'तुम शहरे-मुहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आए हैं', पढ़ें सुदर्शन 'फाक़िर' का कलाम

'तुम शहरे-मुहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आए हैं', पढ़ें सुदर्शन 'फाक़िर' का कलाम
सुदर्शन 'फाक़िर' का दिलकश कलाम...

सुदर्शन 'फाक़िर' (Sudarshan Faakir) की ग़ज़लों (Ghazal) में जहां दर्द की शिद्दत महसूस होती है, वहीं ज़माने का रंग भी नज़र आता है...

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उर्दू ज़बान के अज़ीम शायर सुदर्शन 'फाक़िर' (Sudarshan Faakir) का जन्‍म 19 दिसंबर, 1934 को पंजाब (Punjab) के फिरोजपुर में हुआ था. शायरी (Shayari) की तरफ़ उनका रुझान बचपन से ही हो गया था और आखि़री सांस तक उनकी क़लम चलती रही. उन्‍होंने ग़ज़ल (Ghazal) भी लिखीं और नज्‍़में (Nazm) भी. हालांकि उनकी जिंदगी में उनका कोई दीवान मंज़रे-आम पर न आ सका और उनकी मौत के बाद ही उनकी पहली किताब शाय हुई 'कागज की कश्ती'. उनकी ग़ज़लों में जहां दर्द की शिद्दत महसूस होती है, वहीं ज़माने का रंग भी नज़र आता है. आज हम 'कविता कोश' के साभार से हाजि़र हुए हैं सुदर्शन 'फाक़िर' का दिलकश कलाम लेकर, तो पढ़िए और लुत्‍फ़ उठाइए...



बात ने रोने न दिया...
इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया


वरना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया
आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब
उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया

रोने वालों से कह दो उनका भी रोना रो लें
जिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया

तुझसे मिलकर हमें रोना था बहुत रोना था
तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया

एक दो रोज़ का सदमा हो तो रो लें 'फ़ाकिर'
हम को हर रोज़ के सदमात ने रोने न दिया



मैं ज़िंदा हूं अभी...
किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूं अभी
मुझ को एहसास दिला दो कि मैं ज़िंदा हूं अभी

मेरे रुकने से मेरी सांसे भी रुक जाएंगी
फ़ासले और बड़ा दो कि मैं ज़िंदा हूं अभी

ज़हर पीने की तो आदत थी ज़माने वालो
अब कोई और दवा दो कि मैं ज़िंदा हूं अभी

चलती राहों में यूं ही आंख लगी है 'फ़ाकिर'
भीड़ लोगों की हटा दो कि मैं ज़िंदा हूं अभी



जान बचा कर आए हैं...
पत्थर के ख़ुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसां पाए हैं
तुम शहरे-मुहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आए हैं

बुतख़ाना समझते हो जिसको पूछो न वहां क्या हालत है
हम लोग वहीं से लौटे हैं बस शुक्र करो लौट आए हैं

हम सोच रहे हैं मुद्दत से अब उम्र गुज़ारें भी तो कहां
सहरा में ख़ुशी के फूल नहीं शहरों में ग़मों के साये हैं

होठों पे तबस्सुम हल्क़ा सा आंखों में नमी सी है 'फ़ाकिर'
हम अहले-मुहब्बत पर अक्सर ऐसे भी ज़माने आए हैं

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दवा कहते हैं...
सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं
जिसको देखा ही नहीं उसको ख़ुदा कहते हैं

जिंदगी को भी सिला कहते हैं कहने वाले
जीने वाले तो गुनाहों की सज़ा कहते हैं

फ़ासले उम्र के कुछ और बढा़ देती है
जाने क्यों लोग उसे फिर भी दवा कहते हैं

चंद मासूम से पत्तों का लहू है 'फ़ाकिर'
जिसको महबूब के हाथों की हिना कहते हैं
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