मर्द ज्‍यादा आत्‍महत्‍या करते हैं तो क्‍या वो ज्‍यादा दुखियारे हैं?

मर्द के लिए तय की गई सामाजिक भूमिका को न निभा पाने वाले आदमी खुद को अकेला और असफल महसूस करते हैं. जबकि औरतों के साथ ऐसा नहीं है. वो घरेलू कामों और मातृत्‍व के ज्‍यादा बड़े दायरे में अपने जीवन की सार्थकता महसूस करती हैं.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 10, 2019, 12:59 PM IST
मर्द ज्‍यादा आत्‍महत्‍या करते हैं तो क्‍या वो ज्‍यादा दुखियारे हैं?
भारत में मर्दों और औरतों की आत्‍महत्‍या का अनुपात 2:1 है
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: July 10, 2019, 12:59 PM IST
ये लेख औरतों की महिमा गाने के लिए नहीं है. ये सिर्फ कुछ कहानियों, किरदारों, निजी अनुभवों और पूरी दुनिया में हुए कुछ अध्‍ययनों का संकलन भर है.
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कुछ साल पहले नैनीताल में एक कपल से मुलाकात हुई. मैं कुछ दिन उनके घर पर रही थी. पति सरकारी नौकर थे और पत्‍नी नर्स. एक दिन कुछ दोस्‍तों के साथ लंबी बैठकी के दौरान वो लगे उन तकलीफों की फेहरिस्‍त गिनाने, जो बकौल उनके सिर्फ मर्दों के हिस्‍से में आई थीं. बात शुरू हुई थी अखबार में छपी एक खबर से, जो कह रही थी कि उस साल देश में आत्‍महत्‍या करने वाले मर्दों की संख्‍या महिलाओं के मुकाबले कहीं ज्‍यादा थी. वो बोलने पर आए तो ताबड़तोड़ बोलते गए. मर्द के सिर इतनी जिम्‍मेदारियां, इतने काम, परिवार का बोझ, नौकरी का दबाव, पैसा कमाने का सिरदर्द, बीवी-बच्‍चों को पालने का सिरदर्द. मर्द ज्‍यादा आत्‍महत्‍या करते हैं क्‍योंकि वो ज्‍यादा तकलीफ में हैं. और रोना औरतों के अधिकारों का रोया जाता है. सब कानून औरतों के लिए बने हैं. मर्दों के लिए कोई कानून नहीं. सब फेमिनिस्‍ट होती जा रही हैं और मर्द मरने को मजबूर हैं.



सब उनका प्रलाप सुनते रहे. सब मर्दों और कुछ औरतों ने हामी में सिर हिलाया. उनकी पत्‍नी हमेशा चुप रहती थीं. उस दिन भी वो कुछ नहीं बोलीं. मैं उनके घर एक हफ्ते रुकी थी और उस दौरान मैंने जो देखा, वो कुछ यूं था-

पत्‍नी नैनीताल के सरकारी अस्‍पताल में नर्स थीं. उनकी ड्यूटी सुबह 7 बजे से होती. नैनीताल की ठंड में वो रोज सुबह 4 बजे उठतीं और छह बजे अस्‍पताल के निकलने से पहले सुबह का नाश्‍ता, पति और दोनों बच्‍चों का लंचबॉक्‍स सब तैयार हो चुका होता था. उनके कामों में इस बीच बच्‍चों को उठाना, स्‍कूल के लिए तैयार कराना भी शामिल था. मर्दों के दुखों से लहूलुहान हुए पतिदेव इस पूरे दौरान सोते रहते थे. पत्‍नी बच्‍चों को स्‍कूल बस में चढ़ाकर कभी पैदल तो कभी बस से अस्‍पताल जाती थीं. कार पति के पास रहती थी. पति का दफ्तर वॉकिंग डिस्‍टेंस पर था, लेकिन वो कार से जाते और पत्‍नी 3 किलोमीटर पहाड़ी रास्‍ते पर पैदल या बस से. 3 बजे घर लौटकर वो वापस काम में लग जातीं. 10 बजे काम निपटाकर बच्‍चों को सुलाकर सो जातीं. सोने से एक मिनट पहले तक चकरघिन्‍नी की तरह घूमती रहती. पतिदेव 12 बजे तक टीवी देखते.

सालों से ये क्रम ऐसे ही जारी था. सरकारी अस्‍पताल में नर्स औरत की सैलरी आदमी से ज्‍यादा थी. ये वो पति था, जो मर्दों के अथाह दुख से दुखी था. जिसे लगता था कि मर्द इसीलिए ज्‍यादा मरते हैं क्‍योंकि उनका जीवन ज्‍यादा कठिन है.
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कल इंटरनेट पर तफरीह करते हुए ये एक रिसर्च हाथ लगी. “फिनिश नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ हेल्‍थ एंड वेलफेयर” ने एक स्‍टडी की है कि गरीब मर्दों में गरीब औरतों के मुकाबले भविष्‍य की उम्‍मीद और सकारात्‍मकता बहुत कम होती है. मर्द ज्‍यादा निराशा महसूस करते हैं, जबकि औरतें उन कठिन हालातों में भी आशावान बनी रहती हैं.

पिछले साल किसानों की आत्‍महत्‍या पर न्‍यूजरूम में हो रही बहस में एक कुलीग ने कहा कि कभी सुना है, कर्ज के बोझ से दबकर औरतों को आत्‍महत्‍या करते हुए. मर्द ही आत्‍महत्‍या करते हैं. मुझे लगा, भरे न्‍यूजरूम में किसी ने शर्मिंदा कर दिया हो. हम औरतों की तकलीफों का रोना रो रहे हैं, जबकि मर ज्‍यादा आदमी रहे हैं. मैंने कुछ कहा नहीं, लेकिन मुझे अपने गांव की वो औरत याद आई, जिसके पति ने ऐसे ही गरीबी और कर्ज से तंग आकर आत्‍महत्‍या कर ली थी. औरत नहीं मरी. पति के मरने के बाद दूसरों के घरों और खेतों में काम करके बच्‍चे पाले, कर्ज चुकाया और जिंदगी जी. और उस फिलिस्‍तीनी फिल्‍म की कहानी याद आई, जिसमें पति तकलीफों से तंग आकर पत्‍नी-बच्‍चों को छोड़कर भाग गया था. पत्‍नी न भागी, न मरी. उसने भी खेतों में काम किया, कपड़े सिले, बच्‍चे पाले और जितनी उसके हिस्‍से में आई थी, वो पूरी जिंदगी जी.

ये सच है कि पूरी दुनिया में आत्‍महत्‍या करने वाले मर्दों की संख्‍या औरतों के मुकाबले दुगुनी है. यूएन की एक स्‍टडी कहती है कि औरतों की आत्‍महत्‍या की ज्‍यादा बड़ी वजह मानसिक, शारीरिक और भावनात्‍मक प्रताड़ना है. मर्द कर्ज, गरीबी और आर्थिक असफलताओं की वजह से आत्‍महत्‍या करते हैं. एनसीआरबी और डब्‍ल्‍यूएचओ दोनों का आंकड़ा कहता है कि भारत में भी मर्दों और औरतों की आत्‍महत्‍या का अनुपात 2:1 है. लेकिन क्‍या इसका मतलब ये है कि मर्दों की जिंदगी में ज्‍यादा दुख हैं?



या इसका मतलब ये है कि औरतों में सहनशक्ति, उम्‍मीद, हिम्‍मत ज्‍यादा होती है. औरतें शराबी नहीं होतीं. उनमें न ये गर्व होता है, न अहंकार कि वो परिवार की मुखिया हैं. वो पालनकर्ता हैं. पैसा कमाना उनका काम है. मर्द जब किन्‍हीं वजहों से ये सब करने में असफल होता है तो शर्म से गड़ जाता है. औरतों को न ऐसी किसी सफलता का अहंकार होता है, न असफलता की शर्म. जीवन पर संकट आए तो भाग खड़े होने, मर जाने के मुकाबले वो ज्‍यादा हिम्‍मत से लड़ पाती हैं. ये सच है. सिर्फ भारत का नहीं, पूरी दुनिया का.
फिनलैंड में हुई इस रिसर्च को हेड करने वाली अन्‍ना मारिया इसोला कहती हैं, “मर्द के लिए तय की गई सामाजिक भूमिका को न निभा पाने वाले आदमी खुद को अकेला और असफल महसूस करते हैं. जबकि औरतों के साथ ऐसा नहीं है. वो घरेलू कामों और मातृत्‍व के ज्‍यादा बड़े दायरे में अपने जीवन की सार्थकता महसूस करती हैं.”

फ्रेंच फेमिनिस्‍ट सिमोन द बोवुआर ने 1971 में एक इंटरव्‍यू में कहा था, “पूरी जवानी चौड़ा होकर घूमने, रौब जमाने और आदेश देने वाला घर का मुखिया बुढ़ापे में कैसा निरीह हो जाता है. ताजिंदगी तो वो कठोरता और अनुशासन का चोला ओढ़े रहा. पत्‍नी, बच्‍चे सब उससे डरते रहे. अब जब उसकी सारी ताकत खत्‍म हो गई है, उसका आतंक अब भी खत्‍म नहीं हुआ.”

हर घर में आपको ऐसे अकेले, अलग-थलग पड़ गए फ्यूडल लॉर्ड दिख जाएंगे, जबकि औरतें बुढ़ापे में भी घर के कामों, नाती-पोतों के साथ व्‍यस्‍त रहती हैं. कुछ नहीं तो बहू को यही बता रही होंगी कि हमारे जमाने में अचार कैसे डालते थे या बच्‍चे की मालिश कैसे करनी है.

17 साल पहले अपनी फेमिनिस्‍ट स्‍कूलिंग के उफान के दिनों में मैंने सिमोन के इंटरव्‍यूज की वो किताब पढ़ी थी, जिसमें से ये ऊपर वाला कोट लिया गया है. उसी किताब में एक बात और लिखी थी- “औरतों में प्रतिद्वंद्विता और एक दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति नहीं होती. सहनशीलता और धैर्य, जो एक सीमा तक तो खूबी होते हैं, लेकिन उसके बाद कमजोरी में तब्दील हो जाते हैं, भी औरतों का एक खास गुण है. औरतों में अपनी विडंबनाओं की समझ भी होती है, एक खास किस्म की सरलता और सीधापन. ये स्त्रियोचित गुण हमारे लैंगिक अनुकूलन और उत्पीड़न की उपज हैं, लेकिन यह गुण अपने आप में बुरे नहीं. ये हमारी मुक्ति के बाद भी बरकरार रहने चाहिए और पुरुषों को ये गुण अर्जित करने के प्रयास करने होंगे.”

इस्राइली फिल्‍म ‘लेमन ट्री’ की सलमा
इस्राइली फिल्‍म ‘लेमन ट्री’ की सलमा


जैसे प्रकृति ने बनाया, कुछ उस कारण और जैसे हजारों सालों से दुनिया ने पाला, कुछ उस कारण ये हुआ. लेकिन जो हुआ वो इतना बुरा भी नहीं है कि उसे खारिज कर दिया जाए. औरतों में है ज्‍यादा धैर्य, ज्‍यादा साहस, ज्‍यादा संतुलन, ज्‍यादा सहनशीलता (यहां सहनशीलता का मतलब अत्‍याचार सहने की सहनशीलता से नहीं है) , ज्‍यादा विवेक, बहुत सारी चुप्‍पी और उससे ज्‍यादा गहराई. कहती कम हैं, करती ज्‍यादा हैं. कर्ज में डूबा पति मर जाए तो वो भी मर नहीं जातीं. वो जिंदा रहती हैं और बच्‍चों को जिंदा रखती हैं. उस फ्रेंच फिल्‍म ‘इब्राहिम एंड द फ्लावर ऑफ कुरान’ में जैसे पिता भाग जाता है और आत्‍महत्‍या कर लेता है, 13 साल के बेटे को अकेला छोड़कर, औरत नहीं भागती. वो उस इस्राइली फिल्‍म ‘लेमन ट्री’ की सलमा है, जो दुनिया में इतनी अकेली है, लेकिन न लड़ना छोड़ती है, न प्‍यार करना. वो ‘सिनेमा पैरादिसो’ की मारिया है. खूंखार मर्दों की दुनिया से अकेले लड़ती और अपने बेटे को बड़ा करती.

ये सब लिखते हुए कई बार डर भी लगता है. आपका फेमिनिस्‍ट दिमाग सवाल करता है, “कहीं तुम हजारों साल पुराने उस मर्दवादी, सामंती क्‍लीशे को ही तो सही साबित नहीं कर रही, जो औरतों को लतियाते हुए भी उन्‍हें महान बताता रहा है.” लेकिन शायद नहीं. ये बात उससे थोड़ी अलग है. ये बात उससे कहीं ज्‍यादा गहरी है. ये बात मर्दों के आधिपत्‍य, उनकी सत्‍ता, विशेषाधिकार और यहां तक कि औरतों के प्रति उनके हद दर्जे के खूंखार इतिहास को नजर और दिमाग में रखते हुए कही जा रही है. ये उस सच्‍चाई से इनकार नहीं है. ये हमारे होने का बस एक और पहलू है. ये उन सारे अध्‍ययनों, आंकड़ों और जिंदगी की सच्‍ची कहानियों का एक्‍सटेंशन भर है, जो बताते हैं कि मर्द ज्‍यादा आत्‍महत्‍या करते हैं, औरतों में ज्‍यादा होती है उम्‍मीद और लड़ने की हिम्‍मत.

और अंत में ये एक कहानी. सालों पहले कभी मां ने सुनाई थी. याद रह गई.

एक बार की बात है. एक आदमी था और उसके तीन बेटे. चारों मजदूरी करते और शाम को बदले में मालिक उन्‍हें एक-एक डलिया भरकर भुना हुआ चना दे देता. रात में वही खाकर सो जाते. अगले दिन फिर चना मिलता. सालों से उनकी यही कहानी थी. फिर सबसे बड़े बेटे की शादी हुई. उसकी पत्‍नी को ये बड़ा अजीब लगा कि ये लोग रोज चना ही खाते हैं. एक दिन वो चना लेकर पड़ोस के घर में गई और उसे पीसकर बेसन बना लिया. बाकी का चना बाजार में बेच बाकी अन्‍न ले आई और रात में बेसन की कढ़ी बनाई. सालों बाद उन्‍हें इतना स्‍वादिष्‍ट खाना मिला था. ऐसे ही वो रोज उन चनों से नए-नए पकवान बनाने लगी. कहानी और भी थी आगे.

मेरे दिल में उस कहानी की जो बात इतने साल बाद भी रह गई, वो ये कि चना तो वही था. औरत ने उसका बेसन बना दिया. यही करती है स्‍त्री. वो आसानी से मरती नहीं. जिंदगी चना दे तो उसकी कढ़ी बना देती है.

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