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चटपटे कांजी-वड़े का स्वाद चखना है, तो भागीरथ पैलेस में 'गुप्ताजी कांजी वाले' पर पहुंचें

चटपटे कांजी-वड़े का स्वाद चखना है, तो भागीरथ पैलेस में 'गुप्ताजी कांजी वाले' पर पहुंचें

कांजी वड़ा भोजन को पचाता तो है ही साथ ही यह भूख बढ़ाने वाला भी है. Image-shutterstock.com

कांजी वड़ा भोजन को पचाता तो है ही साथ ही यह भूख बढ़ाने वाला भी है. Image-shutterstock.com

Famous Food Joints In Delhi-NCR: असल में यह ठिया ही पाचक व्यजंनों से भरा-पूरा है. ठिए पर आपको मध्यम आकार के सात मटके दिखाई देंगे, जिनमें एक में मशहूर कांजी में वड़ा तैरता दिखाई देगा, तो किसी मटके में दही, किसी में सौंठ, किसी में उबलू आलू और छोले तो किसी में चटपटे कचालू और हरी चटनी दिखाई देगी. इस ठिए पर चार डिश बिकती हैं.

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    (डॉ. रामेश्वर दयाल)

    Famous Food Joint In Delhi-NCR: चटपटे और हाजमेदार डिश कांजी-वड़ा के बारे में तो हम सब जानते ही हैं. इस डिश को होली और दिवाली के त्योहारों पर बनाने का रिवाज है. उसका कारण यह है कि इन त्योहारों पर घरों में बहुत ही गरिष्ठ व ऑयली भोजन बनता है. यह भोजन शरीर को नुकसान न पहुंचाए और खाना आसानी से पच जाए, इसलिए हाजमेदार कांजी-वड़ा रिवाज में आ गया. एक बात और कि यह भोजन किस राज्य का है और इसकी शुरुआत कब हुई, इसको लेकर पुख्ता जानकारी मौजूद नहीं है. कुछ भोजन विशेषज्ञ इसे सिंधी डिश बताते हैं तो कहा यह भी जाता है कि यह व्यंजन गुजरात या राजस्थान का है.

    फिलहाल यह रस्साकशी एक तरफ, लेकिन हम यह जरूर कह सकते हैं कि कांजी वड़ा भोजन को पचाता तो है ही साथ ही यह भूख बढ़ाने वाला (Appetizer) भी है, क्योंकि इसे बनाने में राई, हींग आदि का खूब इस्तेमाल होता है. अब तो दिल्ली के कई इलाकों मे यह बारहों महीने मिलता है. तो आज हम आपको पुरानी दिल्ली के चांदनी चौक इलाके में कांजी-वड़ा के एक मशहूर ठिए की ओर लिए चलते हैं, जो सालों से यह डिश लोगों को खिला रहा है.

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    ठिए के सात मटकों में भरा है कांजी-वड़ा और भी बहुत कुछ
    चांदनी चौक इलाके में इलेक्ट्रिकल्स सामानों व दवाओं की मशहूर मार्केट भागीरथ पैलेस है. इस पैलेस का इतिहास मुगलों, तवायफों व अंग्रेजों से जुड़ा हुआ है. पहले इसे समरू की हवेली कहा जाता था. मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने अपने उपन्यास “दिल्ली” में भागीरथ पैलेस की रोचक जानकारी दी है. उपन्यास में समरू की हवेली से भागीरथ पैलेस तक का तथ्यपूर्ण इतिहास है. खैर, हम तो आज के भागीरथ पैलेस की बात कर रहे हैं. इसी बाजार में ‘गुप्ताजी कांजी वाले’ का सालों पुराना ठिया है. आप इलाके में इस कांजी वाले का पता पूछेंगे तो वह आपको ठिकाने की जानकारी दे देगा.

    असल में यह ठिया ही पाचक व्यजंनों से भरा-पूरा है. ठिए पर आपको मध्यम आकार के सात मटके दिखाई देंगे, जिनमें एक में मशहूर कांजी में वड़ा तैरता दिखाई देगा, तो किसी मटके में दही, किसी में सौंठ, किसी में उबलू आलू और छोले तो किसी में चटपटे कचालू और हरी चटनी दिखाई देगी. इस ठिए पर चार डिश बिकती हैं. नंबर वन कांजी-वड़ा के अलावा दही-भल्ला, चाट-पापड़ी और कलमी वड़ा.

    कांजी-वड़े का स्वाद लाजवाब तो गंध भी मनभावक और चौंकाने वाली
    आप इस ठिए पर पहुंचेंगे तो लोग भल्ला खाएं चाहे पापड़ी. साथ में कांजी-वड़ा जरूर खाएंगे. इस ठिए के आसपास अलग ही तरह की दिल-लुभाती गंध उड़ती महसूस होगी, जो आपकी भूख को बढ़ा देगी. बात कांजी-वड़े की हो रही है. आप ऑर्डर दीजिए. एक बड़े से प्लास्टिक के गिलास में चार वड़े डाले जाएंगे, फिर उसे कांजी (के पानी, जो हल्का पीले रंग का होता है) से भर दिया जाएगा. ऊपर से हरी चटनी लगाकर चम्मच के साथ पेश कर दिया जाएगा.

    खाने और पीने से पहले ही नाक में हींग और पिसी राई की गंध आपको चौंका सा देगी. वड़ा खाइए और कांजी का सिप मारिए, बस… ऐसा लगेगा जैसे कायनात का स्वाद मुंह में उतर आया है. मन करेगा कि खाते जाएं-पीते जाएं. एक बात और खाते वक्त आपको डकार जरूर आएगी, जो इस बात का संकेत देगी कि मसला हाजमेदार है. इस एक गिलास की कीमत 50 रुपये है.

    तीसरी पीढ़ी तक आ पहुंचा है हाजमेदार इस व्यंजन का धंधा
    इस तरह ठिए के लालाजी के बाकी व्यंजन भी कम ‘जानलेवा’ नहीं है. भल्ले, पापड़ी या कलमी वड़े का ऑर्डर दीजिए, बड़ी सी प्लेट में उन्हें डाला जाएगा. ऊपर से क्रीम मिली गाढ़ी दही, उबले छोले व आलू, सौंठ के अलावा हरी चटनी का छिड़काव होगा, उसके बाद ढेर सारे मसालेदार कचालू डालें जाएंगे और अंत में लच्छेदार अदरक फैलाकर परोस दिया जाएगा. अब आप ही बताइए, मसला दिलकश है न. इन तीनों डिश की कीमत 60 रुपये प्रति प्लेट है. मार्केट में यह यह ठिया वर्ष 1971 में लगना शुरू हुआ. उस वक्त लाला रोशनलाल ने इसे शुरू किया.

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    शुरू से ही उन्होंने कांजी-वड़ा और दही-भल्ले ही बेचे. वही मैन्यू आज भी जारी है. इसके बाद उनके बेटे विजय गुप्ता ने ठिया संभाला. आज उनके साथ भाई सुनील गुप्ता व बेटे हितेश ठिये को चला रहे हैं. उनका कहना है कि हमारी कांजी जैसा स्वाद कहीं नहीं मिलेगा. यह मटके में सर्दियों में आठ दिन में और गर्मियों में छह दिन में तैयार होती है. दही हम खुद जमाते हैं. मसाले अपने ही बनाते हैं. ठिया दोपहर 1 बजे सजता है और शाम 6 बजे तक सब निपट जाता है. रविवार को अवकाश रहता है.

    नजदीकी मेट्रो स्टेशन: लाल किला

    Tags: Food, Lifestyle

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