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Street Food ज़ायकाः संदूकची से शुरू हुई थी 'फतेह की कचौड़ी', मिलिए इसकी तीसरी पीढ़ी बिट्टू से

फतेह की कचौड़ी

फतेह की कचौड़ी

‘80 फीसदी ग्राहक वही स्कूल के बच्चे हैं जो नानाजी के पास आते थे. आज कोई 60 का है तो कोई 65 का. बच्चे बूढ़े हो गए लेकिन ...अधिक पढ़ें

    गोल-गोल दिखने वाली, दाल की पिट्ठी भरी हुई, देसी घी में गुलाबी-गुलाबी तली हुई कचौड़ियां हम सभी ने खाई होंगी. नहीं? किसी ने छोले और आलू की सब्जी के साथ तो किसी ने सिर्फ हरी चटनी के साथ इसे चटकारे लेकर खाया होगा. आज की कहानी है तो कचौड़ी पर लेकिन इसमें न तो दाल की पिट्ठी भरी है और न ही ये मोटी गोल, देसी घी में सिकी हैं. कचौड़ी तो है लेकिन 'मठरा' स्टाइल में.

    ये कहनी है फतेह की कचौड़ी वाले की जो इसे बेचने वाला, अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी है.

    फिरंगियों की हुकुमत के दौरान की बात है. अंदाजन कह सकते हैं, साल होगा 1940. स्व. फतेहचंद, संदूकची में मटरा (जिसे अब छोले बोलते हैं) लेकर सिर पर ढोया करते हैं. इधर-उधर पैदल घूमते थे. मटरा ‘बेकते’ थे. पैसा कमाते थे.

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    फिर धीरे-धीरे उन्होंने गुजराती समाज स्कूल, सिविल लाइन्स, दिल्ली को अपना अड्डा बनाया. संदूकची को सड़क के किनारे रखकर बच्चों को मटरा ‘बेकना’ शुरू कर दिया. यानी पैदल घूमना बंद हो चुका था, खड़े होकर मटरा ‘बेक’ रहे थे.

    स्कूल के भी बच्चे चटोरे थे. धीरे-धीरे काम अच्छा होने लगा. तकरीबन 4-5 घंटे में मटरा बेचकर अच्छी-खासी कमाई होने लगी. साल था 1950 का. असल में वहां 4-5 स्कूल थे. बच्चे नानाजी के पास, झुंड में आने लगे थे. जैसी ही स्कूल की छुट्टी होती थी नानाजी कुर्ते की बाजूओं को ऊपर करके मटरा ‘बेकना’ शुरू कर देते.

    संदूक जितनी दुकान को 'फतेह की कचौड़ी' नाम दिया
    मटरा स्कूल के बच्चों में जब मशहूर हुआ तो नानाजी ने इसी कारोबार को आगे बढ़ाने की सोची. मटरा के साथ उन्होंने मट्ठी (कचौड़ी) ‘बेकनी’ शुरू की. इस पर मटरा, प्याज, धनिया, मसाले, चटनी लगाकर अपनी संदूक जितनी दुकान को 'फतेह की कचौड़ी' का नाम दे दिया. सन् 1960 तक उन्होंने कचौड़ी के साथ छोले-कुल्चे रोल भी ‘बेकने’ शुरू कर दिए थे.

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    1990-2000 के बीच अपने स्वाद को ज़िंदगी देकर खुद दुनिया से विदा ले गए. कारोबार उनके बच्चों ने बढ़ाया. उनके बच्चों के गुजरने के बाद अब मैं 10-12 साल से अपने बड़े भाई के साथ मिलकर इसे संभाल रहा हूं.

    बातचीत फतेहचंद के नवासे, 30 साल के बिट्टू कुमार से हुई. वे इस करोबार में तीसरी पीढ़ी हैं. ये सिविल लाइन्स में उसी जगह, साइकिल रेड़ी लगाते हैं. सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक. मसालों से लेकर कचौड़ी, छोले-कुल्चे तैयार करने की जिम्मेदारी इनके बड़े भाइया के हाथ में रहती है. कारीगर मसाले चुनकर, हाथ से मामजिस्ते में कूटते हैं.

    साइकिल पर कचौड़ी ‘बेकने’ के लिए बड़े भाइया, बिट्टू जी और दो कारीगर रहते हैं.

    फतेह की कचौड़ी की खासियत?
    बिट्टू का कहना था, ‘80 फीसदी ग्राहक वही स्कूल के बच्चे हैं हैं जो नानाजी के पास आते थे. आज कोई 60 का है तो कोई 65 का. बच्चे बूढ़े हो गए स्वाद नहीं’.

    बूढ़े हुए 'बच्चों' के लिए छूट
    स्कूल के बच्चों के लिए नानाजी ने डिस्काउंट तय किया था. एक रुपये की प्लेट उनके लिए 50 पैसे की थी. 5 रुपये की प्लेट 3-4 की हुई. आज 25 रुपये की प्लेट उनके लिए 20 की है.

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    चटनी रेसिपी
    ये चटनी में इमली नहीं डालते. इसे प्योर अमचूर की बनाते हैं. मसाले हाथ से कूटते हैं. पिसे हुए नहीं इस्तेमाल करते.

    कमाई
    इस सवाल पर बिट्टू कहते हैं सालों से इस काम में हैं कुछ बचता नहीं तो कोई और कारोबार देखते. परिवार सूकून से रहता है.

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