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OPINION: रंगमंच और दर्शकों का 'आधा-अधूरा' रिश्ता

News18Hindi
Updated: December 3, 2019, 4:45 PM IST
OPINION: रंगमंच और दर्शकों का 'आधा-अधूरा'  रिश्ता
नाटक 'ए क्लाउनस क्राय फॉर दी मून' का एक दृश्य.

स्मार्ट फोन (Smart Phone) और सोशल मीडिया (Social Media) के जमाने में तात्कालिक प्रतिक्रिया में जीने की आदत सी बनती जा रही है. लेकिन क्या ये रंगमंच के लिए खतरा पैदा करने जा रहा है?

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स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर 'आधे-अधूरे' जैसा संजीदा नाटक लिखने वाले मोहन राकेश (Mohan Rakesh) की स्मृति में आयोजित नाट्य समारोह में ही स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर मंच से फूहड़ टिप्पणियां और हॉल में दर्शकों की तालियां, ये 5 दशकों में हमारे रंगमंच का बदलता मिजाज है, जिस पर सोचने-समझने की जरूरत है. अभी हाल में मोहन राकेश स्मृति सम्मान समारोह के दौरान नाट्य प्रस्तुतियों में नाटक से ज्यादा दर्शक की प्रतिक्रियाओं ने सोचने के लिए मजबूर किया. पत्नियों पर पूर्वाग्रह वाले फूहड़ चुटकुलों पर एक बड़े युवा दर्शक वर्ग ने सभाग्रहचुम्बी तालियां और सीटियां बजायीं, उससे कई सवाल एक साथ जेहन में कौंधने लगे. व्हाट्सऐप पर गुड मॉर्निंग के दुमछल्ले के साथ आने वाले फूहड़ कंटेंट को आखिर क्यों हम मंच तक लेकर आ रहे हैं? क्या सोशल मीडिया के जमाने में दर्शक की नाटक से अपेक्षाएं बदल रही हैं? द्विअर्थी संवाद या गालियों की भरमार आखिर नाट्य-आलेख में क्यों बढ़ाने की जरूरत आ पड़ी है?

नाटक की भाषा में ‘प्ले टू दी गैलरी’शब्द हम तब इस्तेमाल करते हैं, जब कथ्य को दर्शक के मिजाज के मुताबिक ढाला जाता है. इस सम्बन्ध में कई नाट्य प्रेमी, निर्देशक, अभिनेता ने चिंता जताई है कि इस तरह से रंगमंच एक तरह के 'समझौते' की तरफ बढ़ता है, जो खतरनाक है. इसके विपरीत कई अभिनेताओं ने प्रस्तुति के दौरान दर्शकों की इस तरह कि प्रतिक्रियाओं को जरूरी माना है. उनके मुताबिक अगर दर्शक न हों तो फिर नाटक के मायने ही क्या हैं? ऐसे हालात में अभिनेताओं-निर्देशकों को नाटक की मूल भावना को नज़रअंदाज़ कर उन पक्षों को कुरेदने से कोई गुरेज नहीं होता, जिससे हॉल में तालियों और सीटियों की आपूर्ति बनी रहे.

स्मार्ट फोन और सोशल मीडिया के जमाने में तात्कालिक प्रतिक्रिया में जीने की आदत सी बनती जा रही है. हम किसी लंबी प्रक्रिया के बाद उत्पन्न होने वाले प्रभाव का धीरज खोते जा रहे हैं. जो भी हो हमें फौरन चाहिए होता है. ऐसे में एक तरह का 'कच्चापन' न केवल हमारी जिंदगी और सोच में हावी होता जा रहा है, बल्कि वही रंगमंच पर भी अभिव्यक्त हो रहा है. नाटक के दौरान ये नया दर्शक वर्ग फोन पर प्रस्तुतियों की फोटो खींचने और वीडियो बनाने में लगा रहता है या फोन की आभासी दुनिया में गप्पबाजी लड़ाता हुआ कुछ देर अवकाश लेकर ‘ब्रेक’ में नाटक देखता है. गंभीर दर्शक इस दौरान खीझते रहें, इनकी बला से.


वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन अपने एक लेख में स्मार्टफोन और उसके उपभोक्ता के बीच के आपसी सम्बन्ध को क्रिस्टोफ़र मार्लो के नाटक ‘फॉस्टस’ से जोड़ते हैं. वो कहते हैं - "क्रिस्टोफ़र मार्लो के मशहूर नाटक ‘फॉस्टस’ के नायक को ईश्वर मेफिस्टोफिलीस नाम का एक सेवक देता है जो कई बरसों तक उसकी हर इच्छा पूरी करता रहता है. फॉस्टस की मुट्ठी में जैसे सारी दुनिया है. लेकिन 12 बरस बाद जब यह अवधि ख़त्म हो चुकी होती है, तब वह पाता है कि दरअसल मेफिस्टोफिलीस उसका ग़ुलाम नहीं था, वही मेफ़िस्टोफिलीस का गुलाम हो गया था. मेफिस्टोफिलीस जो चाहता था, वह उससे करवा लेता था." नाटक में '12 साल की मियाद' असल जिंदगी में कितनी लंबी खींचेगी, ये फिलहाल कोई नहीं कह सकता.

नाटक 'विरासत' का एक दृश्य


रंगमंच के कुछ निर्देशकों ने दर्शकों के व्यवहार में आ रहे इस परिवर्तन को समझ कर एक अलग रणनीति भी आजमाई है. दर्शक को नाटक के दौरान पूरी तरह 'एंगेज्ड' करने के ऐसे प्रयोगों को रेखांकित करना जरूरी है. हाल के दिनों में कई ऐसी प्रस्तुतियां देखने को मिलती हैं जहां दर्शक महज़ दर्शक नहीं रहता बल्कि मंचन का हिस्सा हो जाता है. नाटक को बुना ही ऐसे जाता है कि दर्शक की सक्रिय भागीदारी बनी रहती है. नाटक में दर्शक को भी अभिनेता में परिवर्तित कर दिया जाता है. इसी तरह का एक प्रयोगात्मक नाटक ‘दिल्ली की नाट्य संस्था खिलौना ने मंचित किया. इस नाटक का निर्देशन जाने माने रंगकर्मी वी. के. शर्मा ने किया. नाटक में कुछ दृश्यों को मंचित करने के बाद अचानक दर्शकों को न्योता दिया जाता है. दर्शकों से अनुरोध किया जाता है कि वो मंच पर आएं और अब तक के नाटक को पुनर्मंचित करें. इस प्रस्तुति में हर आयु वर्ग के दर्शक स्वेच्छा से मंच पर आते हैं. दर्शक अभिनेता से उनकी वेशभूषा और मुखौटे लेकर नाटक के दृश्यों को फिर से आगे बढ़ाते हैं. नाटक के जो संवाद उसे याद रहे वो उसे दोहराते हैं, जो याद नहीं रहे उसमें अपनी अपनी कल्पना से नया कुछ जोड़ता रहता है. कई बार दर्शक भी चलते नाटक में उसे संवाद याद दिला देते हैं . दर्शकों और कलाकारों की साझेदारी वाली इस प्रस्तुति को वी. के. शर्मा ‘सहभागिता रंगमंच’ कहते हैं. उनका मानना है कि दर्शकों की सहभागिता से भी एक दिलचस्प प्रस्तुति तैयार की जा सकती है .

दर्शकों में नाटक का एक अलग अहसास पैदा करने वाला एक प्रयोग कुछ साल पहले डॉ. अनुराधा कपूर ने भी किया. अनुराधा कपूर निर्देशित नाटक ‘विरासत’ काफी चर्चित रहा . राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल की इस प्रस्तुति का पहला मंचन मुक्ताकाश में हुआ. मंच को किसी पुराने बड़े घर के अलग-अलग कमरों में बांटा गया था. घर के हर हिस्से के बाहर दर्शकों के बैठने की व्यवस्था थी. इस तरह सेट मंच के बीचोबीच था और उसके चारों तरफ दर्शक बैठे थे. जो दर्शक घर के जिस हिस्से में बैठता था वो उस हिस्से में रहने वाले चरित्र की दृष्टि से नाटक को अनुभव करता था. मध्यांतर के बाद दर्शकों से ये अनुरोध किया जाता कि वो अपना स्थान बदलकर मंच के किसी दूसरे हिस्से से नाटक को देखें. ये रंगमंच में एक अभिनव प्रयोग था. अलग स्थान से अलग किरदार की दृष्टि से नाटक को देखने पर उसके नए अर्थ खुलते थे. इस तरह इस प्रस्तुति की मंच परिकल्पना दर्शकों के अनुरूप रची गयी थी ताकि स्थान बदलने पर दर्शकों को एक नया अनुभव मिल सके. इस नाटक की कई प्रस्तुतियां हुईं और कुछ दर्शक हर दिन इस नाटक को अलग अलग जगह बैठ कर देखने आए.

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रंगमंच है तो दर्शक चाहिए लेकिन किन शर्तों पर, किस कीमत पर, ये सभी को सोचना होगा? नए प्रयोग करने होंगे, नए फॉर्मूले ईजाद करने होंगे, संवाद की नई प्रक्रिया आजमानी होगी, प्रस्तुतियों के नए ढंग तलाशने होंगे, दर्शकों का नया वर्ग तैयार करना होगा... तभी एक मुकम्मल और उम्मीदों भरी तस्वीर उभरेगी... आधी-अधूरी सोच और तैयारी के साथ हम एक आधा-अधूरा रंग-संसार ही रच पाएंगे, जो हमारे रंगनायकों की स्मृतियों को उस रूप में ताजा नहीं कर पाएगा, जिस रूप में उन्होंने इसे गढ़ा था... मोहन राकेश की नायिका की तरह फिलहाल रंगमंच भी दर्शकों की अलग-अलग बिरादरी के बीच इस सवाल का जवाब ही तलाश रहा है कि उसका वजूद क्या यूं ही आधा-अधूरा... एक कसक से भरा ही रहेगा?

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First published: December 3, 2019, 4:45 PM IST
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