Sunday Special: मां-बाप की तकरार बना रही बच्‍चों को झगड़ालू, पड़ता है बुरा असर

Sunday Special: मां-बाप की तकरार बना रही बच्‍चों को झगड़ालू, पड़ता है बुरा असर
पैरेंट्स की तकरार का बच्चों के मासूम मन पर गहरा असर पड़ता है.

बच्चों के लिए उनके पैरेंट्स रोल मॉडल (Role Model) होते हैं. जब बच्‍चे पैरेंट्स (Parents) को आए दिन तकरार करते देखते हैं, तो उनका भी व्‍यवहार (Behavior) इससे प्रभावित होने लगता है. उनके अंदर विद्रोही स्वभाव पनपने लगता है. वे चिड़चिड़े स्‍वभाव के होने लगते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: June 14, 2020, 11:02 AM IST
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जिंदगी का पहला सबक बच्‍चे अपने घर में अपने पैरेंट्स (Parents) से ही सीखते हैं. वे जिस माहौल में रहते हैं उसका असर उन पर होना लाजिमी है. कई बार बच्‍चे अपने ही घर में कुछ ऐसा भी सीखने लगते हैं जो उनकी कमसिन उम्र पर गहरा प्रभाव छोड़ता है. आए दिन पति-पत्‍नी के आपसी मतभेद जब खुल कर झगड़ों के रूप में सामने आने लगते हैं तो इसका सीधा असर बच्‍चों के कोमल मन पर पड़ता है. बच्चों के लिए उसके मम्मी-पापा रोल मॉडल (Role Model) होते हैं और उनकी छोटी से छोटी आदतें बच्‍चों पर गहरा असर छोड़ती हैं. ऐसे में जब बच्‍चे पैरेंट्स को आए दिन तकरार करते देखते हैं, तो उनका भी व्‍यवहार (Behavior) इससे प्रभावित होने लगता है. उनके अंदर एक विद्रोही स्वभाव पनपने लगता है.

इसका असर यह भी हो सकता है कि वे अकेले रहना पसंद करने लगें और अपने आस-पास के लोगों से तल्‍ख लहजे में बात करने के आदी होने लगें या फिर चिड़चिड़े स्‍वभाव के होने लगें. ऐसे में बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए घर का माहौल बेहतर होना बहुत जरूरी है. पैरेंट्स की तकरार का बच्‍चों पर कई तरह से असर पड़ सकता है.

घर के तनावपूर्ण माहौल से बच्‍चे मानसिक तौर पर दुखी रहते हैं और ऐसे में पढ़ाई से जी चुराने लगते हैं.




हो जाते हैं चिड़चिड़े
लंबे समय तक तनाव (Stress) में रहने वाले बच्चों में इस तरह के हार्मोन का निर्माण होने लगता है, जो उन्हें समय से पहले व्‍यस्‍क और झगड़ालू बनाते हैं. कई बार आपसी झगड़ों से तनावग्रस्त पैरेंट्स अपने बच्चों पर अपना गुस्‍सा उतारने लगते हैं. इसका बच्चों के मासूम मन पर गहरा असर पड़ता है और वे अपने परिवार से दूरी बनाने लगते हैं. वे बात-बात पर झगड़ने लगते हैं. कभी-कभी यह भी होता है कि वे अपने परिवार से कट कर बाहर अपनापन ढूंढ़ते हैं और ऐसे में कई बार गलत सोहबत में पड़ जाते हैं.

पढ़ाई से जी चुराते हैं
बच्‍चे खुशी भरे माहौल में बच्‍चे ज्‍यादा बेहतर ढंग से सीखते हैं, पढ़ते हैं. यह कैसे संभव हैं कि वे घर के तनाव भरे माहौल में जी लगा कर पढ़ाई पर ध्‍यान दें. बच्‍चों की सीखने समझने की क्षमता प्रभावित होती है. घर के तनावपूर्ण माहौल से बच्‍चे मानसिक तौर पर दुखी रहते हैं और ऐसे में पढ़ाई से जी चुराने लगते हैं.

होते हैं डिप्रेशन का शिकार
जो बच्चे कम उम्र से ही पैरेंट्स के बीच झगड़ा होते देखते हैं, उन्‍हें बढ़ती उम्र के साथ कई तरह की मानसिक बीमारियां हो सकती हैं. उन्‍हें एंग्जाइटी (चिंता), डिप्रेशन जैसी समस्‍याएं घेरने लगती हैं.

छोटी उम्र से होते हैं आक्रामक
बच्‍चे वही सीखते हैं जो अपने पैरेंट्स को करते देखते हैं. माता-पिता के व्‍यवहार का उन पर यह असर होता है कि वे खुद भी उनकी तरह बनते चले जाते हैं. उनका स्‍वभाव झगड़ालू होने लगता है और वे किसी के लिए भी सम्‍मान नहीं रखते. अपशब्‍द बोलना, जवाब देना, बात न मानना और बात-बात पर झगड़ना उनकी आदत बनने लगता है. छोटी सी उम्र में ही बच्‍चे आक्रामक हो जाते हैं.

आत्‍मविश्‍वास में कमी
बचपन से ही कड़वाहट भरे माहौल में पलने वाले बच्‍चों में आत्‍मविश्‍वास की कमी हो जाती है. उनमें असुरक्षा की भावना घर कर जाती है और वे चाह कर भी इससे निकल नहीं पाते. वे अपने भविष्‍य को लेकर भी कशमकश की स्थिति में रहते हैं.

छोटी-छोटी गलतियों के लिए बच्चों पर हाथ न उठाएं. बार-बार ऐसा होते रहने से बच्‍चों में विरोध की भावना पनपने लगती है.
पैरेंट्स की तकरार का बच्‍चों के शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍य पर उतना प्रभाव नहीं पड़ता जितना कि उनके मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य पर पड़ता है.


पैरेंट्स रखें इन बातों का ध्‍यान
अपने बीच के मतभेदों को आपसी बातचीत से हल करें. कोशिश करें कि झगड़े की स्थिति ही न आने पाए.

एक-दूसरे के लिए अपशब्‍द इस्‍तेमाल करना, एक-दूसरे पर चिल्‍लाना बच्चे में हीन भावना भर सकता है. इसलिए अपने मतभेदों को शांति से सुलझाना सीखें।

अपने पार्टनर की बात को अहमियत देंगे तो इससे बच्‍चों के व्‍यवहार में यह खूबी आएगी. वे दूसरों को अहमियत देना, बात मानना सीखेंगे.

कभी-कभार अगर झगड़ा हो भी जाए तो बाद में बच्‍चे को प्‍यार से समझाएं और यह विश्‍वास जरूर दिलाएं कि मम्‍मी-पापा के बीच सब कुछ ठीक हो गया है.

 

क्‍या कहते हैं एक्‍सपर्ट्स
क्‍लाउड नाइन ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्‍स, गुरुग्राम की नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट के निदेशक और मशहूर पीडियाट्रिशियन डॉ. संजय वजीर कहते हैं कि पैरेंट्स की तकरार का बच्‍चों के शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍य पर उतना प्रभाव नहीं पड़ता जितना कि उनके मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य पर पड़ता है. जो बच्‍चे टूटे परिवारों से आते हैं उनका व्‍यवहार बढ़े होने पर भी सामान्‍य नहीं रहता. या तो वे झगड़ालू बनते हैं या फिर चिड़चिड़े. बचपन के इस माहौल का असर उन पर बना रहता है. यहां तक कि उनका अपना वैवाहिक जीवन भी इससे प्रभावित होता है. ऐसे बच्‍चे क्‍लास में किसी से घुलते-मिलते नहीं, डिप्रेस रहते हैं. वे अन्‍य बच्‍चों के साथ किसी फिजिकल एक्टिविटी में शामिल नहीं होना चाहते. ये सब चीजें बच्‍चों पर लॉगटर्म असर डालती हैं.

 

मशहूर क्‍लीनिकल साइकोलॉजिस्‍ट डॉ. आर के सूरी कहते हैं कि बहुत सारी स्‍ट्डीज बताती हैं कि 50 फीसदी खुशी जैनेटिक होती है. डिप्रेशन या सैडनेस 50 फीसदी जैनेटिक लोडिंग होती है. पैरेंट्स के रोज-रोज के झगड़ों को देख कर बच्‍चों के झगड़ालू होने की भी संभावना बढ़ जाती है. घरों मे पति-पत्‍नी के बीच ओवर एक्‍पेक्‍टेशन उनमें झगड़ा पैदा करता है. अगर सब अपनी हदें तय कर लें और एक-दूसरे के साथ समझ कर लेकर चलें तो झगड़े नहीं होंगे. जिन लोगों के बीच इस तरह के झगड़े होते हैं उन्‍हें किसी अच्‍छे क्‍लीनिकल साइकोलॉजिस्‍ट से कंसल्‍ट करना चाहिए.

 

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