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Street Food ज़ायकाः गवर्नमेंट प्रेस में नौकरी करते थे ‘लोटन के छोल-कुल्चे’ वाले, लंच में आते थे बेचने

लोटन के छोले कुल्चे

लोटन के छोले कुल्चे

परदादा जी (स्व. लोटन राम) ने 1918 में इसे ‘चालू’ किया था. चावड़ी बाजार में गली चरखेवालां, कमर्शियल स्कूल के अंदर वे काल ...अधिक पढ़ें

    Street Food ज़ायका में आज की कहानी लोटन छोले कुल्चे वाले की है. इनके परदादा जी (स्व. लोटन राम) ने 1918 में इसे चालू किया था. चावड़ी बाजार में गली चरखेवालां, कमर्शियल स्कूल के अंदर वे काले संदूक में कुल्चे. एक बड़े से भिगोने में उबले हुए छोले और पिसे हुए मसाले रखकर, पटरी लगाते थे.

    आज हमारी बात हुई है महावीर कश्यप से, जो कुल्चे के काम में चौथी पीढ़ी हैं.

    ‘आधी छुट्टी’ यानी इंटरवल में लोटन स्कूल के बच्चों को उस टाइम 1 या 2 पैसे में छोले कुल्चे बेचा करते थे. स्कूल की बड़ी और दूसरी ब्रांच दरया गंज में खुली. 1947 में स्कूल शिफ्ट हुआ. छोटे कमर्शियल से बड़े कमर्शियल में. ये स्कूल छठी से बाहरवीं क्लास तक के बच्चों के लिए खुला था. यहां पर परदादा ने दादा जी (पुरन चंद) को बिठाया. जगह दो हो गईं थीं. और काम भी बढ़ गया था. दोनों ने मिलकर काम संभालना शुरू किया.

    परदादा जी वैसे तो चंदौसी गांव से थे लेकिन शादी के बाद दिल्ली आकर बस गए थे.

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    मायापुरी में गवर्नमेंट प्रेस में दादा नौकरी करते थे. दोपहर में नौकरी पर जब लंच होता तो वे बड़े कमर्शियल स्कूल छोले-कुल्चे बेचने आ जाते थे. दिन निकलें. शामें बीतती गईं. दादा की अचानक तबियत खराब होने लगी. परदादा जी का देहांत कब हुआ इतना याद नहीं. लेकिन 1989 में दादा जी का देहांत हुआ.

    पढ़ाई बीच में छोड़ पापा के साथ बटाया हाथ
    फिर, 1990 में पापा जी (अशोक कश्यप) ने आगे आकर काम संभालना शुरू किया. पूरा काउंटर उन्होंने अपने हाथों में ले लिया था. काम ज्यादा होने की वजह से वे अकेले पड़ गए थे. इसलिए 9वीं क्लास में स्कूल छोड़ा. 1996 से हमने काम संभाला. आज इसमें 22 साल हो गए हैं. मैं महावीर कश्यप, छोटा भाई देवेंद्र कश्यप और ओम प्रकाश कश्यप. तीनों भाई मिलकर यही संभाल रहे हैं.

    कैसे पड़ा लोटन के छोले कुल्चे नाम
    ‘लोटन कुल्चे खिला दे’, ऐसे उनका नाम लोटन के छोले कुल्चे पड़ा. बदलते सालों में छोले कुल्चे का रेट भी 1 पैसे से 10 रुपये हो चुका था.

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    कहां-कहां हैं इनकी दुकान
    चावड़ी बाजार- सुबह 7 बजे से 10 बजे तक
    दरया गंज बड़ा कमर्शियल स्कूल- सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक
    तीसरी ब्रांच इनक कृष्णा नगर में है. जिसे खुले एक साल हो चुका है.

    रेट लिस्ट
    लोटन के छोले कुल्चे तीन रेट में उपलब्ध है.
    30 रुपये
    40 रुपये
    50 रुपये
    ये तीनों वैरायटी के साथ स्वाद में भी अलग है.

    लोटन के छोले कुल्चे की है क्या खास बात
    लकड़ी की आंच पर माल पकता था. अब काम बढ़ गया है. सभी चीजें गैस पर बनने लगी हैं. लेकिन गरम मसाले हम वही लगाते हैं. जो परदादा जी के समय पर लगाया करते थे. महंगाई से कोई लेना-देना नहीं है. मसाले जितने भी महंगे हो जाएं चीज वही इस्तेमाल करते हैं.

    ‘ज़ायके में रत्तीभर कमी नहीं आई है. जो स्कूल में बच्चे पढ़ते थे. 5-10 साल बाद, दूसरे शहर में गए. वहां उन्होंने अपने दोस्तों को बताया. उन्होंने और चार लोगों को बताया. इस तरह नाम कमाया. स्कूल में पढ़ा बच्चा अगर दिल्ली आता है तो नाश्ता हमारे पास जरूर करने आता है’. बता रहे हैं माहावीर कश्यप.

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    कैसे बनाते हैं छोले
    ‘छोला’ सिर्फ उबला हुआ होता है. ऊपर से डालते हैं गरम मसाले. इन्हें ‘इमामजस्ते’ में कूटकर तैयार करते हैं. कुछ मिक्सी में भी पीस लेते हैं.

    एक खट्टी चटनी तैयार करते हैं. अमचूर, आम की सौंठ आती है, उससे. पहले इसे उबालते हैं. फिर पिसाई करके छान लेते हैं. लाल रंग का एक मसाला आता है, जो लाल मिर्च से बनता है. इसे छोंकते हैं. जिन लोगों को मसाला तेज़ चाहिए होता है उन्हें छोलों पर इसका तड़का लगाकर देते हैं. वरना तीखा नॉर्मल रहता है.





    महीने की कमाई
    छोले कुल्चे की तीन जगह दुकान है. इससे महीने का वे एक से देढ़ लाख रुपये तक कमा लेते हैं. परिवार अच्छे से रहता है. और कारीगरों की सैलरी भी निकल जाती है.

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    Video credit: saadidilli

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