पुस्तक अंश: बेशरम- पराए देश में रहने को मजबूर लोगों की कहानी है तस्लीमा नसरीन यह किताब

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Updated: August 26, 2019, 12:23 PM IST
पुस्तक अंश: बेशरम- पराए देश में रहने को मजबूर लोगों की कहानी है तस्लीमा नसरीन यह किताब
पराए देश में रहने को मजबूर लोगों की कहानी है बेशरम

पुस्तक अंश की पहली किश्त में हम आपके लिए लाए हैं मशहूर लेखिका तस्लीमा नसरीन की किताब बेशरम के कुछ अंश...

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  • Last Updated: August 26, 2019, 12:23 PM IST
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रविवार 25 अगस्त को तस्लीमा नसरीन का जन्मदिन था. बांग्लादेश में साल 1962 में जन्मीं तस्लीमा नसरीन इस साल 57 वर्ष की हो गई  हैं. वैसे तो तस्लीमा ने कई उपन्यास और किताब लिखे हैं, लेकिन आज बात करेंगे उनकी हाल ही में आई किताब 'बेशरम' की. तसलीमा नसरीन का यह उपन्यास उन लोगों के विषय में है जो अपनी जन्मभूमि को छोड़कर किसी और देश में, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में, पराए माहौल और पराई आबोहवा में अपना जीवन बिता रहे हैं. तस्लीमा नसरीन के बारे में बता दें कि भारत समेत कई देशों से उन्हें विभिन्न सम्मानित पुरस्कारों और मानद उपाधियों से विभूषित किया जा चुका है. दुनिया की लगभग तीस भाषाओं में उनकी रचनाओं का अनुवाद हो चुका है.

किताब के अंश

मुझे तुमसे प्यार है, तुम बहुत आत्मीय लगती हो, तुम्हारे बिना मैं जि़न्दा नहीं रह सकता—इस तरह के जुमले केवल मन पर नहीं, शरीर पर भी एक तरह का दबाव डालते हैं. उसकी यह बात सुनकर मेरा शरीर कैसा तो शिथिल-सा हो गया. मानो मेरी ताकत ही ख़त्म हो गई! कुर्सी से उठने में भी मुझे थोड़ा समय लगा. मन अस्थिर हो उठा. मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि उसका वह वाक्य सुनकर मुझे क्यों अच्छा लगा. सम्भवत: किसी ने कभी ऐसा कहा नहीं था, इसलिए. मेरे अपने कहलानेवाले लोग हैं ही कितने? जिन्हें मैं अपना समझती हूँ, उनमें से असल में कोई भी मुझे अपना नहीं समझता. दूर विदेश में एक बहन रहती है, बीमारी वगैहरा होने पर, मन ख़राब होने पर वह मेरी तलाश करती है. इसके अलावा देश में मेरे नाते-रिश्तेदार और मित्र भरे पड़े हैं, लेकिन मेरे रहने की बात जानने के बावजूद इतने पासवाले पड़ोसी मुल्क में कोई भी तो मुझे देखने नहीं आता. मैं जि़न्दा हूँ कि मर गई, इसकी ख़बर भी तो कोई नहीं लेता, इसलिए सुरंजन के ख़िलाफ़ तमाम नालिशों के बावजूद उसका यह वाक्य मुझे अनूठे आनन्द से भर गया. कोई मुझे अपना समझ रहा है. किसी को अपना समझने का चलन इस वस्तुवादी आत्मकेन्द्रित समाज में है ही नहीं, ऐसा कहना बिलकुल ठीक होगा. यहाँ पर लोग दूसरों के प्रति जिन कर्तव्यों और दायित्वों का पालन करते हैं, उन्हीं को हम लोग अपनों के लिए प्रेमवश कुछ करना मान लेते हैं. सम्भवत: इसमें प्रेमवश कुछ भी नहीं किया जाता. असल में किए बिना निस्तार नहीं, इसलिए किया जाता है.

सुरंजन को मैंने एक कमरा दिखा दिया. मैंने उसे अपना बेडरूम ही दिया था ताकि वह आराम कर सके. सुजाता से मैंने कह दिया कि उसे चाय वगैरह की ज़रूरत हो तो दे देना. मैं स्टडी बेड पर एक किताब लेकर लेट गई. उस किताब को पढ़ने की इच्छा थी. लेकिन कुछ पन्ने पढ़ लेने के बाद मुझे महसूस हुआ कि मैं बस पढ़ती ही जा रही हूँ. मैं हरेक शब्द को देख-देखकर पढ़ रही थी, लेकिन यह पढ़ना सचमुच का पढ़ना नहीं था. कारण कि सारा कुछ केवल मेरी आँखें पढ़ रही थीं, मेरे दिमाग़ में ज़रा-सा भी कुछ घुस नहीं रहा था. चूँकि दिमाग़ में कुछ भी नहीं घुसा, इसलिए मुझे नहीं पता कि मैंने अभी तक क्या पढ़ा था. लेकिन मेरे दिमाग़ में कुछ भी क्यों नहीं घुस रहा था? मेरा मन कहाँ था? मेरा मन सुरंजन में था. उस लड़के पर मुझे ख़ूब ग़ुस्सा आता है, लेकिन यह भी सच है कि वह मुझे बेहद आत्मीय भी लगता है. एक व्यक्ति जिसे मैं पहचानती नहीं, बहुत जानती नहीं, जिससे साधारण-सी मुलाकात हुई हो, बहुत मामूली-सी बातचीत हुई हो, वह क्योंकर आत्मीय लगेगा? —इस रहस्य का मुझे कोई कूल-किनारा नहीं मिलता. मैंने लगभग अपरिचित एक लड़के को कितनी सहजता के साथ अपने बेडरूम में भेज दिया था! मुझे भरोसा था कि वह मुझे कोई नुकसान नहीं पहुँचाएगा. वह अगर कुछ करेगा तो वह अपकार नहीं, उपकार ही होगा.

 

उपन्यास का नाम – बेशरम
लेखक – तसलीमा नसरीन
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प्रकाशन – राजकमल प्रकाशन
कीमत – 250/- रूपए – पेपरबैक
पृष्ठ संख्या – 258

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First published: August 25, 2019, 10:12 AM IST
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