उसकी शकल देखकर लगता तो नहीं कि पाककला में उसे महारत हासिल होगी. वो किचन में ऐसे खड़ी है, जैसे लड़की देखने आए संभावित ससुराल वालों के सामने चाय की ट्रे लिए खड़ी संभावित दुल्हन, जिसका दिल कर रहा है कि चाय की ट्रे लड़के के मुंह पर दे मारे. उससे नीचे वाली रसोई में जो मोटी सी औरत रोज दिखती है, उसे देखकर लगता है कि मानो वो दुनिया की सबसे मनहूस जगह पर खड़ी है. उसके हाथ ऐसे चलते हैं, जैसे ‘मॉडर्न टाइम्स’ फिल्म में चार्ली चैप्लिन के चलते थे. एक सधे हुए क्रम में एक ही तरीके से बार-बार, लगातार. और वो चारों दिशाओं में ऐसे हाथ घुमाती है, जैसे एक जोड़ी आंख पीछे भी लगा रखी हो.

और यहां अपनी रसोई में खड़ी मैं सोच रही हूं कि रसोइयों के बारे में इतना क्यों सोच रही हूं.

किसी भी घर में रसोई का होना वैसा ही है, जैसे शरीर के बीचोंबीच दिल का होना. दिल धुकुर-धुकुर चलता है तो खून दौड़-दौड़कर शरीर के कोने-कोने में बहने लगता है. वैसे ही किचन के एक कोने से दूसरे कोने तक दौड़-दौड़कर निहाल हो रही औरतें घर को जिंदा रखे हुए हैं, लेकिन खुद मानो मुर्दहिया शांति से भरी हैं. घर की सबसे गैरमामूली जगह पर पसीने से तरबतर हल्दी और मसालों की गंध में लिपटी घर की सबसे मामूली शै जान पड़ती हैं. कभी वो इतनी नजाकत से बेलन को चकले पर घुमाती हैं कि जैसे आंखों में काजल लगा रही हों तो कभी ऐसी रूखाई से कि मानो फुटबॉल को कसकर एक लात मार दी हो.

अपनी पूरी जिंदगी में हमने कितनी रसोइयां देखी, जानी. हर रसोई स्मृति में दर्ज हुई. उस रसोई में कभी कुकर की सीटी की आवाज थी तो कभी फुंकनी के मुंह से निकलता संगीत. कभी सिलबट्टे पर लोढ़े की घिसर-घिसर थी तो कभी इमामदस्ते की खट-खट. कभी चूड़ियों के आपस में टकराने से संगीत उठा तो कभी उन्हीं चूड़ियों का टुकड़ा किसी नाजुक कलाई में धंस गया, जब उन कलाइयों को गुस्से से दबाया गया. उस रसोई में कभी दीवार पर फेंक दी गई थी खाने से भरी थाली तो कभी भात से भरी डेगची चूल्हे के मुंह पर औंधी पाई गई. कभी दालचीनी, लौंग, इलायची और अजवायन के कूटे जाने से उठी खुशबू थी तो कभी उनकी जली हुई कालिख की गंध. कभी वहां औरतों की खुसफुस थी, खिलखिलाना था तो कभी तेल में छौंका लगाते चुपचाप किसी का अकेले सुबकना. कितनी बार कितनी आंखों के कोर सबकी नजरों से छिपाकर वहां पोंछे गए. लेकिन दिल कितने भी बंजर क्यों न हों, रसोइयों का जिंदगी को सींचते रहने का क्रम कभी नहीं रुका. नए बच्चे पैदा होते रहे और उन रसोइयों में पका अन्न खाकर बलशाली मनुष्यों में तब्दील हुए.

15वीं सदी के डच आर्टिस्‍ट फ्लोरिस वान स्‍कुतन की एक पेंटिंग. रसोई उनकी पेंटिंग्‍स की केंद्रीय थीम रही.
15वीं सदी के डच आर्टिस्‍ट फ्लोरिस वान स्‍कुतन की एक पेंटिंग. रसोई उनकी पेंटिंग्‍स की केंद्रीय थीम रही.


जिस जगह पर औरतों ने अपनी जिंदगी का सबसे लंबा समय बिताया, वो रसोइयां हमारी स्मृतियों में घर के एक मामूली कोने की तरह नहीं दर्ज हैं. वो स्वाद, महक, पोषण और रंग की तरह दर्ज हैं. सुख और सुकून की तरह. रसोइयों से उठती गंध हवा का हाथ थामे दूर-दूर तक चली जाती है. आज भी ऐसा होता है कि कब किस रसोई से उठी कौन सी पहचानी हुई गंध का सिरा पकड़कर हम यादों के कौन से घर में जा पहुंचें. वो गंध खाने की भी हो सकती है और आंसुओं की भी.

हालांकि रसोई का नरेटिव बदल रहा है. औरतों की आजादी के हर नरेटिव में रसोई को कोई उंचा दर्जा हासिल नहीं. हर नरेटिव ये कहता है कि पहले उस मनहूस जगह से बाहर निकलो, फिर अपने होने के अर्थ पाओगी. वो बाहर निकली भी हैं. लेकिन वो कितना भी बाहर निकल जाएं, उनका लौट-लौटकर वहां जाना होता ही रहता है. और साथ ही ये सवाल भी उठता रहता है बार-बार कि मनहूस दरअसल है क्या. रसोई का होना मनहूस है या उस रसोई से औरत का रिश्ता मनहूस है. औरतों को रसोइयों में बंद कर बाहर से ताला जड़ देना मनहूस है या औरतों का खुद भीतर जाकर ताला बंद कर लेना. मनहूस रसोई है या वो समाज, वो घर, जिसमें रसोई है.

जितनी जिंदगी, उतनी रसोई, जितनी रसोई, उतना स्वाद, उतना प्रेम, उतनी उदासी.

इन सारी रसोइयों बीच एक और रसोई थी, जो मुझे आज भी याद है. उस पारसी औरत की रसोई. हर औरत से जुड़ी याद में होती है एक रसोई, लेकिन उसकी रसोई की याद कुछ अलग है. वो ठहाकों वाली रसोई थी. वो सबसे संजीदा सवालों पर सबसे संजीदगी भरी बातों की रसोई थी. वो उसकी रसोई तो थी ही, वो दोस्तों की भी रसोई थी. वो उस घर में आने वाले हर उस शख्स की रसोई थी, जिसकी उंगलियों में स्वाद पका सकने का हुनर था. वो गपशप और बतकहियों की रसोई थी. वो राजनैतिक सरगर्मियों और प्रेम कविताओं की रसोई थी. वो औरतों के खौफ और बच्चों की बेखौफ खिलखिलाहटों की रसोई थी. वो उस रसोई के हर मसाले को उसकी महक से जानती थी. वो उन्हें कभी ऐसी लापरवाही से नहीं बरतती कि किसी के संग कुछ भी चलेगा. वो जानती थी कि कौन सा मसाला किस खाने का सही साथी है. किसे किसके साथ होना है और किसे किसके साथ नहीं होना. हालांकि कई बार उसके मसालों की बेमेल सी जान पड़ती जोड़ियों में भी एक किस्म का मेल होता. वो मिलकर एक नया स्वाद रचते, नई गंध बनते. इस संभावना को देख पाने के लिए जो नजर चाहिए, जिंदगी को देख सकने की नजर से आती थी. नजर, जो प्यार और आजादी से आती है.

इसलिए बात रसोई की नहीं थी. बात रसोई को देखने और बरतने की नजर की थी.

जो रसोई बंधन न हो, मजबूरी न हो, जीवन का इकलौता मायने न हो, महानता का मेडल न हो तो रसोई की हर बात जिंदगी की बात हो सकती है. रसोई का हर स्वाद जिंदगी का स्वाद. रसोई की हर महक जिंदगी की महक.

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