Street Food ज़ायकाः मिलिए उस पान वाले से जिसकी दुकान पर चाचा नेहरू भी रोज खाते थे पान

मुल्क फिरंगियों के कब्जे में था और स्व. शिव नारायण पांडे पान खिलाकर उनपर अपना कब्जा जमाए बैठे थे. जानिए पांडे पान वाले की कहानी. इसी अक्टूबर, 2018 को इस दुकान को खुले 75 साल पूरे होंगे.

Khushboo Vishnoi | News18Hindi
Updated: October 24, 2018, 5:49 PM IST
Street Food ज़ायकाः मिलिए उस पान वाले से जिसकी दुकान पर चाचा नेहरू भी रोज खाते थे पान
जानिए 'पांडे' पान वाले की कहानी उसकी जुबानी
Khushboo Vishnoi | News18Hindi
Updated: October 24, 2018, 5:49 PM IST
ये कहानी है दिल्ली के कनॉट प्लेस में पांडे पान वाले की. इसी अक्टूबर, 2018 को इस दुकान को खुले 75 साल पूरे होंगे. इनकी ये दुकान तबसे है जब हमारे मुल्क पर फिरंगी कब्जा जमाए बैठे थे. लेकिन पांडे पान वाले के पान का कब्जा उन फिरंगियों पर भी था...

ये दुकान स्व. शिव नारायण पांडे ने 1943 में शुरू की थी. उस दौरान वे बैंक में काम करते थे और शाम को पान लगाते थे. पान वे शौकिया नहीं, अपने घर के खर्च पूरे करने के लिए लगाते थे. जो बैंक की नौकरी उन्हें नहीं दे पा रही थी. कहने को तो ये पान की दुकान है पर इसका स्वाद पीढ़ियों पुराना है. इस दुकान को शिव के बाद उनके बेटे देव प्रसाद पांडे ने संभाला और मौजूदा वक्त में इसे हरीओम पांडे चला रहे हैं.



उन दिनों यानी 1943 में, कनॉट प्लेस में अंग्रेजों का राज था. उस पॉश इलाके में भारतीयों के जाने पर रोक थी. नौकरी से लौटकर, शिव पांडे टूरिस्टों को पान परोसते थे.

तब तक देश आजाद हो चुका था और बैंक की नौकरी से शिव भी. मेहनत रंग लाई पान की दुकान चल पड़ी थी. 1948 तक कनॉट प्लेस में दुकान का बंदोबस्त कर लिया था.

दुकान पर राजनीतिक हस्तियों समेत मशहूर लोग आने लगे. पंडित जवाहरलाल नेहरू जी, राजेंद्र प्रसाद जी, एम. एफ. हुसैन साहब जी. दादाजी लोगों को तंबाकू का सेवन करने से मना करते थे. वे लोगों को तंबाकू से हटाकर मीठे पान की तरफ ला रहे थे. हिंदुस्तान के लोगों के लिए उन्होंने लौंग-इलायची का बीड़ा उठाया था. ये हिंदू संस्कृति के हिसाब से बहुत अच्छी चीज है. प्रयास कर उन्होंने मीठे पान का प्रचार करना शुरू किया. तंबाकू और सिगरेट को खत्म करने की कोशिश भी जारी थी.


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सन् 1954 तक पान वाले के साथ-साथ पान इतना मशहूर हुआ कि उसकी मांग राष्ट्रपति भवन से की जाने लगी. वीआईपी पार्टियों में पान मंगाया जाने लगा.

1970 में दादाजी पहली बार पिता बने. इस साल उन्हें नॉर्थ ऐवेन्यू में (वीवी गिरी साहब के समय में) दुकान मुहैया कराई गई. कहा गया कि तंबाकू हटाइए, लौंग-इलायची का प्रचार जोर-शोर से कीजिए. सादा या मीठा पान बेचिए. दादा की विरासत को संभालने में पिताजी की ज़िंदगी लग गई और फिर हमारा जन्म हुआ. अब हम हरिओम पांडे उनकी मेहनत को जी जान से संभालें हैं.

बकौल हरिओम पांडे, एम. एफ. हुसैन साहब मेरे दादाजी के मित्र थे. रोजाना आते थे, पान खाकर जाते थे. सैय्यद जावेद जाफरी जी की ‘फिलम’ आनी थी, चश्मे बद्दूर. उन्होंने ग्राहक को एंटरटेन किस तरह करते हैं, उनके साथ कैसा व्यवहार करते हैं, पान लगाते कैसे हैं और परोसते कैसे हैं. सभी चीजें सीखने के लिए एक हफ्ते की ट्रेंनिग ली. तालकाटोरा रोड पर ‘फिलम’ वालों ने उनका पान का स्टॉल लगवाया.



दादाजी लखनऊ से थे. 10वीं पास दिल्ली के डीएवी से की थी. पिताजी और हम कॉमर्स से ग्रैजुएट हैं. कॉमर्स की पढ़ाई में बिजनेस का गुड़ा-भाग सीखा. अर्थशास्त्र का डिमांड और सप्लाई समझकर सप्लाई बढ़ाई और फिर पान की डिमांड खुद-ब-खुद बढ़ने लगी. मीठा पान लोगों को सबसे ज्यादा पसंद आया.

आज पांडे जी 150 तरह के पान बनाते हैं. हर दिन का अलग मेन्यू होता है. कुछ वीकेंड स्पेशल भी होते हैं. बेनिफिट ऑफ पान’ की संस्कृति शुरू की. बैरीज, अखरोट के साथ पान परोसने की एक शुरुआत भी की.

हरिओम बताते हैं कि, अपने बच्चों को जो परोसते हैं, वही सोसाइटी को परोसते हैं. किसी भी तरह का तंबाकू नहीं परोसते. ‘डिफ्रेंट टाइप्स ऑफ पान, डिफ्रेंट टाइप्स ऑफ टेस्ट’ का वे पान के लिए नारा लगाते हैं.

ब्लूबेरी पान
ब्लूबेरी पान


पान पाचन का बेहतर विकल्प
पान के पत्ते में पेप्सक्राइम नाम का एक लार्वा होता है जो पाचन क्रिया को मजबूत बनाता है. खाना आसानी से पचाने में मदद करता है. पान चबाकर खाएंगे और उसे सूंघेंगे तो लार्वा अंदर जाएगा जो खाना डाइजेस्ट करेगा.

पांडे पान के स्वाद का राज़
बाजार में गुलकंद पत्तागोभी का बना मिल रहा है. पानी डालेंगे तो चाश्नी अलग और पत्तागोभी अलग दिख जाएगी. इसलिए इससे बचने के लिए खुद से गुलकंद बनाते हैं. चाश्नी हटने पर भी जिसमें गुलाब की पंखुड़ियां दिखती हैं.

30 सेकेंड में पान मुंह में घुल जाता है. इसमें किसी चीज को थूकने की जरूरत नहीं है. गंदनी करने की जरूरत नहीं है. मुंह में ना दाग आएगा और ना रैशेज.

चेरी पान
चेरी पान


पान का पत्ता जगन्नाथी इस्तेमाल करते हैं, जो पुरी से आता है. गुलकंद, गुलाब की पंखुड़ियों और शहद का बनाते हैं. पान में सुपारी नहीं डालते. ना चूना, ना कत्था लगाते हैं. ड्राई फ्रूट्स, ड्राई डेट्स (खजूर) रखकर परोसते हैं. ठंडा करके.

मशहूर है चॉकलेट पान
80 फीसदी कोको पाउडर का पान बनाया था. जो चॉकलेट लवर हैं उनके लिए. ये दुनिया में कोई नहीं बना पाया है. डार्क चॉकलेट के साथ, हेज़लनट, ब्लूबेरी, ऑरेंज, ग्रीन-टी पान लाने वाले हैं. गुलकंद के साथ मिश्रण करके जिससे ये और हर्बल हो जाए. ये पान नवंबर में लॉन्च कर देंगे.

माधुरी दीक्षित के नाम पर है पान का नाम
एक दिन एम. एफ. हुसैन साहब (रोजाना के ग्राहक) के साथ माधुरी दिक्षित जी दुकान पर आईं थी. उन्हें मीठा पान बहुत अच्छा लगा. जिसके बाद हुसैन साहब ने हमारी दुकान के लिए एक पेंटिंग बनाई. माधुरी जी ने गिफ्ट की. पेंटिंग हनुमान जी, संजीवनी बूटी लेकर जाते हुए की थी. जिसमें बूटी की जगह पान का पत्ता दिखाई गया था. उन्होंने बिनती भी की कि माधुरी जी ने जो पान खाया उसका नाम माधुरी पान रख लीजिए. धीरे-धीरे लोग उसे माधुरी पान कहने लगे और उसका नाम माधुरी पड़ गया.

ग्राहक को माधुरी पान का इतिहास पता है. इसलिए वह सबसे पहले माधुरी पान खाने की डिमांड करता है.

ब्लैकबेरी पान
ब्लैकबेरी पान


पान की बराबरी करने से नहीं डरते हरिओम पांडे, ये सवाल जब उनसे पूछा गया तो उनका कहना था कि, सीजन के हिसाब से काम करते हैं. आम का सीजन जा रहा है, संतरे का आ रहा है. कलर वाले आर्टीफिशियल टेस्ट इस्तेमाल नहीं करते. सिंथेटिक फ्लेवर पान में नहीं देते. सीजन फल, अमरूद जैसे-जैसे मिलता है उस चीज को गुलकंद के साथ मिलाते हैं. कॉपी करने की कोशिश तो कई लोग करते हैं लेकिन वो बिचारे क्रश (आर्टिफिशियल फ्लेवर, बोतलों में भर लेते हैं), पान पर लगाकर परोसते हैं. जिसकी वजह से पान के अंदर जैम जैसा फ्लेवर आने लगता है. वो काम हम नहीं करते. इसलिए बराबरी करने वालों से भी नहीं डरते.

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